भारत कंबुज संबंध - Bharat Kambuz Relations
भारत कंबुज संबंध - Bharat Kambuz Relations
कंबुज राज्य को चीनी भाषा में चेन-ला कहा गया है। पहले यह फूनान का ही एक अधीनस्थ राज्य था। कंबुज की अनुश्रुतियों के अनुसार कम्बु नाम के एक ऋषि ने यहाँ की एक अप्सरा मीरा के साथ विवाह करके कंबुज राज्य की नींव रखी थी। सातवीं शताब्दी ई. में उसने फूनान को जीत लिया। फूनान को जीतने वाले वीर राजा महेंद्रवर्मन् और चित्ररथ दो भाई थे। महेंद्रवर्मन् के पुत्र ईशानवर्मन् ने ईशानपुर नामक नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। यह सम्राट् हर्ष का समकालीन था। इस वंश के शासन- काल में कंबुज एक शक्तिशाली राज्य हो गया।
आठवीं शताब्दी ई. में सुवर्णद्वीप के शक्तिशाली राजाओं ने दिग्विजय करते हुए कंबुज को भी अपने अधीन कर लिया,
परंतु इसको वे अधिक समय तक अपने अधिकार में नहीं रख सके। नवीं शताब्दी ई. में ही जयवर्मन् द्वितीय नामक राजा ने कंबुज को पुनः स्वतंत्र किया। कंबुज के इतिहास में उसको बहुत महत्व दिया गया है। उसका शासन काल कंबुज का स्वर्णयुग कहलाता है।
अपने राज्य-काल में जयवर्मन द्वितीय ने दो महत्वपूर्ण कार्य किये। एक तो वह अपनी राजधानी अंगकोर को ले गया, जो सामरिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित था। दूसरे उसने कंबुज में देवराज नामक तांत्रिक शैव मत का प्रचार किया।
उसने शैवमत को राजधर्म बनाया। उसने यह भी व्यवस्था दी कि राजपुरोहित एक निश्चित परिवार से हुआ करेगा। जयवर्मन् का राज्यकाल 802-859 ई. रहा। संपूर्ण केंद्रीय हिंदचीन उसके राज्य के अंतर्गत था। उत्तर में उसके राज्य की सीमायें, चीन के यूनान प्रांत को स्पर्श करती थीं।
जयवर्मन् द्वितीय के बाद उसका पुत्र, जिसका नाम भी जयवर्मन् था, गद्दी पर बैठा। उसके बाद उसका पुत्र इंद्रवर्मन् राजा हुआ। इंद्रवर्मन् और उसका पुत्र यशोवर्मन् बहुत प्रतापी राजा हुए।
ये बड़े विजेता और निर्माता थे। यशोवर्मन् का शासन 889-910 ई. रहा। शास्त्रों और काव्यों में उसको बहुत रुचि थी। उसने 'महाभाष्य' पर भी एक टीका लिखी।
सूर्यवर्मन् प्रथम (1002-1049 ई.) कंबुज प्रदेश का एक शक्तिसंपन्न और प्रतापी सम्राट् हुआ। लंबे गृहयुद्धों के अनंतर उसने शासन के अधिकार को प्राप्त किया था। राजसिंहासन पर बैठकर उसने दिग्विजय की तथा स्याम और ब्रह्मा को जीता। यद्यपि उसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर अधिक था तथापि उसने शैव और वैष्णव मंदिरों का भी निर्माण कराया और वर्ण-व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया। सूर्यवर्मन् प्रथम प्रकांड विद्वान् था। उसको काव्य, दर्शन, धर्मशास्त्र और भाष्यों का अच्छा ज्ञान था।
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