प्राचीन भारत में विज्ञान(2) - science in ancient india(2)
प्राचीन भारत में विज्ञान(2) - science in ancient india(2)
ब्रह्मगुप्त
गुप्तयुग के अंतिम चरण का प्रसिद्ध ज्योतिषी और गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त था। उसका जन्म सन् 598 में हुआ था। उसने सन 628 में "ब्रह्म सिद्धांत" नामक ग्रंथ की रचना की। उसके दो अंय ग्रंथ "खंड खाद्य" और "ध्यानग्रह" हैं। उसने न्यूटन के सिद्धांत को पहले ही घोषित कर निरूपण कर दिया था कि प्रकृति के नियम के अनुसार ही समस्त वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती हैं क्योंकि पृथ्वी का स्वभाव सभी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करना और रखना है।" ब्रह्मगुप्त के विशेष विषय थे वर्गमूल और घनमूल त्रैराशिक, ब्याज, श्रेढी, भूमिति, परिमेय समकोणीय त्रिभुज, वृत्त के अवयव, ऋण और धन मात्राएँ, शून्य धन, सरल, बीजीय सर्व समिकाएँ, प्रथम द्वितीय अंशों के अंतर्वर्ती समीकरण, साधारण समीकरण, चक्रीय चतुर्भुज आदि।
उपरोक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि गुप्तयुग में हिंदू ज्योतिषियों ने विशिष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त कर ली थीं। उन्होंने इस बात की खोज कर ली थी कि नभमंडल में ग्रह प्रतिबिंबित प्रकाश से चमकते हैं। उन्होंने • दिन, नक्षत्र और ग्रहण की निश्चित गणना कर ली थी। वे पृथ्वी की अपनी धुरी पर दैनिक चाल से अवगत थे और उन्होंने उसके व्यास की भी गणना की थी। इन बातों से स्पष्ट है कि भारत में गुप्तकाल की ज्योतिष विद्या पश्चिम में अलेक्जेंड्रिया के यूनानी ज्योतिष की अपेक्षा बहुत अधिक उन्नत थी।
चिकित्सा विज्ञान
चिकित्सा विज्ञान या आयुर्वेद का ज्ञान वैदिक युग में था। वेदों में आयुर्वेद का प्रचुर मात्रा में उल्लेख हुआ है। अथर्ववेद में आयुर्वेद की अनेक ज्ञातव्य बातें हैं।
दूसरी सदी तक तो चिकित्सा-विज्ञान में "चरक संहिता" और "सुश्रुत संहिता' नामक ग्रंथ उपलब्ध हो गये। आत्रेय पुनर्वसु के द्वारा उपदिष्ट, उसके शिष्य अग्निवेश के द्वारा रचित तथा चरक और दृढ़बल के द्वारा प्रतिसंस्कृत ग्रंथ चरक संहिता है। चरक और सुश्रुत का चिकित्सा शास्त्र गुप्तकाल में उन्नत रहा, परंतु गुप्तयुग में चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि है रस-चिकित्सा का आविष्कार। सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि खनिज धातुओं में विभिन्न रोगों के निवारण की शक्ति है इस महत्वपूर्ण सिद्धांत ने चिकित्साविज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिया। पारे की भस्म का भी उपचार में प्रयोग किया जाने लगा। काष्ठ और औषधियों के साथ-साथ रस और भस्म का भी प्रयोग किया जाने लगा।
छठी सदी में बागभट्ट चिकित्सा विज्ञान की महान विभूति था। उसका पिता सिंहगुप्त था और गुरू बौद्ध अवलोकित था। इसने अष्टांग संग्रह' नामक ग्रंथ आयुर्वेद पर लिखा। इसमें आयुर्वेद के पूर्व ज्ञान का सारांश प्रस्तुत किया गया है। गुप्तयुग में संभव है आयुर्वेद पर नव नीतिकम्” नामक एक अय ग्रंथ की रचना हुई, जो सन 1890 में पूर्वी तुर्किस्तान में कूचा में प्राप्त हुआ था। बाबर नामक एक सैनिक को यह मिला था, इसलिये इसे कभी-कभी "बाबर मेन्युस्क्रिप्ट' भी कहा जाता है। इसके अक्षरों और लिपि के अध्ययन से प्रतीत होता है कि यह ग्रंथ गुप्तकाल में चौथी सदी में रचा गया। यह ग्रंथ अंयग्रंथों के समान चिकित्सा विज्ञान या आयुर्वेद पर मौलिक विवेचनात्मक ग्रंथ नहीं है, अपितु किसी चिकित्सक के रोग निवारण के विभिन्न नुस्खों का संग्रह है। इसमें चारक आत्रेय, सुश्रुत, हारीत,
जातुकर्ण, क्षारपाणि और पाराशर आचार्यों की संहिताओं के उपयोगी और लाभप्रद नुस्खों और योगों का संग्रह है। इन नुस्खों में 29 चरक संहिता और 6 सुश्रुत संहिता से संग्रहीत किये गये हैं। इस ग्रंथ के सात भाग हैं, जिनमें प्रथम तीन आयुर्वेद से संबंधित हैं। इनमें कई सूत्र या गुरू और उपचार विधियों का वर्णन है। इस ग्रंथ में विभिन्न प्रकार के रसों, चूर्णों, तेलों, “लोशनों" जीवनदायिनी संजीवनियों का वर्णन है और उनके बनाने की विधियाँ भी हैं। बाल रोगों के निदान और उनकी चिकित्सा का भी विवरण है।
