वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - धार्मिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Religious Life
वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - धार्मिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Religious Life
भारत के प्राचीन ऋषियों ने जिन सूक्तों का निर्माण या दर्शन दिया, वे वैदिक संहिताओं में संग्रहीत हैं। आर्यों के वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन का क्या नियम हो, वे किन संस्कारों और याज्ञिक कर्मकांड का अनुष्ठान करें— इस महत्वपूर्ण विषय का प्रतिपादन वेदांगों में किया गया है। ब्राह्मण-ग्रंथों में याज्ञिक कर्मकांड का बहुत विशद रूप से प्रतिपादन था। आगे चलकर वैदिक अनुष्ठानों को संक्षेप के साथ प्रतिपादित किया गया।
उत्तरवैदिक काल में याज्ञिक कर्मकाण्ड और विधि-विधानों का रूप निरंतर जटिल होता गया।
इस काल में कतिपय विचारकों ने यज्ञों की जटिलता को निरर्थक समझकर तप, स्वाध्याय और सदाचरण पर जोर देना शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप बहुत से मुनि, योगी और तपस्वी उपनिषदों आदि में वर्णित तत्वचिंतन में प्रवृत्त हुए। याज्ञिक कर्मकाण्ड के वैज्ञानिक विवेचन के लिए इस काल में एवं आगे चलकर दर्शन शास्त्रों का विकास किया गया।
इस युग के देवता प्राकृतिक शक्तियों के मूर्त रूप थे। विश्व की मूल शक्ति जिस प्रकार प्रकृति के विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है, उसे दृष्टि में रख कर आर्यों ने अनेक देवी-देवताओं की कल्पना की थी ।
यज्ञकुंड में अग्नि में अनेक आहुतियाँ दी जाती थीं और देवताओं को तृप्त किया जाता था। धीरे-धीरे यज्ञों का रूप जटिल होता गया। ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञ करने की प्रक्रिया एवं याज्ञिक विधि के प्रयोजन के विषय में बड़े विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक गृहस्थ को अनेक प्रकार के यज्ञ करने होते थे, जिनमें पाँच महायज्ञों का अनुष्ठान आवश्यक था—
1. देवयज्ञ– प्रातः और सांय दोनों कालों में विधिपूर्वक अग्न्याधन करके जो हवन किया जाए, उसे देवयज्ञ या अग्निहोत्र यज्ञ कहते थे।
2. पितृयज्ञ– पितरों और पूजनीय व्यक्तियों के तर्पण व सम्मान का नाम पितृयज्ञ था।
3. नृयज्ञ अतिथियों की सेवा व सत्कार को नृयज्ञ या अतिथियज्ञ कहते थे।
4. ऋषियज्ञ वैदिक ग्रंथों के अनुशीलन को ऋषियज्ञ अथवा ब्रह्म यज्ञ कहते थे।
5. भूतयज्ञ घर में जो भी भोजन बनता था, उसका एक भाग कुत्ते, कौवे और चींटी जैसे प्राणियों के लिए अलग कर दिया जाता था। इसे ही भूतयज्ञ अथवा बलिवैश्वदेवयज्ञ कहते थे।
इन दैनिक यज्ञों के अतिरिक्त विशेष अवसरों पर विशेष यज्ञों का भी विधान था। कतिपय यज्ञ ऐसे भी थे जिनके लिए प्रचुर द्रव्य की आवश्यकता होती थी और जिन्हें विशिष्ट व्यक्ति ही संपादित कर सकते थे।
जब किसी व्यक्ति को राजा के पद पर अधिष्ठित किया जाता था, तो राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान करना आवश्यक था। चक्रवर्ती पद प्राप्त करने की आकांक्षा रखने वाले राजा अश्वमेध यज्ञ किया करते थे। ब्राह्मण ग्रंथों में अजामेध, गोमेध और पुरुषमेध आदि यज्ञों का भी उल्लेख मिलता है, जिनसे यज्ञों में पशुओं और मनुष्यों की बलि देने की बात सूचित होती है।
समस्त वैदिक देवी-देवताओं में वरूण, मित्र, सूर्य, सविता, विष्णु, इंद्र, रुद्र, अग्नि, पृथ्वी, सरस्वती, सोम आदि थे। वैदिक काल में इन मूर्त देवताओं के अतिरिक्त कुछ अमूर्त देवताओं का अस्तित्व भी था।
उत्तरवैदिक युग के धार्मिक जीवन में संस्कारों का स्थान भी बहुत महत्वपूर्ण थे। व्यक्ति के पूर्ण जीवन में संस्कारों की कुल संख्या सोलह थी।
याज्ञिक कर्मकांडों की जटिलता से आगे चलकर असहमति भी व्याप्त होने लगी। जिससे भारत में तत्वचिंतन की उस लहर का प्रारंभ हुआ, जिससे बहुत से मुनि, योगी, तपस्वी का जन्म हुआ। इनके चिंतन के कारण भारत में जो नया ज्ञान विकसित हुआ, वही उपनिषदों और दर्शन ग्रंथों में संग्रहीत है। इस काल में एक ओर कर्मकांड तथा यज्ञों के विधि विधानों में बुराइयाँ घुस रही थीं, तो वहीं दूसरी ओर आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान तथा तत्वचिंतन की शक्तिशाली भावना का उदय और क्रमिक विकास भी हो रहा था। इस काल में भारतीय दर्शन अर्थात् सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक, मीमांसा तथा वेदांत का विकास हुआ।
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