वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - सामाजिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Social Life

वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - सामाजिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Social Life


उत्तरवैदिक काल में प्रमुख रूप से आर्यजीवन ग्रामों में ही संगठित था। साधारणतया ग्रामीणों का ही ग्रामों के ऊपर सांपत्तिक अधिकार था एवं राजा राजकर का ही अधिकारी था। प्रत्येक ग्राम में अनेक गृह होते थे, जिनमें माता-पिता, भाई-बहन आदि सभी सम्मिलित रूप से रहते थे। परिवार का मुखिया मुख्य रूप से पिता होता था। परिवार के सदस्यों के ऊपर पिता के अधिकार विशाल थे। उसकी संपत्ति पर पुत्रों का अधिकार था। प्रायः घरों में कई कक्ष होते थे।


उत्तरवैदिक कालीन समाज में पुत्रों की अपेक्षा पुत्री की अवस्था हीन थी, परंतु वह नितांत उपेक्षित भी नहीं थी।

अथर्ववेद में ऐसी कन्याओं का उल्लेख भी मिलता है, जो अविवाहित रूप में आजीवन अपने माता- पिता के साथ रहती थीं, परंतु सामान्य रूप में अविवाहित रहने की प्रथा न थी। अविवाहित पुरुष भी अपूर्ण माना जाता था। उसे यज्ञ का अधिकार भी नहीं था। यज्ञादि के लिए पुत्र भी आवश्यक था और उसकी प्राप्ति के लिए विवाह आवश्यक था। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार समाज में पुरुष के बहुविवाह का प्रचलन था, परंतु इसके अधिकांश उदाहरण धनी एवं राजकीय वर्गों में ही मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य पुरुष एकपत्नीक ही था। इस काल में विधवा स्त्री का पुनर्विवाह हो सकता था। अधिकांशतः सजातीय विवाह ही होते थे, यद्यपि कहीं कहीं अंतर्जातीय विवाह के उल्लेख मिलते हैं।


इस युग में स्त्रियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करती थीं और याज्ञिक अनुष्ठान में पुरुषों को सहयोग प्रदान करती थीं। स्त्रियों की संगीत नृत्य में बड़ी रुचि होती थी। गान-विद्या में प्रवीण होने के साथ-साथ वे मंत्रों को भी समझती थीं। उपनिषदों में भी अनेक विदूषी स्त्रियों के उदाहरण मिलते हैं। उपनिषदों में ब्रह्मवादिनी स्त्रियों के दल की जानकारी मिलती है, जिसमें प्रमुख गार्गी थी। जनक की सभा में गार्गी ने याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया था। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भी परम विदूषी थी। उत्तरवैदिक कालीन समाज की स्त्री घरेलू शिक्षा के प्रति भी तत्पर रहती थी। गृहस्थ जीवन में भोजन पकाने के साथ ही ऊन और सूत की कताई- बुनाई का काम भी प्रमुखतया स्त्रियाँ ही करती थीं।


वर्ण व्यवस्था


उत्तरवैदिक काल में वर्ण व्यवस्था काफी विकसित हो चुकी थी। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद के अनेक मंत्रों में चारों वर्णों का उल्लेख है। अथर्ववेद राजन्य, ब्राह्मण, वैश्य एवं शूद्र इन चार सामाजिक विभागों का उल्लेख करता है।


उत्तरवैदिक काल में ब्राह्मणों का सम्मान बढ़ गया था, इसका कारण था कि याज्ञिक कर्मकाण्ड का जटिल रूप इस काल में विकसित हो चुका था। वह दिव्य वर्ण माना जाने लगा, क्योंकि अरण्यों व आश्रमों में निवास करने वाले तत्वचिंतकों को भी ब्राह्मणों के इसी वर्ग में गिना जाने लगा।


विविध आर्यजनों ने जब सप्त सैंधव देश से आगे बढ़कर फैलना शुरू किया तो वहाँ के मूल निवासियों से उन्हें युद्ध करना पड़ा, जिससे जोराजन्य वर्ग युद्ध में अपनी योग्यता प्रदर्शित करते थे, उस प्रकार से भी एक नए वर्ग का विकास हुआ, जिसे 'क्षत्रिय' कहा जाता था। इन व्यक्तियों की स्थिति भी सर्वसाधारण की तुलना में अधिक ऊँची थी।


ब्राह्मणों और क्षत्रियों के अतिरिक्त जो सर्वसाधारण आर्य जनता थी, उसमें सब प्रकार के शिल्पी, वणिक, कृषक, पशुपालक आदि सम्मिलित थे, उसे 'वैश्य' कहा जाता था।

समाज में जो सबसे निम्न वर्ग था और जो आर्य गृहस्थों की सेवा में दास, कर्मकर आदि के रूप में कार्य करता था, उसे शूद्र कहते थे।


तैत्तिरीय ब्राह्मण में ब्राह्मण के लिए सूत के क्षत्रिय के लिए सन के और वैश्य के लिए ऊन के यज्ञोपवीत का विधान किया गया है। इससे विदित होता है कि ब्राह्मण ग्रंथों की रचना के समय में वर्णभेद ने अच्छा विकसित रूप प्राप्त कर लिया था, पर दिए गए उद्धरणों से यह भी स्पष्ट होता है कि वर्ण भेद ने अधिक जटिल रूप प्राप्त नहीं किया था और उसका आधार पूर्णतया जन्म को ही नहीं माना जाता था।


आश्रम व्यवस्था


प्राचीन आर्यों के सामाजिक जीवन में आश्रमों का बहुत महत्व था। चार आश्रम - ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास थे। इन आश्रमों की कल्पना का आधार यह था कि प्रत्येक मनुष्य देवताओं,

ऋषियों, पितरों एवं अन्य मनुष्यों के प्रति ऋणी होता है। अतः मनुष्य का कर्तव्य है यज्ञ द्वारा उनके ऋण को अदा करें। ऋषियों के प्रति ऋण को अदा करने के लिए मनुष्य को उस ज्ञान को कायम रखते हुए उसमें वृद्धि करना चाहिए। इसके लिए मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर ज्ञान उपार्जन करता था। अपने माता-पिता के प्रति मनुष्य का जो ऋण है, उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके ही अदा किया जा सकता था। गृहस्थ धर्म से संतानोत्पत्ति करके अपने पितरों के वंश को जारी रखना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य समझा जाता था। साधारणतः गृहस्थ आश्रम के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे, इसमें अपने ज्ञान को ब्रह्मचारियों को प्रदान करना चाहिए। संन्यास आश्रम में प्रवेश करके मनुष्य अपने साथियों के उपकार करने में समय व्यतीत करता था, इस प्रकार वह मनुष्य ऋण को भी अदा करता था। उसका कर्तव्य था कि वह भ्रमण करते हुए उपकार करे।