प्राचीन भारत में प्रौद्योगिकी(2) - Technology in Ancient India(2)
प्राचीन भारत में प्रौद्योगिकी(2) - Technology in Ancient India(2)
मौर्य काल
मौर्य काल में पाषाण एवं लौह प्रौद्योगिकी का अत्यधिक विकास हुआ। अशोक के एकाश्मक स्तंभ पाषाण तराशने की कला की उत्कृष्टता के साक्षी हैं। लगभग पचास टन वजन तथा तीस फीट से अधिक की ऊँचाई वाले स्तंभों को पाँच-छह सौ मील की दूरी तक ले जाकर स्थापित करना तत्कालीन अभियांत्रिकी कुशलता को सूचित करता है। ऐसा ही एक अंय उदाहरण सुदर्शन झील का निर्माण भी है। पुरातात्विक उत्खनन में इस काल के लोहे के औजार और हथियार बड़ी संख्या में मिलते हैं।
मौर्योत्तर काल
मौर्योत्तर काल में हुई प्रौद्योगिक प्रगति अत्यंत महत्वपूर्ण है। महावस्तु में राजगृह नगर में निवास करने वाले 36 प्रकार के शिल्पियों अथवा कामगारों का उल्लेख मिलता है
तथा मिलिंदपन्हो में 75 व्यवसायों का उल्लेख है जिनमें लगभग 60 विभिन्न प्रकार के शिल्पों से संबद्ध थे। आठ शिल्प सोना, चाँदी, सीसा, टिन, ताँबा, पीतल, लोहा तथा हीरे-जवाहरात जैसे उत्पादों से संबंधित थे। ऐसा प्रतीत होता है कि इस काल में धातुकर्म के क्षेत्र में पर्याप्त निपुणता हासिल कर ली गयी थी। लोहा तकनीक का ज्ञान भी बहुत बढ़ गया था। विदेशी स्रोतों से अबीसीनिया के बंदरगाहों में भारत से आयात की जाने वाली वस्तुओं की जो सूची दी है जिनमें लोहे तथा इस्पात का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। प्रौद्योगिक प्रगति के परिणामस्वरूप तीसरी शताब्दी तक भारत में नगरीकरण अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया।
गुप्त काल
गुप्तकाल में भी प्रौद्योगिक उन्नति के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं।
अमरकोष में लोहे के लिये सात नाम दिये गये हैं। पाँच नाम हल के फाल से संबंधित हैं। मेहरौली लौह स्तंभ से सूचित होता है कि गुप्तकाल में लौह तकनीक का ज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था, किंतु इसके बाद तकनीकी विकास को समझने हेतु कोई स्रोत उपलब्ध नहीं है। इस काल में बहुसंख्यक काँस्य कृतियों का भी निर्माण हुआ। सुल्तानगंज (बिहार) से प्राप्त महात्मा बुद्ध की लगभग साढ़े सात फुट ऊँची एक टन भार वाली काँस्य प्रतिमा उल्लेखनीय है। धातु प्रौद्योगिकी के सुविकसित होने का प्रमाण सिक्कों तथा मुहरों की बहुलता में देखा जा सकता है। धातु विद्या को चैंसठ कलाओं में सम्मिलित कर लिया गया। बहुमूल्य धातुओं एवं पत्थरों से आभूषण तैयार करने का उद्योग भी प्रगति पर था।
गुप्तोत्तर काल
गुप्तोत्तर काल में भी प्रौद्योगिकी का विकास हुआ यद्यपि इस काल में इस दिशा में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ।
कृषि की उन्नति तथा व्यापक आधार प्राप्त कर लेने के फलस्वरूप सिंचाई तकनीक उन्नत हो गयी थी। राजतरंगिणी में खूया नामक इंजीनियर का उल्लेख है जिसने झेलम तट पर बाँध बनवाया तथा नहरें निकलवायी थीं। चंदेल तथा परमार शासकों के काल में बड़ी-बड़ी झीलों तथा तालाबों का निर्माण हुआ। अधिकतर सिंचाई रहट से की जाती थी। राजपूत काल में कई प्रकार के उद्योग- धंदे विकसित अवस्था में थे। शिल्पकारों तथा व्यापारियों की अनेक श्रेणियाँ थीं। खानों से धातुयें निकाली जाती थीं तथा उनसे उपकरण एवं बर्तन, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र आदि तैयार किये जाते थे।
