प्राचीन भारतीय शिक्षा - ancient indian education
प्राचीन भारतीय शिक्षा - ancient indian education
शिक्षा का अर्थ
डॉ. अनंत सदाशिव अल्तेकर ने प्राचीन काल में शिक्षा के दो अर्थ बताये हैं।
(1) व्यापक एवं
(2) संकुचित।
व्यापक अर्थ से उनका अभिप्राय शिक्षा में आत्म-संशोधन एवं आत्मविकास की प्रवृत्तियों से है तथा संकुचित अर्थ में शिक्षा का अभिप्राय शिक्षण अवधि में विद्यार्थी के प्रशिक्षण एवं निर्देश से है। अतः स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा उक्त दोनों ही कार्य करती थी। इसी से दो प्रकार के विद्यार्थियों का भी उल्लेख प्राप्त होता है - नैष्ठिक और उपकुर्वाण। अर्थात् एक का लक्ष्य था कि वह जीवन भर विद्यार्थी रहता था।
दूसरा विद्या की अवधि समाप्त होने पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर जाता था तथा अपनी जीविका के उपार्जन में लगता था। किंतु उसकी भी शिक्षा समाप्त नहीं होती थी। इसकी पक्रिया इसके बाद भी चलती रहती थी। किंतु स्पष्ट है कि शिक्षा द्वारा चरित्र का विकास, विवेक की उन्नति, स्वच्छता की भावना, समाजीकरण की प्रवृत्ति और आध्यामिक उपलब्धि को प्राप्त किया जा सकता था। यही शिक्षा का व्यापक रूप है।
शिक्षा का महत्व
प्राचीन काल में ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से शिक्षा का बहुत महत्व था। ज्ञान ही सर्वोत्तम है। मनुष्य को कर्तव्य अकर्तव्य का बोध ज्ञान से होता है और ज्ञान शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है।
गुरु की शरण में बिना गये ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। अंततः मनुष्य ऐहलौकिक और पारलौकिक निःश्रेयस को प्राप्त करने के लिए ही प्रयत्न करता है। यही उसके जीवन का ध्येय भी होता है और यह गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है।
शिक्षा के द्वारा मनुष्य लौकिक उपयोगिता के तत्वों का ज्ञान प्राप्त करता है। कर्तव्य और अकर्तव्य को समझकर वह सभी कालों और लोकों को जान लेता है। यह ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। ज्ञान से अधिक पवित्र वस्तु नहीं है। ज्ञान को प्राप्त करने वाले मनुष्य देवता कहे गए हैं। विद्वान् मनुष्य ही संसार में आदर पाता है।
विद्या प्राप्त करने वाला स्नातक इस पृथ्वी पर अतिशय शोभित होता है। तीन ऋणों से मुक्ति ज्ञान का अर्जन करके ही होती है। विद्या को प्राप्त करने वाला व्यक्ति स्वर्ग में स्थान पाता है।
प्राचीन कालीन भारत में ब्रह्मचर्य का पालन और अध्ययन, धर्म के अंग माने जाते थे। यज्ञ, अध्ययन तथा दान, ये तीन धर्म के आधार थे। वेदों का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य था। वेदों का अध्ययन न करके अंयंत्र श्रम करने वाले को शूद्र समझा जाता था। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि प्राचीनकाल में शिक्षा का बहुत महत्व था।
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