सूत्रयुगीन समाज (2) - Sutra Yuga Samaj (2)

सूत्रयुगीन समाज (2) - Sutra Yuga Samaj (2)

 नैतिकता और शिष्टाचार


जीवन की पवित्रता, सदाचार, नैतिकता तथा सगों पर अधिक बल दिया जाता था। आचरण की शुद्धता, संयमी जीवन और आत्मनिग्रह पर बड़ा जोर दिया जाता था। दैनिक जीवन में शिष्टाचार का बड़ा महत्व था। गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना होती थी, विनयशील और उदारवृत्ति का होना श्रेयस्कर माना जाता था। दैनिक स्नान-ध्यान, आचमन, प्रक्षालन, शारीरिक और मानसिक पवित्रता, विचारों की श्रेष्ठता आदि पर विशेष ध्यान दिया जाता था। स्त्रियों के चरित्रवान होने की अपेक्षा की जाती थी।


शिक्षा


उपनयन संस्कार के पश्चात् शिक्षाप्रारंभ की जाती थी। विद्यार्थी को गुरुगृह में शिक्षा के लिए कई वर्षों तक रहना पड़ता था।

वहाँ उसे शिक्षा के लिए जाना पड़ता था। उसकी सभी आवश्यकताएँ गुरु द्वारा पूरी की जाती थीं। उसके पालन-पोषण और शिक्षा का भार गुरु पर होता था। विद्यार्थी जीवन बड़ा कठोर और संयमी होता था। भोजन, वस्त्र, शयन, आराम, उपहास, स्त्री-संपर्क आदि नियमों के लिए इन पर कड़े प्रतिबंध थे। उनके लिए ब्रह्मचारी होना अनिवार्य था। वे व्रत और उपवास भी रखते थे। उनके नैतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक तथा मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास पर भी ध्यान दिया जाता था। शारीरिक विकास के लिए योग, प्राणायम और व्यायाम आवश्यक माने गये थे। चरित्र गठन पर अधिक बल दिया जाता था। शिक्षा मौखिक रूप से दी जाती थी। पाठों को कण्ठाग्र किया जाता था। अध्याय के विषय में वेदों का अध्ययन, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, ब्रह्मविद्या, सैनिक, शिक्षा, भूत, विद्या, देवजन विद्या आदि थे। शास्त्रार्थ वाद-विवाद और धर्म-चर्चा आदि आयोजित किये जाते थे जिनमें विद्यार्थी और गुरु भाग लेते थे। शिक्षा की समाप्ति पर समावर्तन संस्कार होता था। 


नारी की स्थिति


उत्तरवैदिक युग की अपेक्षा सूत्र युग में स्त्रियों की स्थिति निम्नतम हो गयी थी। पुरुषों की अपेक्षा उनका स्थान निम्नतर था। कन्या का जन्म शुभ नहीं माना जाता था। परंतु कन्याओं की शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाता था। आश्वलायन गृह-सूत्र में कन्याओं के समावर्तन संस्कार का वर्णन हैं जो उनकी • शिक्षा समाप्त होने पर आयोजित किया जाता था। हारीत ने कन्याओं के लिए उपनयन संस्कार माना है। इससे प्रतीत होता है कि कन्याएँ ब्रह्मचर्याश्रम में रहकर विद्याध्ययन करती थीं। वे भी वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करती थीं। परंतु उनकी शिक्षा प्रायः घर में होती थी। कई खिया बड़ी विदुषी होती थीं। आश्वलायन के गृह-सूत्र में गार्गी, वाचवनवी, वड़वा, प्रतिथेपी, सुलभा, मैत्रेयी आदि विदुषी स्त्रियों का उल्लेख है। कुछ स्त्रियाँ विद्याध्ययन के पश्चात् गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की अपेक्षा जीवन भर ब्रह्मचारिणी रहती थीं और विद्याध्ययन, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक प्रगति में अपना शेष जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी स्त्रियों को ब्रह्मवादिनी कहते थे।


बौधायन, वशिष्ठ और गौतम सूत्रकारों ने समाज में स्त्री को पुरुष के अधीन माना है। पुरुष के साथ-साथ समानता के अधिकारों से अब वह वंचित कर दी गयी थी। अब वह पुरुष पर आश्रित मानी जाने लगी थी। अपने शैशवकाल में स्त्री को अपने पिता की देखरेख और संरक्षण में रहना पड़ता था, यौवनकाल और प्रौढावस्था में पति के अधीन और वृद्धावस्था में अपने पुत्र पर आश्रित रहना पड़ता था। अब वह पुरुष के साथ समानता के अधिकारों से वंचित कर दी गयी थी। गौतम ने तो यहाँ तक लिखा है कि खियाँ धार्मिक कर्मकांड और क्रिया-विधियाँ करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। फिर भी समाज में नारियों का सम्मान था। उनके लिए संस्कार निश्चित थे, उनकी शिक्षा की व्यवस्था थी और वे वेदों का पठन-पाठन कर सकती थीं। सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों,

