आश्रम व्यवस्था - ashram system

आश्रम व्यवस्था - ashram system


उत्तर वैदिक काल में मानव की विभिन्न् ा अवस्थाओं के लिए कुछ कार्य निश्चित कर दिये गये थे। इसे आश्रम प्रणाली कहते हैं। इसमें जीवन को चार भागों में विभाजित किया गया और प्रत्येक भाग को आश्रम कहा गया, जैसे ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम प्रत्येक आश्रम की अवधि लगभग पच्चीस वर्ष की थी।

ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्याध्ययन, गृहस्थाश्रम में संतानोत्पYOOT, सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पालन और धनोपार्जन तथा अय लोगों का पालन-पोषण, वानप्रस्थ आश्रम में वन में त्याग, तपस्या और सन्यास का जीवन, आत्म-चिंतन और मनन तथा सन्यास आश्रम में ब्रह्मचिंतन करके मोक्ष प्राप्ति के कार्य किये जाते थे। इस आश्रम प्रथा का पालन प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य माना जाता था। मानव जीवन के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की क्रमशः प्राप्ति के लिए चारों आश्रमों का विकास किया गया था।