सूत्र- ग्रंथ - aphorisms
सूत्र- ग्रंथ - aphorisms
वेदों की प्रामाणिकता ब्राह्मणों की श्रेष्ठता, चातुर्वर्ण व्यवस्था, गृहस्थाश्रम की महत्ता, समाज का संगठन चतुराश्रम व्यवस्था, यज्ञ, धार्मिक कर्मकांड आदि विभिन्न विषयों को सूत्रों में प्रस्तुत किया गया। वे ग्रंथ जिनमें विधि-विधान एकत्र कर परस्पर जोड़ दिये गये हैं सूत्र ग्रंथ कहलाते हैं। फलतः सूत्र ग्रंथों पर विभिन्न टीकाएँ रची गयीं। इनमें पतंजलि का महाभाष्य मुख्य है। पाणिनि का प्रसिद्ध ग्रंथ “अष्टाध्यायी" भी सूत्र पद्धति के ग्रंथों में बेजोड़ है। यह एक व्याकरण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में वैज्ञानिक रूप से व्याकरण के सूक्ष्म से सूक्ष्म नियमों को सूत्रबद्ध कर दिया गया है। इस में तत्कालीन युग के राजनीतिक समाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती हैं विद्वानों ने इसे सूत्र काल की प्रारंभिक रचना माना है। इसका रचना-काल ईसा पूर्व छठी शताब्दी माना गया है। वेदों की ऋचाओं में व्यवस्थित अध्ययन हेतु छह वेदांगों की रचना हुई व्याकरण, शिक्षा,
कल्प, निरुक्त (शब्द-विज्ञान), छन्दस और ज्योतिष। इनमें जिस कल्प का वर्णन हैं उसके अंतर्गत सूत्र ग्रंथ है। यह तीन भागों में विभाजित है (1) श्रौतसूत्र (2) गृह्य-सूत्र और (3) धर्म-सूत्र
श्रीत-सूत्र
इसके विषय यज्ञ, हवि और सोम हैं। इसमें यज्ञ की विधियों और अंय धार्मिक अनुष्ठानों, विधि- निषेधों आदि का वर्णन है। अतः श्रौत सूत्र का स्वरूप कर्मकाण्डीय है।
गृह्य-सूत्र
ग्रह सूत्र में प्रमुख विषय गृहस्थ जीवन और उससे संबंधित अधिकार,
कर्तव्य, उत्तरदायित्व, दैनिक पूजन, उपासना, संस्कारों और अनुष्ठानों से है। गृह्य-सूत्र में व्यक्ति का जीवन गर्भाधान से देहावासन और अन्त्येष्टि-क्रिया तक अनेक कालों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक काल से संबंधित सविस्तृत क्रिया-विधियाँ है, जिनके अपने-अपने विधान है। इन क्रिया-विधियों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार हैं। जन्म यज्ञोपवीत, विवाह, मृत्यु आदि सोलह संस्कारों का सूक्ष्म विधान गृह्य-सूत्र में दिया गया है।
धर्म-सूत्र
धर्म-सूत्र और गृह्यसूत्रों के अनेक विषयों में समानता है। यदि गृह्य-सूत्र गृहस्थ जीवन के कर्तव्य, यज्ञ, संस्कार, विधि निषेधों आदि का खूब विस्तार से वर्णन व विवेचन करते हैं
तो धर्म-सूत्र उनका उल्लेख संक्षेप में करते हैं। धर्म-सूत्रों का संबंधसामाजिक व्यवहार के नियमों से हैं। दैनिक जीवन के प्रमुख सामाजिक नियमों, उपनियमों, निषेधों, परंपराओं, संस्कारों आदि का इनमें विस्तृत विवेचन है। हिंदू सामाजिक कानून-व्यवस्था का सूत्रपात इन्हीं सूत्रों से होता है।
सूत्रकालीन ग्रंथ
श्रौतसूत्र ग्रंथों में आपस्तंब, आश्वलायन, बौधायन, कात्यायन और शाखायन के ग्रंथ अधिक प्रसिद्ध हैं। विद्वानों ने इनका रचना काल ईसा पूर्व 600 से ईसा पूर्व 400 ई. पू. के बीच माना है।
