मगध साम्राज्य का उत्कर्ष (2) - Magadha Empire flourished(2)
मगध साम्राज्य का उत्कर्ष (2) - Magadha Empire flourished(2)
अवन्ति नरेश चंड प्रद्योत अजातशत्रु का प्रतिद्वंदी था, किंतु वत्सराज उदयन का विवाह अजातशत्रु की पुत्री पद्मावती से हुआ था और वत्सराज ने संभवतः चंड प्रद्योत एवं अजातशत्रु के बीच समझौता करा दिया था। अतः दोनों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष की स्थिति उत्पन्न नहीं हो पाई। इस प्रकार अजातशत्रु के काल में मगध ने एक सर्वोच्च सत्ता का रूप ले लिया था। उसका साम्राज्य पूर्व में बिहार तक, उत्तर में हिमालय की तलहटी तक और पश्चिम में काशी तक विस्तृत था।
धार्मिक दृष्टि से बौद्ध तथा जैन दोनों ही धर्मों के ग्रंथ अजातशत्रु को अपने-अपने धर्म का पोषक मानते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि पहले अजातशत्रु संभवतः जैन मतावलंबी था, किंतु पिता की हत्या के बाद मन अशांत होने पर वह गौतम बुद्ध के संपर्क में आया और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होकर उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उसने अनेक बौद्ध विहारों का पुनर्निर्माण करवाया था और गौतम बुद्ध की मृत्यु के उपरांत उनके अवशेषों पर एक स्तूप का निर्माण भी करवाया था। इसी के काल में प्रथम बौद्ध संगीति हुई थी और बुद्ध के उपदेशों को सुत्तपिटक और विनयपिटक के रूप में लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध ग्रंथों में अजातशत्रु का शासनकाल 32 वर्ष बताया गया है।
उदायिन् (460 ई. पू. से 444 ई.पू.) अजातशत्रु के पश्चात् उनका रानी पद्मावती से उत्पन्न पुत्र उदायिन् अथवा उदयभद सिंहासनारूढ़ हुआ।
बौद्ध ग्रंथों में इसे पितृहंता कहा गया है, किंतु जैन-ग्रंथ परिशिष्टपर्वन के अनुसार यह चंपा का राज्यपाल और अपने पिता का श्रद्धालु पुत्र था। इसने पाटलिपुत्र नगर का निर्माण कराकर अपनी राजधानी को राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित किया था। अवन्ति के साथ मगध की प्रतिद्वंद्विता उदायिन् के काल में भी चल रही थी। चंड प्रद्योत के पुत्र पालक ने उदायिन् की हत्या करवा दी थी। उदायिन् जैन धर्मावलंबी था और उसने अपनी राजधानी में एक जैन चैत्यगृह का निर्माण करवाया था। इसके पश्चात् मगध का उत्तराधिकारक्रम असंदिग्ध रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता। बौद्ध ग्रंथों में उदायिन् के बाद अनिरुद्ध, मुण्ड तथा दर्शक नामक तीन मगध नरेशों के नाम मिलते हैं। कदाचित् अंतिम शासक दर्शक अयोग्य था अतः मौका पाकर जनता ने उसको पदच्युत कर मगध की सत्ता एक योग्य अमात्य शिशुनाग के हाथों में सौंप दी।
शिशुनाग (412 ई. पू. से 394 ई. पू.) - बौद्ध ग्रंथों से ज्ञात होता है कि मगध में बिंबिसार वंश के बाद शिशुनाग वंश ने शासन किया। बिंबिसार और अजातशत्रु के समान शिशुनाग भी मगध का एक योग्य शासक था। इसने अवन्ति के प्रद्योत वंशी शासक अवन्तिवर्धन का अंत कर अवन्ति को भी मगध साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इसने गिरिव्रज को अपनी राजधानी बनाया तथा काशी का प्रतिनिधित्व अपने पुत्र कालाशोक को सौंप दिया। इसके समय तक वत्स और कोसल भी पूर्णतया मगध साम्राज्य में सम्मिलित हो गए थे। अतः शिशुनाग के काल में मगध वास्तव में उत्तर भारत की सर्वोच्च शक्ति बन गया था। शिशुनाग ने 18 वर्ष शासन किया, उसके उपरांत उसका पुत्र कालाशोक मगध के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