गुप्तयुग में शल्य शास्त्र का भी ज्ञान चिकित्सकों को था। चीर-फाड़ का सूक्ष्म परीक्षण करना प्रचलित था। शल्य चिकित्सा के विद्यार्थियों को नश्तर या चीर-फाड़ की छुरी के पकड़ने उससे काटने,
चिन्हित करने और छेदने, घावों को स्वच्छ कर उन्हें भरने, मल्हमों को घावों और चोटों पर लगाने और वमन कराने तथा जुलाब लगाने की औषधियों को काम में लाने की शिक्षा दी जाती थी। गुप्तकाल में मानव चिकित्सा के साथ पशु-चिकित्सा की ओर भी विशेष ध्यान दिया गया था। उत्तर गुप्त काल में कालकाय नामक एक पशु चिकित्सक ने "हस्त्यायुर्वेद' नामक एक ग्रंथ लिखा। इसके 160 अध्यायों में हाथियों के विभिन्न रोगों, उनके निदान, चिकित्सा तथा शल्य का व्यापक वर्णन है। यह ग्रंथ अंग-नरेश रोमपाद और ऋषि पालकाप्य के बीच वार्ता के रूप में लिखा गया है। शालिहोत्र द्वारा रचित "अश्व- शास्त्र" भी संभवतः गुप्तकाल की रचना है। गुप्तयुग में सेना में और राजकीय वैभव में हाथियों और अश्वों का बड़ा महत्व था। अतः उनकी चिकित्सा पद्धति का भी खूब विकास हुआ। 4.2.3.4 रसायन और खनिज
भौतिकी, रसायन और खनिज विज्ञान के संबंध में प्राचीन काल में क्या स्थिति थी, इसकी जानकारी सामान्य रूप में उपलब्ध नहीं है। भारतीय परंपरा में बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन को रसायन का नियामक माना गया है जो कनिष्क के समकालीन थे। ह्वेनसांग के अनुसार नागार्जुन दक्षिण कोशल में निवास करते थे। वे रसायन शास्त्र में सिद्ध थे तथा उन्होंने अत्यंत लंबी आयु देने वाली एक सिद्धवटी का अविष्कार किया था। सोने, चाँदी, तांबे, लोहे आदि के भस्मों द्वारा उन्होंने विविध रोगों की चिकित्सा का विधान भी प्रस्तुत किया था। पारा की खोज उनका सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार था जो रसायन के इतिहास में युगांतकारीघटना है। किंतु इससे संबंधित कोईग्रंथ उपलब्ध नहीं है।
युवान च्वांग और तारानाथ के कथनानुसार सुविख्यात बौद्ध महायान दार्शनिक नागार्जुन रासायनिक और खनिज-शास्त्री भी थे। सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि खनिज धातुओं में भी रोग निवारण की शक्ति है, यह तथ्य उद्घाटित कर उन्होंने रस-चिकित्सा का आविष्कार किया था। चिकित्सा के निमित्त पारद और लौह के उपयोग का उल्लेख वराहमिहिर ने भी किया है। इन सबसे यह अनुमान होता है कि चिकित्सा और रसायन का यह सहयोग, जिसने आगे चल कर विशेष महत्व प्राप्त किया, गुप्तकाल में आरंभ हो गया था।
खनिज - विज्ञान के संबंध में यद्यपि कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है तथापि मेहरौली स्थित लौह स्तंभ इस बात का सबल प्रमाण है कि गुप्तकाल में खनिज विज्ञान अत्यंत विकसित अवस्था में था
और लोगों को धातु-शोधन और ढलाई की कला में अद्भुत दक्षता प्राप्त थी। छः टन वजन के इस 23 फुट 8 इंच लंबे स्तंभ की समूची ढलाई एक साथ की गयी है। इतनी लंबी और वजनी धातु की ढलाई न केवल उन दिनों अंयंत्र अज्ञात थी वरन् आज भी वह सहज नहीं समझी जाती। यह स्तंभ डेढ़ हजार वर्षों से सर्दी, गर्मी, बरसात सहता हुआ खुले में खड़ा है, पर उसमें तनिक भी न तो जंग लगा है और न किसी प्रकार की विकृति उत्पन्न हुई है। इस स्तंभ का धातु-शोधन आज तक लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है।
शिल्प-विज्ञान
प्राचीन कालीन भारत में स्तूप, भवन, प्रासाद, सिक्के, मूर्तियाँ, खिलौने और मंदिर निर्मित हुए। इससे विदित होता है कि पाषाणकला, धातुकला, काष्ठकला, वास्तुकला, मूर्तिकला और मंदिर निर्माण कला ने विज्ञान का रूप ले लिया था और उनके विषय में निश्चित ही कोई विधान विकसित हो गया था। वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ वृहत्संहिता में वास्तुविद्या और मूर्तिकला पर विभिन्न अध्याय लिखे हैं। इसी प्रकार "विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी इन विषयों पर चर्चा की गई है। इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का मत है कि किसी अज्ञात शिल्पविद ने तक्षणकला और वास्तुकला पर मानसार" नामक ग्रंथ की रचना की। यह शिल्पशास्त्र पर अत्यंत उपयोगी और विस्तृत ग्रंथ है। परमार काल में राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथ 'समरांगण सूत्रधार" स्थापत्य कला के क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण माना जाता है।
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