गृह्य-सूत्र ग्रंथों में आपस्तंब, आश्वलायन, बौधायन और पारस्कर के ग्रह्म-सूत्र ग्रंथ अधिक प्रसिद्ध
हैं। इनमें आपस्तंब और आश्वलायन के गृह-सूत्र अधिक प्राचीन हैं। इनका रचना काल भी ईसा पूर्व 600 से ईसा पूर्व 400 इ.पू. के मध्य माना गया है।
धर्म-सूत्र ग्रंथों में गौतम, बौधायन, आपस्तंब, वशिष्ठ, विष्णु, वैखानस, हिरण्यकेशी के धर्म-सूत्र ग्रंथ अधिक प्रसिद्ध हैं। गौतम धर्म-सूत्र ग्रंथ में है और सबसे प्राचीन हैं। वशिष्ठ का धर्म-सूत्र भाषा, व्याकरण, शैली और सिद्धांत को देखते हुए ईसा पूर्व की सदियों का सबसे अंतिम धर्म-सूत्र हैं। विष्णु धर्म- सूत्र की रचना संभवतः ईस्वी सन् 100 और ईस्वी सन् 200 के मध्य में हुई होगी।
सूत्र-ग्रंथों का काल
सूत्र-ग्रंथों में वर्णित विषय एवं स्थान तथा अब ग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन से विद्वानों ने सूत्र- ग्रंथों का रचना काल ईसा पूर्व सातवीं सदी से लगभग ईसा पूर्व दूसरी सदी तक माना है। इन सूत्र -ग्रंथों से इस युग की सभ्यता एवं संस्कृति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है।
सूत्र-ग्रंथों का सांस्कृतिक महत्व
सूत्र ग्रंथों ने तत्कालीन समाज को व्यवस्थित व सुसंगठित किया। गृह्मसूत्र ने मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक के जीवन के समस्त कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन किया। विधि-विधान बताये, प्रत्येक अक्सर हेतु संस्कारों को निश्चित कर एक गृहस्थ के दैनिक जीवन को व्यस्थित किया, उनकी सीमाएँ निर्धारित कर दीं।
इससे परिवार की परंपराएँ और अनुशासन की व्यवस्था निद्रिष्ट हो गयी। इन्हीं घरेलू क्रिया-विधियों निषेधों और संस्कारों की व्यवस्था ने समाज का एक निद्रिष्ट ढाँचा बना दिया, उसका स्वरूप और सीमाएँ निश्चित हो गयीं। धर्म सूत्र-ग्रंथों में सामाजिक प्रथाओं और रूढियों का विवरण है। उनमें सामाजिक व्यवहार और सामाजिक सम्बन्धों एवं संपत्ति के सिद्धांतों का विवेचन है। इससे प्रतीत होता है कि उस युग में समाज को नयी परंपराओं और विचारधाराओं के आधार पर संगठित और व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया था। सूत्रयुगीन संस्कृति
सूत्रयुग में आर्यों के क्षेत्र की सीमाओं के विषय में जानकारी बौधायन एवं वशिष्ठ धर्म ग्रंथों के द्वारा प्राप्त होती हैं। बौधायन में लिखा है कि आर्यावर्त “विनशन के पूर्व कालकवन के पश्चिम, हिमालय के दक्षिण और पारियात्र के उत्तर में स्थित है।" वशिष्ठ धर्मसूत्र में भी आर्यावर्त की सीमाओं का उल्लेख हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उत्तरी भारत में ही आर्य संस्कृति का क्षेत्र था। बौधायन ने यह भी लिखा है कि अवन्ती, अंग, मगध, सौराष्ट्र, सिंधु सौवीर, दक्षिणीपथ आदि प्रदेशों में वर्णसंकर जातियों के लोग रहते थे। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि आर्यावर्त में अनार्य जातियाँ निवास करती थीं, परंतु उनकी अपनी संस्कृति थी।
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