छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आंदोलन - महावीर एवं जैन धर्म - 6th century BC Religious Movements in - Mahavira and Jainism

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महावीर स्वामी की जीवनी


महावीर का जन्म वैशाली गणराज्य के कुण्डग्राम में एक प्रसिद्ध 'ज्ञात्रिक' नामक क्षत्रिय कुल में 540 ई. पू. में हुआ था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था। उनकी माता त्रिशला, वैशाली गणराज्य के अधीन छोटे से राज्य लिच्छवि के राजा चेतक की बहन थी। सिद्धार्थ के अपनी पत्नी त्रिशला से तीन संतानें हुई दो पुत्र और एक पुत्री। सबसे छोटे पुत्र का नाम वर्धमान था। यही कालांतर में महावीर स्वामी के नाम से इतिहास प्रसिद्ध हुए


प्रारंभ में वर्धमान का जीवन राजकीय समृद्धि में बीता। उन्हें सभी प्रकार की राजोचित विद्याओं की शिक्षा भी दी गई।

उनका विवाह यशोदा नाम की राजकुमारी से हुआ, जिनसे उन्हें एक कन्या भी पैदा हुई। जब वर्धमान 30 वर्ष के हुए तो उनके पिता सिद्धार्थ की मृत्यु हो गई। उनके पश्चात् वर्धमान का बड़ा भाई नंदिवर्धन राजा हुआ। वर्धमान का स्वभाव प्रारंभ से ही चिंतनशील था इस समय तक उनकी निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति और दृढ़ हो गई थी। अतः उन्होंने अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से आज्ञा लेकर गृह त्याग दिया।


महावीर ने अपनी पूरी शक्ति के अनुसार तपस्या आरंभ की। लगभग एक वर्ष एक महीना तक तो ये वस्त्र धारण किए रहे,

तत्पश्चात् उन्होंने वस्त्र भी त्याग दिए। बिना पात्र के हथेली पर ही रखकर भोजन करने लगे। दो वर्ष और दो महीने की इस कठोर तपस्या के पश्चात् वे गृहविहीन और नग्न होकर भ्रमण करने लगे। इन समस्त यात्राओं में महावीर को अनेक कठोर यातनाएँ और शारीरिक कष्ट सहने पड़े। जैन ग्रंथों के मतानुसार लोग उन्हें चिढ़ाते, मारते थे, परंतु वे निर्लिप्त से पूर्ण मौन और शांत रहते थे।


बारह वर्ष की कठोर तपस्या और साधना के पश्चात् जम्भिय नामक ग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल के पेड़ के नीचे महावीर को 'कैवल्य' (ज्ञान) प्राप्त हुआ।

तभी उन्हें 'केवलिन' की उपाधि मिली। उन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी। अतः वह 'जिन' (विजेता) पुकारे जाने लगे, उनके अनुयायी 'जैन' कहलाए। अपने तपस्वी जीवन में उन्होंने अतुल्य पराक्रम, साहस, धैर्य, सहनशीलता प्रकट की, इसलिए वे 'महावीर' कहे जाने लगे। 42 वर्ष की अवस्था में महावीर को इस सत्यज्ञान की प्राप्ति हुई, वे अब सुख-दुःख के बंधन से सर्वथा मुक्त हो गए थे।


कैवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति के पश्चात् 30 वर्ष तक महावीर एक स्थान से दूसरे स्थान, विभिन्न प्रदेशों और राज्यों में भ्रमण करते रहे और अपने उपदेश देते रहे। महावीर स्वामी के धर्म प्रचार में अनेक राजवंशों से सहायता भी मिली।

मगध, वज्जि, काशी, कोशल, राजगृह, श्रावस्ती आदि प्रदेशों में महावीर ने अपनी शिक्षा का प्रचार किया। प्रारंभ में वे अकेले घूमा करते थे, पर कुछ काल पश्चात् उन्हें गोसाल नामक सहयोगी मिल गया था। लगभग छह वर्षों पश्चात् इनमें मतांतर हो गया था।


महावीर ने पार्श्वनाथ के जैन सिद्धांतों का प्रचार किया। पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार सिद्धांतों अहिंसा, अमृषा, अचौर्य, अपरिग्रह में महावीर ने अपना पाँचवाँ सिद्धांत ब्रह्मचर्य' भी जोड़ दिया और अपने दर्शन का प्रचार किया। उन्होंने एक ऐसे व्यवहारिक और धार्मिक मार्ग का प्रतिपादन किया, जिसका अनुसरण कर व्यक्ति मोक्ष या मुक्ति प्राप्त कर सकता था। इस प्रकार अथक परिश्रम का जीवन बिताकर 468 ई. पू. में राजगृह के निकट पावापुरी में उनकी मृत्यु हो गई।