कालाशोक (394 ई.पू. से 366 ई. पू.) - पुराणों में कालाशोक का वर्णन काकवर्ण के नाम से किया गया है। इसने पाटलिपुत्र को फिर से मगध की राजधानी बनाया। इसके काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी द्वितीय बौद्ध संगीति। इसमें बौद्ध संप्रदाय दो संप्रदायों स्थविर (Sthaviras) और महासांघिक (Mahasamghikas) में बँट गया। स्थविर परंपरागत नियमों में आस्था रखते थे और महासंधिकों ने बौद्ध धर्म में कुछ नए नियमों को समाविष्ट किया था। बौद्ध सूत्रों के अनुसार कालाशोक ने 28 वर्षों तक राज्य किया। इसके उपरांत किसी ने धोखे से इसके गले में छूरा भोंक कर इसकी हत्या कर दी थी। बौद्ध साहित्य के अनुसार कालाशोक के पश्चात् उसके दस पुत्रों ने सम्मिलित रूप से 22 वर्ष तक राज्य किया। इनके पश्चात् शिशुनाग वंश की समाप्ति हो गई और नंदवंश का राज्य प्रारंभ हुआ।
महापद्मनंद (344 ई. पू. से 322 ई.पू.) शिशुनागवंश के उपरांत मगध पर जिस नए राज्यवंश की स्थापना हुई, वह था 'नंदवंश साहित्यिक-साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि नंदवंश का संस्थापक महापद्मनंद उग्रसेन संभवतः निम्न जाति का व्यक्ति था। पुराणों में इसे स्पष्टतः 'शुद्रागर्भोद्भव' अर्थात 'शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न' कहा गया है। जैन ग्रंथ में इसे नापित पुत्र (नाई का पुत्र) कहा गया है। बौद्ध ग्रंथ महावंशटीका में नंदों को अज्ञात कुल का बताया गया है। सभी विवरणों से स्पष्ट है कि नंदवंश का संस्थापक नीचकुलोत्पन्न था।
नंदकाल विशाल मगध साम्राज्य की स्थापना का काल था।
इसका शासन केवल राजनैतिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण था।
राजनैतिक दृष्टि से महापद्मनंद ने एकच्छत्र राज्य की कल्पना को साकार किया था और अपने उत्तराधिकारियों को एक विशाल सेना, अकूत धन और व्यवस्थित शासन प्रणाली दी थी। सामाजिक दृष्टि से उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि निम्न वर्ग के लोग भी अपनी योग्यता के बल पर शासन की ऊँचाइयों को छू सकते हैं। नंद-साम्राज्य आर्थिक रूप से भी अत्यधिक संपन्न था, जिसका सीधा प्रभाव तत्कालीन सांस्कृतिक विकास पर पड़ा और नंदयुग में पाटलिपुत्र शिक्षा एवं साहित्य का प्रमुख केंद्र बन गया। पाणिनि, कात्यायन, वररुचि आदि इस युग के ख्यातिनाम विद्वान थे।
धार्मिक दृष्टि से नंद शासक जैन मतावलंबी थे। खारबेल के हाथी गुंफा अभिलेख के अनुसार नहर द्वारा सिंचाई करने की परंपरा का प्रारंभ भी नंदों ने किया था।
यद्यपि नंद शासन राजनीतिक दृष्टि से मगध के इतिहास का एक श्रेष्ठ शासन था किंतु इस वंश के शासक अत्यंत धनलोलुप व शोषक प्रवृत्ति के थे अतः उनका शासन दो पीढ़ियों से अधिक नहीं चल सका और शीघ्र ही चाणक्य के निर्देशन में चंद्रगुप्त मौर्य ने इस वंश का अंत कर दिया।
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