छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आंदोलन : भौतिकतावादी संप्रदाय आजीवक - 6th century BC Religious movement in : Materialist Sect Ajivika

छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आंदोलन : भौतिकतावादी संप्रदाय आजीवक - 6th century BC Religious movement in : Materialist Sect Ajivika


आजीवक संप्रदाय के प्रणेता-गोसाल


प्राचीन भारत के इतिहास में धर्म प्रवर्तक के रूप में मक्खलिपुत्र गोसाल का भी नाम मिलता है। गोसाल गौतम बुद्ध एवं महावीर के समकालीन माने जाते हैं। इनके प्रारंभिक जीवन के विषय में बहुत पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र के अनुसार इनके पिता का नाम मक्खली एवं माता का नाम भद्दा (Bhadda) था। इनका जन्म गोशाला में हुआ था, जिससे उन्हें 'गोसाल' नाम दिया गया। गोसाल के पिता भी संभवतः धार्मिक गीत गाते हुए भ्रमण करते रहने वाले संत थे। गोसाल भी बचपन से ही धर्म के प्रति आकर्षित एवं समर्पित थे। इनके बचपन की जानकारी के स्रोत भी बौद्ध एवं जैन ग्रंथ ही हैं। आजीवक संप्रदाय के ग्रंथों से जानकारी नहीं मिलती है।


जैन ग्रंथों के अनुसार मक्खलीपुत्र गोसाल छोटी आयु में ही भिक्खु हो गया था। शीघ्र ही वर्धमान महावीर से उनका परिचय हुआ, जो 'केवलिन' पद पाकर अपने विचारों का जनता में प्रसार करने में संलग्न थे। गोसाल महावीर के साथ ही रहने लगे, परंतु इन दोनों के आचार-विचार, स्वभाव, चरित्र एक दूसरे से भिन्न थे, जिससे छह साल बाद उनका साथ एक दूसरे से छूट गया। गोसाल ने एक पृथक संप्रदाय की स्थापना की, जो आगे चलकर आजीवक संप्रदाय के नाम से विख्यात हुआ। गोसाल ने अपने कार्य का मुख्य केंद्र श्रावस्ती को बनाया। श्रावस्ती के बाहर एक कुंभकार स्त्री के यहाँ अतिथि होकर उन्होंने निवास प्रारंभ किया, धीरे-धीरे उसके बहुत-से अनुयायी हो गए।


आजीवक दर्शन


आजीवक संप्रदाय के विचार मुख्य रूप से सामंजफलसुत्त' (Sammannaphala Sutra) तथा 'भगवतीसूत्र' में प्राप्त होते हैं। इनके कुछ मंतव्यों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। आजीवक पुरुषार्थ में विश्वास नहीं करते थे, वे नियति को ही मनुष्य की सभी अवस्थाओं के लिए उत्तरदायी ठहराते थे। उनके नियतिवाद में पुरुष के बल या पराक्रम का कोई स्थान नहीं था। वे मानते थे कि संसार में सब बातें पहले से ही नियत हैं। 'जो होना है, वही होगा।' अगर भाग्य न हो, तो आई हुई चीज़ भी नष्ट हो जाती है। नियति के बल से जो कुछ होना है, वह चाहे शुभ हो या अशुभ, अवश्य होकर रहेगा। मनुष्य के पुरजोर प्रयत्न से भी वह बदल नहीं सकता इसीलिए आजीवक लोग पौरुष,

कर्म और उत्थान की अपेक्षा भाग्य या नियति को अधिक बलवान मानते थे। आजीवकों के अनुसार वस्तुओं में जो विकार व परिवर्तन होते हैं, उनका कोई कारण नहीं होता है। वह सब नियत है, मनुष्य का अपने पुरुषार्थ से उसे बदलना असंभव है।


वर्धमान महावीर के साथ गोसाल का जिन बातों पर मतभेद हुआ, उनमें मुख्य निम्नलिखित थीं— शीतल जल का उपयोग करना, अपने लिए विशेष रूप से तैयार भोजन ग्रहण करना, स्त्रियों से संबंध स्थापित करना। मक्खलिपुत्र गोसाल की प्रवृत्ति भोग की ओर अधिक थी। महावीर की तपस्यामय जीवन प्रणाली उसे पसंद नहीं थी। अतः बुद्ध ने भी आजीविकों को ऐसा संप्रदाय माना जो ब्रह्मचर्य को महत्व नहीं देते थे।


वैसे आजीवक भिक्षु का जीवन बड़ा सादा होता था। वे प्रायः हथेली पर रखकर भोजन किया करते थे। उनके लिए माँस, मछली और मदिरा का सेवन वर्जित था। वे दिन में केवल एक बार भिक्षा माँगकर भोजन करते थे।


आजीवक संप्रदाय का भी पर्याप्त प्रसार हुआ था। सम्राट अशोक के शिलालेखों में ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है कि उसने गुहा निवास आजीविकों को प्रदान किए थे। अशोक के पौत्र सम्राट दशरथ ने भी गया के समीप नागार्जुनी पहाड़ियों में अनेक गुहाएँ आजीवकों के निवास के लिए दान में दी थीं। ऐसा उल्लेख शिलालेख से प्राप्त होता है। अशोक द्वारा नियुक्त 'धर्म महामात्रों को जिन संप्रदायों पर दृष्टि रखने का आदेश दिया गया था, उसमें भी आजीवकों का नाम मिलता है। इन सब उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह संप्रदाय भी कई सदियों तक जीवित रहा था। इस समय इसके अनुयायी शेष नहीं हैं।