शिक्षा के उद्देश्य - aims of education
शिक्षा के उद्देश्य - aims of education
धार्मिक भावना का जागरण
प्राचीन भारत में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों में धार्मिक भावना का जागरण करना था। सर्वविदित है कि बालक का मस्तिष्क लचीला होता है। अतः जो विचार उसके मन में बाल्यकाल में बैठा दिया जाता है वह उसके मस्तिष्क में चिरस्थायी बन जाता है। भारत में समस्त गुणों के सार का संकलन कर धर्म में समाहित कर दिया गया है। इसीलिए धार्मिक भावना को ही भारतीय शिक्षा का मुख्य उद्देश्य माना गया है। इसके लिए व्रत प्रार्थना, त्योहार आदि पर बल दिया गया जिसके द्वारा बालक का आध्यात्मिक विकास संभव था। यह बालक के चरित्र और आचार-व्यवहार को भी संतुलित करता था। साथ ही विद्यार्थियों को गृहस्थ जीवन के भी समस्त कर्तव्य से परिचित कराया जाता था। अतः धर्म एवं दया की भावना द्वारा बालक को समाज के लिए एक उपयुक्त व्यक्ति बनाने का उपक्रम किया जाता था।
चरित्र निर्माण
प्राचीन भारत में शिक्षा का दूसरा उद्देश्य चरित्र निर्माण था। डॉ. ए. एस. अल्तेकर ने इस प्रवृत्तियाँ तुलना लोक के विचार से की है जो इस मत का पोषक है कि बौद्धिक विकास से बढ़कर केवल की चारित्रिक विकास होता है। संभवतः इसीलिए महाभारत में कहा गया है कि वही शिक्षित है जो धार्मिक है। भारतीय विचारकों की दृष्टि में ज्ञान की अपेक्षा चरित्र की अधिक महत्त्व थी। इसीलिए मनु ने कहा है कि एक अच्छे चरित्र का व्यक्ति उस वेदविद से अधिक प्रशंसनीय है जो जीवन, विचार और क्रियाओं में अपवित्र हो। उसके विकास के लिए ही गुरु के साथ बालक को समाज से दूर रखा जाता था। 41.4.3 समाज कल्याणकारी प्रवृत्ति
प्राचीन काल में समाज कल्याणकारी प्रवृत्ति पर बल देना शिक्षा का तीसरा प्रमुख उद्देश्य था । बालक एक सामाजिक प्राणी है। चूँकि उसे समाज में ही रहना पड़ता था इसलिए उसमें जन कल्याण की प्रवृत्ति जागृत करने पर बल दिया जाता था। उसे पुत्र प्रजनन करना होता था और समाज के लोगों के साथ रहना पड़ता था। इसके लिए उसे व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। प्राचीनकाल में शिक्षा में भिक्षाटन की व्यवस्था चलाई गई थी जिससे विद्यार्थी के मन में यह अनुभूति हो कि समाज का बहुत बड़ा ऋण उसके ऊपर अध्ययन काल से ही पड़ा है। जब वह किसी योग्य नहीं था तो समाज ने ही उसके लिए भोजन वस्त्र आदि जुटाया था। इससे उऋण होने के लिए विभिन्न विषयों के साथ-साथ समाज कल्याण की शिक्षा भी दी जाती थी।
संस्कृति का प्रसार
प्राचीन काल में शिक्षा का चौथा उद्देश्य संस्कृति का प्रसार करना तथा अगली पीढ़ी को प्रेषित करना था। इस काल में छापेखाने नहीं थे, अतः शिक्षा कंठस्थ कराई जाती थी। जैसे वैदिक साहित्य के मूल तत्वों को स्मरण कर संरक्षित करना तथा आगे आने वाली पीढ़ी को प्रदान करना जिससे शिक्षा की निरंतरता बनी रहे। यही विद्यार्थी का कर्तव्य होता था। कालांतर में विकासमान ज्ञान को अधिक प्रौढ़ बनाने के लिए एक-एक अंग, छंद, ज्योतिष, व्याकरण, दर्शन आदि का अध्ययन एक-एक वर्ग ने ले लिया जिससे ज्ञान की मर्यादा बनी रहे। इसीलिए ऋणों का जहाँ विधान किया गया उसमें ऋषि ऋण को प्रमुख ऋण माना गया और इससे उऋण होने के लिए ऋषि यज्ञ का विधान भी किया गया। इनके अतिरिक्त माता, पिता, वृद्धों का आदर, स्वाध्याय तथा ऋषि तर्पण भी आवश्यक थे।
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