साहित्यिक तथा पुरातात्विक, दोनों ही प्रमाण ताम्र, काँस्य तथा लौह तकनीक के सुविकसित होने के प्रमाण देते हैं। तेरहवीं शती के संग्रह रसरत्न समुच्चय में लोहे की कई किस्मों का उल्लेख किया गया है- मुंड, तीक्षा, कांत आदि। प्रत्येक के कई उपभेद भी मिलते हैं। इनसे सूचित होता है कि लौह तकनीक के क्षेत्र में उच्च कोटि की निपुणता प्राप्त कर ली गयी थी। इस काल में बने चंदेल, परमार, प्रतीहार तथा कलचुरि मंदिर उच्च- कोटि कला तथा तकनीक कर प्रदर्शन करते हैं। अस्त्र-शस्त्र भी निर्मित किये जाते थे। अंय धातुओं में सोना, काँसा, ताँबा आदि से आभूषण, उपकरण एवं बर्तन बनाने का उद्योग भी विकसित था । काँसे की ढलाई कर मूर्तियाँ तैयार की जाती थीं। मूर्ति बनाने वाले को 'रूपकार' तथा पीतल पर काम करने वाले कर्मकार को 'पीतलहार' कहा जाता था। चर्म उद्योग भी प्रगति पर था।
मार्को पोलो नामक यात्री गुजरात के अद्भुत एवं सुविकसित चर्म उद्योग का उल्लेख करता है। वहाँ के शिल्पी लाल तथा नीले चमड़े से सुंदर-सुंदर चटाइयाँ बनाते थे जिनपर पशु-पक्षियों के चित्र बने होते थे। पाषाण एवं काष्ठ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी उन्नति हुई।
दक्षिण भारत
दक्षिण भारत भी प्रौद्योगिकी के विकास की दृष्टि से अत्याधिक समृद्ध रहा। सिंचाई के लिये जो बहुसंख्यक तालाबों एवं बाँधों का निर्माण करवाया गया था जिनमें उच्चकोटि की तकनीकी कुशलता दिखाई देती है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण कावेरी नदी तट पर चोल राजाओं द्वारा श्रीरंगम् टापू के नीचे बनवाया गया बाँध है
जो 1240 मीटर लंबा और 12 से 18 मीटर चौड़ा था। दक्षिण भारत में विविध प्रकार के शिल्प एवं उद्योग धंदे प्रचलित थे। वस्त्र उद्योग, नमक उद्योग, मोती, सीप आदि के व्यवसाय सभी प्रगति पर थे। दक्षिण भारत से बहुसंख्यक पाषाण मंदिर तथा मूर्तियाँ मिलती हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की नक्काशी की गयी है। इससे पाषाण तकनीक के उन्नत होने का प्रमाण मिलता है। सातवाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य, पल्लव तथा चोलकालीन मूर्तियाँ एवं मंदिर उच्च तकनीक के उदाहरण हैं।
धातु मूर्तिकला की दृष्टि से चोल काल अपनी कलात्मकता और सौंदर्यबोध के लिए विश्वविख्यात है।
इन्हें प्राय: 'लास्टवैक्स' विधि से बनाया गया है। इन काँस्यमूर्तियों की रचना में ताँबे की मात्रा और अनुपात अधिक रहता है। विषय की दृष्टि से इनमें देवताओं, संतों और भक्त के रूप में राजाओं की मूर्तियाँ ढाली गयी हैं। देवमूर्तियों के निर्माण में शास्त्रीय मान्यताओं का पूरी तरह से पालन किया गया है। अधिकांश मूर्तियाँ नवताल में बनी हैं। शैली की दृष्टि से प्रायः धातुमूर्तियों में कोई भेद नहीं है। मुख्यतया आरंभिक चोल मूर्तियाँ तो अपने काल की प्रस्तर मूर्तियों की शैली का पालन करती हैं।
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