वेतन की नीति और इसके महत्व - Wage Policy and its Importance

वेतन की नीति और इसके महत्व - Wage Policy and its Importance


वेतन की नीतियां


प्रेरणात्मक मजदूरी योजनाये


श्रमिकों को कार्य करने के लिए पर्याप्त प्रलोभन एवं प्रेरणा प्रदान करने के लिए मजदूरी भुगतान की कुछ वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें श्रमिकों को कार्य सम्पन्न करने के लिए एक निश्चित समय दिया जाता है जिसके लिए निश्चित मजदूरी निर्धारित कर दी जाती है। यदि श्रमिक उस कार्य को निश्चित समय से पूर्व सम्पन्न कर लेता है अथवा इस निश्चित समय के दौरान अधिक उत्पादन कर लेता है तो उसे अधिक उत्पादन करने के प्रतिफल के रूप में अतिरिक्त धनराशि का भुगतान किया जाता है। प्रेरणात्मक मजदूरी योजनाओं का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है:


(क) समान कार्यानुसार दर योजना:- यह योजना सामान्य रूप से प्रयोग में लायी जाती है। इसके अंतर्गत समय अध्ययन एवं कार्य मूल्यांकन के मिश्रण पर आधारित उत्पादन की प्रत्येक इकाई के लिए निर्धारित मूल्य लगाया जाता है। उदाहरणार्थ यदि यह मानक निर्धारित किया।


गया हो कि एक घंटे में 100 इकाईयों का उत्पादन किया जायेगा एवं प्रत्येक घंटे के लिए पांच रूपये के आधार दर पर भुगतान किया जायेगा तथा यदि श्रमिक 8 घंटे के कार्य दिवस के दौरान 1000 इकाइयों का उत्पादन करता हो तो पांच रूपये प्रति इकाई की दर पर उसकी सम्पूर्ण आय 5000 रूपये होगी।

सामान्य रूप से इस व्यवस्था के अंतर्गत अनुसूचित कार्य अवधि के लिए प्रति घंटे के अनुसार होने वाली आय का आश्वासन होता है, परंतु अधिक उत्पादन करने पर अधिक आय का भी प्रावधान होता है।


(ख) टेलर की विभेदात्मक कार्यानुसार दर योजना:- वैज्ञानिक प्रबंध की अवधारणा के प्रवर्तक एफ. डब्ल्यू टेलर इस योजना के प्रतिपादक है। इस योजना को जारी रखते हुए यह आशा व्यक्त कि गयी थी कि यह क्षमतावान श्रमिकों को अधिक कार्य करने के लिए प्रेरणा प्रदान करेगी। इस योजना की प्रमुख विशेषता यह है कि इस योजना में उचित कार्य का मानक निश्चित कर लिया जाता है तथा इसी के अनुसार मजदूरी का भुगतान किया जाता है

इसके साथ ही इसमें, मजदूरी की दो दरें पायी जाती है। इन दोनों दरों के बीच पर्याप्त अंतर पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यह योजना प्रेरणादायक होने के साथ ही दण्डात्मक भी है, क्योंकि मानक की पूर्ति न कर पाने वाले श्रमिकों को निम्न दर पर मजदूरी का भुगतान किया जाता है।


(ग) सामूहिक कार्यानुसार दर योजना- कभी-कभी श्रमिक विशेष द्वारा किये गये कार्य तथा उसके समूह द्वारा किये गये कार्य के मध्य अंतर कर पाना कठिन होता है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण कार्य समूह के लिए एक मानक निश्चित कर दिया जाता है। इस विशिष्ट रूप से उल्लिखित मानक से कम उत्पादन के लिए प्रति घंटा मजदूरी की दर निश्चित कर दी जाती हैं।

इस मानक से अधिक उत्पादन के लिए एक सामूहिक बोनस निर्धारित कर दिया जाता है। यह सामूहिक बोनस इन सभी कार्य करने वाले श्रमिकों में समान दर पर अथवा यदि प्रत्येक घंटे के लिए विभिन्न श्रमिकों की आधार दर भिन्न हो तो इस आधार दर पर विभाजित कर दिया जाता है।


(घ) हैल्से योजना:- इस योजना के अंतर्गत पूर्व अनुभव के आधार पर उत्पादन के मानक तथा इसकी प्राप्ति हेतु अपेक्षित एक मानक समय निश्चित कर लिया जाता है। यदि श्रमिक इस मानक समय के व्यतीत हो जाने पर ही मानक समय निश्चित कर लिया जाता है। यदि श्रमिक इस मानक समय के व्यतीत हो जाने पर ही इच्छित मानक कार्य सम्पन्न कर पाता है

तो उसे निश्चित न्यूनतम मजदूरी प्रदान की जाती है। परंतु यदि वह इस समय के पूर्व की अपने कार्य को संपन कर लेता है तो उसे बचाये गये समय की गणना मानक समय से कार्य के वास्तविक घंटों को घटाने के बाद बचे हुए समय को सेवायोजक एवं श्रमिकों दोनों में समान रूप से वितरित करने हेतु दो से विभाजित करते हुए की जाती है।


(ङ) शत प्रतिशत अधिलाभांश योजना- यह योजना श्रमिकों को प्रेरणा प्रदान करने के लिए सबसे उपयुक्त है। इसमें मानक समय एवं इस समय में उत्पादित की जाने वाली मानक इकाइयों की संख्या पहले से तय कर जी जाती है। यदि कोई श्रमिक मानक समय में निर्धारित इकाइयों से अधिक इकाइयों का उत्पादन करता हैं तो उसे इन अतिरिक्त उत्पन्न की गयी इकाइयों पर उसी दर से अधिलाभांश दिया जाता है, जिस दर से अन्य इकाइयों का भुगतान किया जाता है।


(च) बेडो योजना- इस योजना का प्रतिपादन चार्ल्स बेडो ने किया था। इस योजना का प्रयोग उस समय किया जाता है, जबकि सम्पादित किये जाने वाले कार्य से संबन्धित मानकों को सावधानीपूर्वक विकसित किया गया हो। इसमें प्रत्येक क्रिया को बिंदुओं द्वारा व्यक्त किया जाता है। कार्य से सम्बन्धित निश्चित समय के प्रत्येक मिनट को एक बिंदु द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तथा मजदूरी की गणना इन बिंदुओं के आधार पर की जाती है। यदि कोई श्रमिक एक घंटे में 60 बिंदुओं से अधिक कार्य करता है तो उसे अतिरिक्त भुगतान किया जाता है तथा यदि कोई श्रमिक 60 बिंदुओं से कम कार्य करता है तो उसे किसी अन्य कार्य में लगा दिया जाता है।

श्रमिक को बचाये गये समय के एक अंश का ही भुगतान किया जाता है उदाहरणर्थ बचाये गये समय का 80 प्रतिशत लाभ श्रमिकों को तथा 20 प्रतिशत लाभ कार्य से संबंधित अन्य कर्मचारियों जैसे पर्यवेक्षकों आदि को दिया जाता है।


(छ) रोवन योजना- इस योजना का प्रयोग उस समय किया जाता है जबकि संपन किये. जाने वाले कार्य से संबंधित मानक असंतोषजनक होते है तथा प्रबंधकगण श्रमिकों की सम्पूर्ण आय को सीमित करना चाहते हैं। इस योजना के अंतर्गत प्रदान की जाने वाली मजदूरी वास्तव में लगाये गये समय के लिए देय मजदूरी तथा बोनस के बराबर होती है। इस योजना के अंतर्गत बोनस बचाये गये समय पर आधारित न होकर सम्पादित किये गये कार्य के समय पर आधारित होता हैं।