बुद्ध की मूर्ति का आविर्भाव - Appearance of Buddha statue

बुद्ध की मूर्ति का आविर्भाव - Appearance of Buddha statue


कुषाण युग में बुद्ध की प्रतिमाओं के निर्माण से भारतीय मूर्तिकला में एक महान क्रांति का सूत्रपात हुआ। कुषाण युग से पहले शुंग युग तक बुद्ध की कोई मूर्ति नहीं मिलती है केवल स्तूप, बोधिवृक्ष, धर्मचक्र आदि के प्रतीकों से उनका चित्रण किया गया है। इस समय तक बुद्ध की मूर्ति न बनने का यह कारण था कि बुद्ध ने स्वयमेव अपनी मूर्ति बनाने का निषेध किया था। महापरिनिर्वाण से पहले बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से कहा था कि मैंने जिस धर्म और विनय का तुम्हें उपदेश दिया है वही मेरे बाद तुम्हारा रास्ता होगा। संयुक्तनिकाय के अनुसार एक बार वक्कलि नामक एक भिक्षु ने रुग्ण होने पर जब भगवान के दर्शनों की इच्छा व्यक्त की तो बुद्ध स्वयमेव उसकी इच्छा पूर्ति के लिए उसके पास गये।

किंतु उन्होंने उसे यह कहा था-"वक्कलि मेरी इस गंदी काया को देखने का क्या लाभ है ? जो धर्म को देखता है वह मुझे देखता है और जो मुझे देखता है वह धर्म को देखता है।" ब्रह्मजालसुत्त के अनुसार बुद्ध के निर्वाण के बाद उसे न तो देवता और न ही मनुष्य देख सकेंगे। हीनयान ने बुद्ध की शिक्षाओं पर बल देते हुए उनके निर्वाण के बाद लगभग पाँच शताब्दियों तक किसी प्रकार की मूर्ति की रचना नहीं की। किंतु कुषाण युग में हमें बुद्ध की सहस्त्रों मूर्तियों का दर्शन होने लगता है। इसका क्या कारण था ?


बुद्ध की प्रतिमा के विकास का प्रश्न भारतीय मूर्तिकला के जटिलतम प्रश्नों में से है।

इस विषय में दो बातें विचारणीय हैं। पहली तो यह कि बुद्ध की प्रथम मूर्ति का आविर्भाव किस प्रदेश में हुआ और दूसरी यह कि बुद्ध की मूर्ति पर विदेशी प्रभाव कहाँ तक पड़ा है। पहली बात के संबंध में दो मत प्रचलित हैं। पहले मत के अनुसार यह मूर्ति सर्वप्रथम गंधार प्रदेश के शिल्पियों ने तैयार की और दूसरा मत इसके आविर्भाव का श्रेय मथुरा के शिल्पियों को प्रदान करता है। पहले मत की स्थापना फ्रेंच विद्वान फूशे ने की थी। टार्न ने भी यूनानी कलाकारों को बुद्ध की पहली मूर्ति बनाने का श्रेय देते हुये मोअ और अब के सिक्कों पर बनी बुद्ध की मूर्तियों से इसकी पुष्टि की। किंतु टार्न की यह कल्पना निराधार सिद्ध हुई है, क्योंकि इन सिक्कों की सूक्ष्म जांच से यह पता लगा है

कि इन पर बुद्ध की कोई मूर्ति नहीं है। भारतीय कला के मर्मज्ञ डॉ. आनंदकुमार स्वामी ने यह मत प्रगट किया है कि बुद्ध की मूर्ति का निर्माण सर्वप्रथम मथुरा के शिल्पियों ने किया था। रोलैंड ने यह लिखा है कि निःसन्देह मथुरा के शिल्पियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने बुद्ध की विशुद्ध भारतीय ढंग की सबसे पहली मूर्तियों का निर्माण किया। इस समय यह माना जाता है कि मथुरा और गंधार में बुद्ध की मूर्तियों का विकास संभवतः स्वतंत्र रूप से हुआ।


कुषाण युग में मथुरा में बुद्ध की मूर्ति बनने का मुख्य कारण यह था कि उस समय भक्ति आंदोलन अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच गया था। ईसा से पहले की दो शताब्दियों में भागवत धर्म मथुरा में वेग से फैल रहा था।

अन्यत्र में यह बताया जा चुका है कि इस समय यहाँ वासुदेव और संकर्षण की पूजा हो रही थी मोरा गाँव के कूप-लेख में पाँच वृष्णि वीरों की उपासना का उल्लेख है। मथुरा में शुंग काल की बलराम की मूर्ति मिली है। वैष्णव धर्म के भक्तिवाद का और मूर्तियों के निर्माण का प्रभाव बौद्ध धर्म पर पड़ना स्वाभाविक था। इस समय बौद्ध धर्म में भी भक्ति प्रधान महायान संप्रदाय का आंदोलन प्रबल हो रहा था। इसमें भक्त उपासना के लिए बुद्ध की मूर्ति चाहते थे। किंतु इसमें मूर्ति-निषेध की हीनयान की पुरानी परंपरा बाधक थी। ऐसा प्रतीत होता है कि कनिष्क के समय में एक विशेष स्थिति उत्पन्न हुई।

बुद्ध की मूर्ति की माँग श्रद्धालु जनता ने इतने प्रबल रूप में की कि बुद्ध की प्रतिमा बनाने का पुराना निषेध समाप्त हो गया। इस समय बौद्ध संघ में बल जैसे महात्रिपिटकाचार्य बुद्ध की मूर्ति बनाने का आंदोलन कर रहे थे। इन्होंने अपने पक्ष को प्रबल और निर्विवाद बनाने का यह उपाय सोचा कि बुद्ध की जो मूर्तियाँ बनाई जाये, उन्हें बोधिसत्व की मूर्ति कहा जाय ताकि किसी को इन पर धार्मिक दृष्टि से आपत्ति उठाने का मौका न मिले। मथुरा में कटरा से जो मूर्ति प्राप्त हुई है वह बुद्ध की है किंतु उसकी चैकी पर अंकित लेख में उसे बोधिसत्व कहा गया है। इस समय श्रद्धालु बौद्धों की माँग पूरी करने के लिए प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण शुरु हुआ।


बुद्ध की मूर्तियाँ दो प्रकार की हैं, एक खड़ी हुई, दूसरी बैठी हुई। खड़ी मूर्तियों में प्राचीन यक्ष परंपरा का अनुसरण किया गया है और बैठी मूर्तियाँ योगी-मुनियों की मुद्रा के आधार पर बनाई गई। प्राचीन परंपरा में योगी और चक्रवर्ती महापुरूषों के कुछ विशेष लक्षण माने जाते थे। इनमें योगी के प्रमुख लक्षण नासाग्र दृष्टि, पद्मासन और ध्यान मुद्रा थे। चक्रवर्ती के लक्षण चामरग्राही पाश्र्वचर और छत्र थे। इन विभिन्न लक्षणों को मिलाकर बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं। यह बात मथुरा में मिली बुद्ध की प्राचीनतम मूर्तियों से भली भाँति स्पष्ट होती है।