समारोहों और उत्सवों पर वे अपने पतियों के साथ रहती थीं और उन्हें सहयोग और सहायता देती थीं। गृहणी के रूप में परिवार में उनका पद श्रेष्ठ माना जाता था और माता के रूप में वे पूजनीय और सम्माननीय समझी जाती थीं। उन्हें संगीत नृत्य और अंय मनोरंजन में भाग लेने का अधिकार था। समाज में पर्दा प्रथा का प्रचलन न होने से साधारणतया स्त्रियों की दशा सन्तोषप्रद थी।


विवाह संस्कार


समाज में विवाह एक पवित्र बंधन माना जाता था। वयस्क अवस्था में ही विवाह होते थे। बाल- विवाह का अभाव था। साधारण पुरुष एकपत्नीक होते थे, परंतु राजवंश और धनसंपन्न परिवारों में पुरुष बहुपत्नीक होते थे। कभी-कभी पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुष एक से अधिक पत्नियाँ रखते थे ।

विधवा स्त्रियाँ समाज में रहती थीं। आपस्तंब ने अपने गृह्य-सूत्र में लिखा है कि विधवा स्त्री अपने पति के शव के अग्नि- संस्कार के पश्चात् शमशान से घर लौटती थी। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सती प्रथा प्रचलित नहीं थी। सपिण्ड और सगोत्र विवाह की भी प्रथा नहीं थी। सपिण्ड विवाह से तात्पर्य है कि जहाँ रक्त संबंध हो, वहाँ विवाह न करना । फलतः काका, फूफा, मौसा और मामा की कन्या से विवाह वर्जित था। इसी प्रकार एक ही गोत्र वाले युवक-युवती के विवाह का भी निषेध था। सवर्ण विवाह सर्वमान्य थे, परंतु अंतर्जातीय विवाह भी होते थे। अंतर्जातीय विवाह दो प्रकार के होते थे प्रथम, अनुलोम विवाह और द्वितीय प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह में उच्च वर्ण का पुरुष निम्न वर्ण की स्त्री के साथ विवाह करता था, उदाहरणार्थ,

ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय स्त्री का परस्पर विवाह प्रतिलोम विवाह में निम्न वर्ण का पुरुष उच्च वर्ण की स्त्री के साथ विवाह करता था, जैसे क्षत्रिय पुरुष और ब्राह्मण स्त्री तथा वैश्य पुरुष और क्षत्रिय स्त्री का परस्पर विवाह। परंतु ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लोगों को शूद्र स्त्री से विवाह करने का अधिकार नहीं था। सूत्रकारों ने प्रतिलोम विवाहों का विरोध किया। सूत्र ग्रंथों में मुख्य रूप से आठ 'प्रकार के विवाहों का उल्लेख है।


1. ब्रह्म विवाह


इसमें पिता अपनी वयस्क कन्या का विवाह सुयोग्य वर से करता था। यह समाज में सर्वश्रेष्ठ और सर्वमान्य विवाह होता था।


2. देव विवाह


इसमें यज्ञ कराने वाले पुरोहित के साथ यजमान की कन्या का विवाह होता था।


3. आर्य विवाह


इसमें पिता वर से कुछ गाय, बैल, कन्या के बदले में लेता था। 


4. प्राजापत्य विवाह


इसमें कन्या का पिता वर के साथ विवाह कर दोनों को ही धार्मिक कार्य में संलग्न रहने का आदेश देता था। 


5. गन्धर्व विवाह


इसमें वयस्क युवक और युवती अनुराग में स्वयं विवाह कर लेते थे।


6. असुर विवाह


इसमें कन्या बेची जाती थी और वर की ओर से कन्या के पिता को धन प्राप्त होता था।


7. राक्षस विवाह


इसमें वर कन्या का अपहरण कर उसके साथ विवाह कर लियाजाता था। कभी यह अपहरण कन्या की स्वीकृति से होता था और कभी बलपूर्वका 


8. पैशाच विवाह


सोती हुई, बेहोश या पागल कन्या के साथ बलात्कार करने वाले व्यक्ति के साथ उस कन्या का विवाह कर दिया जाता था। राक्षस विवाह और पैशाच विवाह अधर्म विवाह माने जाते थे।



शिष्ट धर्म-सूत्र में कुछ विशेष परिस्थितियों में विधवा के पुनर्विवाह की अनुमति दी गयी थी। गौतम ने लिखा है कि विधवा स्त्री पुत्र प्राप्ति की इच्छा से सजातीय पुरुष के साथ नियोग कर सकती थी । ऐसे नियोग से उत्पन्न संतान को क्षेत्रज कहा जाता था। कुछ विशेष परिस्थितियों में स्त्री अपने पति को तथा पति अपनी स्त्री का तलाक दे सकता था और वैवाहिक संबंधविच्छेद कर सकता था। वशिष्ठ के अनुसार पति के उन्मत्त या पतित होने पर खी उसे त्याग कर सकती थी। बौधायन ने लिखा है कि बाँझ स्त्री से दसवें वर्ष, केवल कन्या पैदा करने वाली स्त्री से बारहवें वर्ष और संतान जीवित न रहने वाली खी से पंद्रहवें वर्ष पति अपना संबंधविच्छेद कर सकता था। लड़ाकू पत्नी का भी परित्याग किया जा सकता था।