वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - आर्थिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Economic Life

वैदिक काल - उत्तरवैदिक काल (1000-600BC) - आर्थिक जीवन - Vedic Period - Later Vedic Period (1000-600BC) - Economic Life


ऋग्वैदिक युग समान उत्तरवैदिक युग में भी आर्यों के आर्थिक जीवन का मुख्य आधार कृषि ही थी। आर्य जनता का बड़ा भाग खेती द्वारा अपना जीवन निर्वाह करता था। कृषि हल-बैल की सहायता से होती थी। हलों को खींचने के लिए बैल काम में लाए जाते थे। इस युग में ऐसे भारी हलों का प्रयोग भी होने लगा था, जिन्हें खींचने के लिए छह, आठ, बारह या चौबीस बैल जोते जाते थे। ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे भारी हलों के उल्लेख मिलते हैं। ग्रंथों में जोताई बोआई, कटाई और मड़ाई की चर्चा की गई है। जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए गोबर का खाद के रूप में प्रयोग किया जाता था।

ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक स्थानों पर शकृत (गोबर) और करिष (सूखा गोबर) शब्द मिलते हैं। इस युग में खेतों की सिंचाई की समुचित व्यवस्था की जाने लगी थी। वर्षा और कुएँ के अतिरिक्त अथर्व वेद नहरों के पानी का भी उल्लेख करता है। तैत्तिरीय उपनिषद में लिखा है कि अन्न ही ब्रह्म है, उसी से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और उसी से सबकी आजीविका चलती है। अधिक मात्रा में अन्न उत्पादन धान, जौ, उड़द, गन्ना, तिल आदि की कृषि की जाती थी। अन्य ग्रंथों में गेहूँ मूँग, मसूर, आदि उपज का वर्णन भी मिलता है।


कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी इस युग के आर्यों के आर्थिक जीवन का मुख्य आधार था।

वे बड़ी संख्या में गाय, बैल, भेड़, बकरी आदि पशुओं को पाला करते थे। इस समय भी गाय समाज का प्रमुख पशु मानी जाती थी। दूध-घी के लिए भी गायों का उपयोग किया जाता था। गृहस्थ, कृषक के अतिरिक्त मुनि वर्ग भी गोपालन किया करते थे।


अनेक शिल्प और व्यवसाय भी इस युग में विकसित हो चुके थे। इस काल में सोने का उल्लेख बार- बार मिलता है। उत्तरवैदिक काल में सोने के आभूषणों का प्रयोग बहुतायत में होता था। सोने के भाँति चाँदी का भी प्रयोग आभूषणों के निर्माण में किया जाता था। इस युग में त्रपु (टिन), ताम्र, लौह, रजत, सीसे का प्रयोग किया जाने लगा था। इन धातुओं को उपकरणों आदि के निर्माण में प्रयोग में लाया जाता था।

इस काल में ऊनी कपड़ों का निर्माण विशेष रूप से होता था। अथर्ववेद में शण (सन) का उल्लेख हुआ है। इससे वस्त्र, चटाइयाँ आदि बनाई जाती थीं। सूत कातने का कार्य प्रायः स्त्रियाँ ही करती थीं।



अनेक शिल्प और व्यवसाय भी इस युग में विकसित हो गए थे। तन्तुवाय (जुलाहे ), रजक (रंगरेज), रज्जुकार, सुवर्णकार, लौहकार, रथकार, कुंभकार (कुम्हार), नर्तक, गायक, व्याध आदि कई प्रकार के शिल्पियों का उल्लेख ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है। धातुओं के ज्ञान में वृद्धि के कारण इस काल में आर्थिक उत्पादन के साधन बहुत उन्नत हो गए थे। शिल्पियों में तक्षक (बढ़ई), रथकार, कर्मार (धातु शिल्पि ), धन्वकृत (धनुष बनाने वाले) आदि का वर्णन मिलता है।


कृषि और शिल्पों का विकास व्यापार भी इस युग में अच्छी उन्नत दशा में था । अथर्व वेद के अनुसार देश के व्यापारी अपनी सामग्री के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमा करते थे। वस्तुओं के विनिमय के लिए अब सिक्कों का भी प्रयोग किया जाने लगा था। उत्तरवैदिक काल में 'निष्क' का उल्लेख मिलता है। 'निष्क' आभूषण था या सिक्का, इस संबंध में मतभेद है। उत्तर वैदिक साहित्य में 'शतमान' का उल्लेख मिलता है। विद्वानों के अनुसार 'शतमान' मुद्रा थी।


वैदिक ग्रंथों में 'वणिज' शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ व्यापारी है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस युग के कृषक, शिल्पी, व्यापारी अनेक श्रेणियों में संगठित होने लगे थे। ब्राह्मण ग्रंथ में श्रेष्ठी' शब्द मिलता है। कदाचित् यह किसी व्यावसायिक संघ का अध्यक्ष होता था।