वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - राजनीतिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Political Life
वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - राजनीतिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Political Life
ऋग्वैदिक सभ्यता का केंद्र पंजाब था, लेकिन उत्तर वैदिक काल की सभ्यता का विस्तार पंजाब के अलावा हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तक हो गया था। छोटे-छोटे राज्यों को मिलाकर बड़े राज्यों की स्थापना का वातावरण भी इस काल में होने लगा था। यद्यपि जनों के सम्मिश्रण और दिग्विजयों के फलस्वरूप ऋग्वैदिक काल से ही विशाल राज्यों का उदय हो चला था, तथापि उत्तर वैदिक काल में यह प्रक्रिया और तेज हो गई थी। इस काल के कुछ प्रसिद्ध राज्य थे— गांधार कैकय, मद्र, मत्स्य, कुरु, पंचाल, काशी, कलिंग, अवंति, अश्मक राष्ट्र, विदर्भ, कौसल, विदेह, मगध आदि।
राजनीतिक जीवन
उत्तरवैदिक काल के संपूर्ण साहित्य में राजाओं अथवा राजतंत्रात्मक राज्यों का उल्लेख मिलता है। राजतंत्र के विभिन्न रूप भी मिलते हैं, साम्राज्य का संस्थापक सम्राट कहलाता था। राज्य छोटे और बड़े दोनों प्रकार के ही होते थे। साम्राज्य शक्तिशाली, स्वतंत्र एवं विशाल थे। उत्तरवैदिक साहित्य में राज्य एवं राजा के प्रादुर्भाव के विषय में विभिन्न प्रकार के वर्णन मिलते हैं। अथर्ववेद के अनुसार राज्य नामक संस्था कई वर्षों के क्रमिक विकास का परिणाम है।
राज्य का प्रादुर्भाव
यद्यपि राजा, सभा और समिति जैसी राजकीय संस्थाओं के प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में मिल जाते हैं,
परंतु इसके क्रमिक विकास का विवरण सर्वप्रथम अथर्ववेद में मिलता है। अथर्ववेद के अनुसार सृष्टि के आरंभ में राज्यविहीन दशा थी, जिससे अराजकता फैल रही थी, जिससे भयभीत होकर मनुष्य ने संगठित होना प्रारंभ किया। सर्वप्रथम वे परिवार के रूप में संगठित हुए फिर ग्राम के रूप में। इसके बाद क्रमशः सभा, समिति नामक संगठनों का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार पहले परिवार फिर ग्राम और तब जनपद के रूप में विकास हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण के उल्लेख के अनुसार एक बार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हो रहा था,
जिसमें देवता बार-बार पराजित हो रहे थे। तब उन्होंने वस्तुस्थिति पर विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजविहीन होने के कारण उनकी पराजय हो रही है। अतः उन्होंने सोम को अपना राजा बनाया और उसके नेतृत्व में पुनः युद्ध किया, इस बार उनकी विजय हुई। इसी प्रकार का उल्लेख तैत्तिरीय ब्राह्मण में मिलता है, इसके अनुसार समस्त देवताओं ने मिलकर इंद्र को राजा बनाने का निश्चय किया, क्योंकि वे सब से सबल और प्रतिभाशाली थे। इस प्रकार राजा का प्रादुर्भाव असुरक्षा, असंगठन, पराभव और अशांति को दूर करने के लिए हुआ था। राजपद सबसे अधिक सबल और सुयोग्य व्यक्ति को मिलता था। राजप्रतिष्ठा के पीछे जनमत था। जनता ने आपस में समझौता करके राजा को प्रतिष्ठित किया था।
राजा का देवी अधिकार
वैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि राजा की दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत उत्तरोत्तर मजबूत हो रहा था। ब्राह्मणकाल में यज्ञों की महत्ता बढ़ी और लोगों का विश्वास हो गया कि अश्वमेध और वाजपेय यज्ञों के करने से राजा देवता के समान हो जाता है। सभी ग्रंथों में अधार्मिक और निरंकुश राजा की निंदा की गई है। उनके मत के अनुसार राजा को सदैव धर्म के अनुकूल व्यवहार करना चाहिए।
अनेक वैदिक साक्ष्यों के अनुसार कभी-कभी राजा का निर्वाचन भी होता था। एक स्थान पर कहा गया है कि जिसे समस्त प्रजा तथा राज्य का अनुमोदन प्राप्त होता है, वही राजा होता है।
परंतु समाज में वंशानुगत राजाओं की परंपरा भी प्रतिष्ठित थी।
प्राचीन भारत में राज्याभिषेक का राजनीतिक, धार्मिक और वैधानिक महत्व था। राजा के लिए राज्य के पदाधिकारी रत्नियों का सहयोग और अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक समझा जाता था। जनता में राजा प्रतिष्ठित था। राजा अपनी प्रजा के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझता था।
सभा और समिति
वैदिक साहित्य के अनुसार प्राचीन भारत में राजा का पद निरंकुश नहीं होता था, अपितु उसे परामर्श देने के लिए और उस पर अंकुश रखने के लिए सभा और समिति जैसी राजनीतिक संस्थाएँ थीं।
अथर्ववेद में सभा और समिति का वर्णन प्रजापति की दो पुत्रियों के रूप में हुआ है, जिससे प्रतीत होता है कि वैदिक काल में इन दो संस्थाओं को ईश्वर निर्मित माना जाता था।
सभा शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में भी यदा-कदा किया गया है। सभा के सदस्यों को 'सभेय' कहा गया है। इन विवरणों के अनुसार सभा में प्रायः राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायसंबंधी कार्यों पर विचार-विमर्श किया जाता था। सभा की बैठक में यज्ञ किए जाने की चर्चा की गई है। यज्ञाग्नि को 'सभ्य' कहा जाता था। यजुर्वेद में सभा के प्रमुख को 'सभापति' कहा गया है तथा सभा एवं सभापति को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सभा में राजा की उपस्थिति अनिवार्य होती थी। अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि राजा के लिए सभा का परामर्श अत्यंत महत्वपूर्ण होता था
और वह सभा के निर्णयों की उपेक्षा नहीं कर सकता था। उत्तरवैदिक काल तक सभा एक बृहत राजनीतिक संस्था का रूप ले चुकी थी तथा सभासदों का पद अत्यधिक सम्मान्य समझा जाता था। अथर्ववेद में सभा और फिर समिति का उल्लेख वैधानिक विकास की ओर संकेत करता है। समिति राज्य की केंद्रीय संस्था प्रतीत होती है। अथर्ववेद में राजा के लिए समिति के चिर सहयोग की शुभाकांक्षा प्रकट की गई है। समिति के निर्णय वाद-विवाद के पश्चात् ही होते थे। यह संस्था अत्यंत प्रभावशाली थी। यह राजसंस्था थी, जिसमें राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त दार्शनिक एवं धार्मिक वाद- विवाद भी होते थे। संभवत: इसीलिए वेदों में विचारों की एकता पर बल दिया गया है। अनेक स्थानों पर प्रार्थना की गई है कि समिति की कार्यवाही सौहार्दपूर्ण हो, सदस्यों में मेल-जोल रहे और उसके निर्णय एक मत से हों। उपनिषदों में अनेक स्थलों पर समिति में राजा की अध्यक्षता में होने वाले वाद-विवादों का उल्लेख है, परंतु उपनिषद काल के पश्चात् समिति पूर्ण रूप से तिरोहित हो जाती है, उसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।
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