छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आंदोलन : भौतिकतावादी संप्रदाय चार्वाक - 6th century BC Religious movement in: Materialist sect Charvaka
छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आंदोलन : भौतिकतावादी संप्रदाय चार्वाक - 6th century BC Religious movement in: Materialist sect Charvaka
चार्वाक संप्रदाय के प्रणेता
चार्वाक एक नास्तिक तत्वज्ञानी मुनि थे। अवंति देश की क्षिप्रा और चामसा नदी के संगम पर स्थित शंखोद्वार नामक क्षेत्र में इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम इंदुकांत और माता का नाम रुक्मिणी था। वे 'प्रवचनाशास्त्र के रचयिता, बृहस्पति के शिष्य और 'चार्वाक ध्वनि' के रचयिता थे। वे प्रत्यक्षवादी थे और उनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन चार्वाक दर्शन के नाम से विख्यात है।
चार्वाक दर्शन
कदाचित् मानव जीवन का सबसे प्राचीन दर्शन चार्वाक दर्शन है। इसे लोकायत या लोकायतिक दर्शन भी कहते हैं।
लोकायत का शाब्दिक अर्थ है 'जो मत लोगों के बीच व्याप्त है, जो विचार जनसामान्य में प्रचलित है। माना जाता है कि 'लोकायत' विचार का कोई प्रणेता नहीं है, परंतु इसे दर्शन रूप में स्थापित करने का श्रेय आचार्य बृहस्पति को दिया जाता है, जो कदाचित् देवगुरु बृहस्पति से भिन्न थे। चार्वाक को उनका शिष्य बताया जाता है, जिसने इस विशुद्ध भौतिकवादी विचारधारा को प्रचारित प्रसारित किया। संभवतः इसीलिए इसका नाम इस दर्शन से जुड़ गया। कुछ विद्धानों के अनुसार चार्वाक नाम भी उसका मौलिक नाम नहीं था। उसके नाम की व्याख्या इस प्रकार दी गई है 'चारु : लोकसम्मतो वाको वाक्यं यस्या अर्थात् लोकलुभावन और आम जन को प्रिय लगने वाला वचन कहता हो,
प्रचारित करता हो, वह चारुवाका कालांतर में यही बदलकर चार्वाक हो गया। जो सीधे तौर से समझ में आए और सुविधाजनक लगे, जीवन का वैसा रास्ता जो दिखाए वह चार्वाका
तार्किक और विचारशील मनीषी चार्वाक एक समर्पित विज्ञान संचारक थे, उनके अनुसार जो प्रत्यक्ष है, वही प्रमाण है। उनके विचार के अनुसार आत्मा का देह से पृथक कोई अस्तित्व नहीं है। उन्होंने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है, न तो कोई स्वर्ग है और न कोई अंतिम मोक्ष और न ही शरीर के परे आत्मा है। उनके अनुसार चार वर्णों की कर्म व्यवस्था का भी कोई फल नहीं होता।
'न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पालौकिकः नैव वर्नाश्रमादीनाम क्रियष्चफल्देविका चार्वाक ने ईश्वर के अस्तित्व को इसलिए नकारा, क्योंकि उन्हें इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं दिखा, जबकि समाज में ईश्वर के नाम पर लोगों को शोषित करने का निंदनीय कार्य प्रचलित था। चार्वाक जीवन दर्शन का सार निम्न कथन में निहित है -
यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः योवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिषचराः ।
इसके अनुसार मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिए। ऋण करके भी घी पिए अर्थात् सुख भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़े उन्हें करे।
दूसरों से उधार लेकर भी भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं। परलोक, पुनर्जन्म, आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करें। जो शरीर मृत्यु के पश्चात् दाह- संस्कार में राख हो जाता है, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही नहीं उठता। जो भी है, इस शरीर के जीवित रहते ही है, उसके बाद कुछ भी नहीं बचता है। इस तथ्य को समझकर ही मनुष्य को सुख भोगना चाहिए, चाहे उधार लेकर ही सही। उनके अनुसार वेदों के रचयिता ने आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य जैसी बातों के भ्रम फैलाकर लोगों में भ्रम फैलाया है।
चार्वाक दर्शन नास्तिकवादी एवं अनीश्वरवादी है। इस दर्शन के अनुसार जिसके भी अस्तित्व का ज्ञान देख-सुनकर अथवा अन्य प्रकार से किया जा सकता है, वही इंद्रियगम्य है।
जिस भी ज्ञान को चिंतन मनन से मिलने की बात कही जाती है, वह भ्रामक है, मिथ्या है, क्योंकि वह महज अनुमान पर टिका है। आत्मा- परमात्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, अतः पाप-पुण्य, स्वर्ग नर्क का वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। चार्वाक सिद्धांत चार तत्वों, पृथ्वी, जल, अग्नि एवं वायु को मान्यता देता है। समस्त जीव-निर्जीव इन्हीं के संयोग से बने हैं। स्थूल वस्तुओं अथवा जीवों की रचना में 'आकाश' का भी कोई योगदान नहीं रहता है। अतः चार्वाक सिद्धांत आकाश को पाँचवें तत्व के रूप में स्वीकार नहीं करता है। अन्य कई दर्शन 'आकाश' को सम्मिलित कर पाँच महाभूतों को भौतिक सृष्टि का आधार मानते हैं। चार्वाक के अनुसार मनुष्यों एवं अन्य जीवों की चेतना इन्हीं मौलिक तत्वों के परस्पर मेल से उत्पन्न होती है। शरीर के अपने अवयवों में बिखरने से उसके साथ यह चेतना भी लुप्त हो जाती है।
चार्वाक के कथन के अनुसार जिस प्रकार पान के पत्ते तथा सुपाड़ी के चूर्ण के संयोग से लाल रंग होठों पर छा जाता है, उसी प्रकार इन चेतनाशून्य घटक तत्वों के परस्पर संयोग से चेतना की उत्पत्ति होती है। अर्थात् चेतना आत्मा या अन्य किसी अभौतिक सत्ता के विद्यमान होने से नहीं आती है।
चार्वाक दर्शन एवं भौतिकवाद- चार्वाक दर्शन वस्तुतः आज का विज्ञान पोषित भौतिकवाद है. जिसकी मान्यता है कि समस्त सृष्टि भौतिक पदार्थ और उससे अनन्य रूप से संबद्ध ऊर्जा का ही कमाल है। पदार्थ से ही जीवधारियों की रचना होती है। उसमें किसी अभौतिक सत्ता की कोई भूमिका नहीं है। जीव रचना की जटिलता के साथ ही चेतना का भी उदय हुआ है। ऐसी संरचना के निरंतर विकास के फलस्वरूप मानव का जन्म हुआ है। वैज्ञानिकों का एक वर्ग यह मानता है कि चेतना का मूल कारण भौतिकी के प्राकृतिक नियम में ही है। आधुनिक विज्ञान पदार्थमूलक है, उसका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है। आज के विज्ञानमूलक भौतिक दर्शन में चार्वाक दर्शन की छवि मिलती हैं।
वार्तालाप में शामिल हों