बौद्ध शिक्षा केंद्र - Buddhist Education Center

बौद्ध शिक्षा केंद्र - Buddhist Education Center


बौद्ध भिक्षु संघ का संगठन आश्रमव्यवस्था के आदर्शों पर किया गया था अतः बौद्ध विहार शिक्षा के केंद्र बन गये। भिक्षु जीवन में ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थाश्रम तथा सन्यासाश्रम का समन्वय होने के कारण विहारों में शिक्षण कार्य को प्रमुखता मिली। ब्राह्मणों के गुरूकुलों के साथ-साथ अब बौद्ध विहारों में भी अध्ययन की सुविधाएँ उपलब्ध होने से शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ। इन

विहारों के छात्रों के आदर्शों, गुरू-शिष्य संबंधों तथा अनुशासन के नियम आदि पर बौद्ध संघ के प्रसंग में विचार किया गया। बुद्ध-काल में राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती तथा कपिलवस्तु आदि नगरों में कई प्रसिद्ध विहारों का निर्माण हुआ जो बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र बन गये। राजगृह में वेणुवन, यष्टिवन तथा सीतावन, वैशाली में कूटागारशाला तथा आम्रवन, कपिलवस्तु में निग्रोधाराम और श्रावस्ती में जेतवन तथा पूर्वाराम इस युग के प्रसिद्ध विहार थे। इनके अतिरिक्त अनेक विहारों का निर्माण हुआ। इन्हें संघाराम कहा जाता था। इन संघारामों में आध्यात्मिक चिंतन होता था। यहाँ के आचार्य अपने शिष्यों को अध्यात्म ज्ञान के सागर में अवगाहन कराते थे। बुद्ध के समय के बौद्ध विहारों के भिक्षुओं को सारिपुत्त, महामोग्गलान, महाकच्चान, महाकोट्ठित, महाकप्पिन, महाचंद, अनुरूद्ध रेवत, उपालि,

आनंदतथा राहुल आदि प्रमुख थेरों के प्रवचनों को श्रवण करने तथा उनसे वार्तालाप कर अपने को कृतार्थ करने का मौका मिलता रहता था। ये लोग प्रायः भ्रमणशील रहा करते थे और जिस बिहार में कुछ समय व्यतीत करने के लिए रूक जाते थे, वहाँ के भिक्षुओं को इनसे जटिल विषयों पर विचार-विमर्श कर शंका-समाधान का सुअवसर अनायास ही प्राप्त हो जाता था। इन बौद्ध विहारों में भिक्षुओं को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ लौकिक विषयों तथा शिल्पों की शिक्षा प्रदान करने को भी व्यवस्था की गयी थी। कालांतर में जब बौद्ध विहारों में उपासकों को शिक्षा दी जाने लगी तो लौकिक विषयों को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना अनिवार्य हो गया। यदि बौद्ध विहारों में सभी विषयों के अध्यापन की व्यवस्था नहीं की गयी होती, तो नालंदा तथा वलभी आदि महाविहारों को विद्या केंद्रों के रूप में ख्याति प्राप्त नहीं हो सकती थी।