भारत में मजदूरी नीति - wage policy in india
भारत में मजदूरी नीति - wage policy in india
राष्ट्रीय नीतियों में से मजदूरी नीति आर्थिक एवं सामाजिक दोनों की दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रमिकों की सामान्य स्थिति, कार्य कुशलता, कार्य करने की इच्छा कार्य के प्रति वचनबद्धता, मनोबल श्रम प्रबंध संबंध तथा श्रमिकों का संपूर्ण जीवन इससे प्रभावित होते हैं।
भारत में सर्वप्रथम श्रम आयोग द्वारा मजदूरी नियमन की दिशा में सरकारी हस्तक्षेप की संस्तुति की गयी। इस आयोग ने यह विचार व्यक्त किया कि मजदूरी भुगतान को वैधानिक तथा न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए मजदूरी बोर्डो की नियुक्ति की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसकी संस्तुतियों के आधार पर 1936 में मजदूरी भुगतान अधिनियम के पारित किये जाने का बावजूद भी सम्बंधित मजदूरी नीति में कोई विशेष प्रगति न हो सकी।
मजदूरी सम्बंधी नीति के नियमन के क्षेत्र में द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ही राज्य का सक्रिय हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ। श्रम जांच समिति ने मजदूरी निर्धारण के संदर्भ में वैज्ञानिक मनोवृति के अपनाये जाने पर बल दिया। इसके द्वारा मजदूरी नीति के तीन विशिष्ट तत्व स्पष्ट किये
गये ।
1. कठिन परिश्रम वाले उद्योगों, व्यवसायों एवं कृषि में न्यूनत्तम मजदूरी का वैयक्तिक रूप से निर्धारण । 2. उचित मजदूरी सम्बंधी अनुबंधों को प्रोत्साहन ।
3. बागानों में कार्य करने वाले श्रमिकों के लिए जीवन निर्वाह मजदूरी प्रदान करने की दिशा में किये गये प्रयास।
1947 के औद्योगिक शांति प्रस्ताव में कठोर परिश्रम की अपेक्षा करने वाले उद्योगों में वैधानिक रूप से न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने एवं आर्थिक संगठित उद्योगों में उचित मजदूरी सम्बंधी अनुबंधों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया। इस प्रस्ताव के अनुपालन में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 पारित किया गया तथा उचित मजदूरी समिति एवं लाभ सहभाजन समिति का गठन किया गया।
1950 में लागू भारतीय सविंधान में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत मजदूरी सम्बंधी नीति व्यक्त की गयी है
जो कि इस प्रकार है: स्त्रियों एवं पुरुषों दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान भुगतान हो तथा राज्य उपयुक्त विधान अथवा आर्थिक संगठन अथवा किसी प्रकार से कृषि से सम्बंधित औद्योगिक अथवा अन्य सभी श्रमिकों के कार्य, जीवन निर्वाह मजूदरी, सभ्य जीवन स्तर एवं रिक्त समय तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवसरों के पूर्ण आनंद को प्रदान करने वाली कार्य की शर्तों को प्रदान करने के लिए प्रयत्न करेगा।
समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक सम्बंधी निर्देशक सिद्धांत को समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 नामक एक विशिष्ट विधान पारित करते हुए कार्यात्मक रूप प्रदान किया गया।
इसके अतिरिक्त प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर वर्तमान समय तक जितनी भी योजनायें लागू की गयी है उनमें मजदूरी के विषय में विशेष रूप से प्रावधान किये गये हैं।
बोनस
उत्पादकता में अधिकतम वृद्धि के इच्छित राष्ट्रीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बोनस सहित अनेक प्रकार की योजनायें चलायी जाती रही है। बोनस एक प्रकार का प्रलोभन है। प्रलोभन शब्द का प्रयोग उत्साहित करने वाली एक ऐसी शक्ति को सम्बंधित करने के लिए किया जाता है, जिसका समावेश एक लक्ष्य की प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है।
बोनस शब्द को मजदूरी के अतिरिक्त श्रमिकों के पुरस्कार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
भारत में बोनस भुगतान का प्रारम्भ प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद हुआ। अनेकों गोष्ठियों, समितियों, आयोगों एवं न्यायिक संस्थाओं ने समय समय पर बोनस के भुगतान की संस्तुति की थी। परिणामस्वरूप 1961 में एमआर मेहर की अध्यक्षता में बोनस आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने 1964 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इसी वर्ष सरकार ने आयोग द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रतिवेदन की सिफारिशों को कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार कर लिया। आयोग द्वारा प्रस्तुत की गयी सिफारिशों की कार्यान्वित करने के लिए सरकार ने 1965 में एक अध्यादेश जारी किया जिसका स्थान बाद में बोनस भुगतान अधिनियम 1965 ने लिया। इस प्रकार बोनस के भुगतान को उत्पादकता के साथ सम्बधिंत करने तथा बोनस को प्रलोभन के रूप में प्रयोग में लाने को वैधानिक स्वीकृति प्रदान कर दी
मजदूरी अंतर, मजदूरी भुगतान पद्धतियां एवं प्रेरणाएं
सामान्य मजदूरियों के संबंध में उन सामान्य सिद्धांतों की व्याख्या की गयी है जो श्रमिकों को मिलने वाले राष्ट्रीय लाभांश या आय के भाग को निर्धारित करते है।
सापेक्षिक मजदूरी तथा मजदूरी में अंतरों के कारण
सापेक्षिक मजदूरी की समस्या कुछ अलग है। इस संबंध में हमें विभिन्न रोजगारों एवं धंधों या जगहों या रोजगार वर्गों तथा एक ही रोजगार या वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों के बीच मजदूरियों में अंतर के कारणों की व्याख्या करनी होती है। हर जगह मजदूरी प्रवृति श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता के करीब होने की होती है। जो विभिन्न रोजगारों या वर्गों में अलग अलग होती है। यह हर तरह के श्रमिकों की मांग व उनकी कमी की मात्रा के साथ अलग-अलग होती है। यदि रोजगार के पूरे क्षेत्र में श्रमिकों की स्वतंत्र गतिशीलता होती तो वास्तविक मजदूरी की प्रवृति हर तरह के काम में लगे हुए श्रमिकों की सापेक्षिक कुशलता के अनुपात में रहने की होती तथा एक ही स्तर की कुशलता वाले श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी वास्तविक जीवन में श्रमिक एक रोजगार से दूसरे में खास तौर से विभिन्न वर्गो के बीच आजादी से नहीं आ जा सकते। विभिन्न वर्गो की प्रवृति अप्रतियोगी समूहों के हो जाने की ओर होती है।
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