क्रांति के कारण - cause of revolution

क्रांति के कारण - cause of revolution


सामाजिक कारण


(1) अनुपयोगी चातुर्वण व्यवस्था ईसा पूर्व छठी सदी तक समाज में नए धंधे करने वालों की भारत में प्रविष्ट विदेशियों की, अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न वर्णसंकरों की तथा विभिन्न प्रदेशों में रहने वालों की अनेक जातियाँ और उप-जातियाँ बन गई थीं। ये सब शूदों में सम्मिलित कर लिए गये थे। चातुर्वण व्यवस्था में इनके लिए कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं था। ये ऊंचे वर्णों के लोगों के काम करते थे। उनके लिए कर्तव्य ही थे, अधिकार नहीं। इस प्रकार चातुर्वण व्यवस्था अनुपयोगी और अव्यावहारिक हो गई थी। स्वतंत्र विचारक इस सामाजिक कुव्यवस्था का तीव्र विरोध करने लगे।


 (2) सामाजिक विषमताएँ


समाज में विभिन्न जातियों और वर्गों के लिए अलग-अलग नियम थे। ब्राह्मणों को कई विशेष अधिकार और सुविधाएँ प्राप्त थीं।

वे भूमिकर और मृत्यु दंड से मुक्त थे। क्षत्रियों और वैश्यों के लिए भी अलग-अलग नियम थे। शूद्रों के लिए तो उच्चवर्ण की सेवा के और कर्तव्य के ही नियम थे, उनके अधिकारों का विधान नहीं था। स्त्रियों की दशा भी दयनीय थी। वे भी नितांत अधिकारविहीन थीं। जातियों के बंधन भी कठोर और अपरिवर्तनशील थे। अंतर्जातीय विवाह निषिद्ध थे और अपनी जाति का व्यवसाय छोड़ कर अपनी अभिरूचि और प्रतिभा के अनुसार अंय व्यवसाय करने वालों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था थी। इन सबसे समाज में ऊँच-नीच के भेदभाव, छुआ-छूत की प्रबल भावना, सामाजिक असमानताएँ और विषमताएँ उत्पन्न हो गई थीं, जिससे जन-साधारण में विद्रोह की भावना प्रबल हो रही थी।


(3) शूद्रों की दयनीय दशा


निम्न स्तर के धंधे करने वालों और शूद्रों की दशा बड़ी शोचनीय हो गई थी। उन्हें धर्मशास्त्रों और वेदों का अध्ययन-अध्यापन करने,

यज्ञोपवीत धारण करने, यज्ञ, हवन आदि करने, तय करने एवं सन्यासी बनने के अधिकार नहीं थे। उदारवृत्ति के प्रगतिशील लोग ऐसी सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था चाहते थे जिसमें शूद्रों को भी अधिकार प्राप्त हों, उनकी दशा भी सुधर जाये।


(4) ब्राह्मणों का प्राधान्य


समाज में ब्राह्मणों की सर्वोपरिता थी। वेद और धार्मिक ग्रंथों का पठन-पाठन करने वाले अनुष्ठान, होम और यज्ञ करने वाले, संसार और अंय धार्मिक क्रिया-विधियाँ करने वाले ब्राह्मण ही होते थे। जन्म से मृत्यु तक जितनी भी धार्मिक क्रियाएँ होती थीं वे सभी ब्राह्मणों द्वारा संपन्न की जाती थीं।

ब्राह्मणों की पुरोहिती, विद्वता, अभियान, आधिपत्य ने समाज को पूरा जकड़ दिया था। राजनीति और प्रशासन में भी उनका प्रभुत्व था। वे क्षत्रिय राजाओं के पुरोहित गुरू परामर्शदाता और मंत्री होते थे। उच्च पदों पर उनका एकाधिकार होता था। अपनी इस सर्वोपरिता के कारण ब्राह्मण लोग अंय जातियों और वर्णों के लोगों पर अनाचार और अत्याचार भी करते थे। इसीलिए साधारण जनता में ब्राह्मणों के विरुद्ध घोर असंतोष और विद्रोह उत्पन्न हो गया था। 2.3.4.2 धार्मिक कारण


(1) दुरूह कर्म-कांड बाह्य आडंबर


वैदिक धर्म की पुरातन शुचिता, शुभ्रता और सरलता लुप्त हो गई थी। अब धर्म का स्थान जटिल, निरर्थक कर्मकांड और धार्मिक आडंबर ने ले लिया था।

धार्मिक संस्कार और विधियाँ बोझिल, खर्चीली, निरर्थक, अस्वाभाविक, दुरूह और विस्तृत हो गई थीं। उन्हें विधिवत पूर्ण करना साधारण व्यक्तियों की शक्ति और सार्मथ्य के बाहर था।


(2) यज्ञों का बाहुल्य


वैदिक युग में यज्ञ सरल, सादे पवित्र और व्यक्तिगत होते थे। प्रत्येक गृहपति बिना किसी पुरोहित के स्वयं ही यज्ञ कर लेता था, परंतु ईसा पूर्व छठी सदी तक यज्ञों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो गई, उनकी विधियों की जटिलता बढ़ गई और उनमें बहुमूल्य सामग्री की आवश्यकता होने लगी।

कुछ यज्ञ तो वर्षों तक चलते थे। कुछ विशिष्ट अवसरों पर यज्ञों में मानवों और पशुओं की बलि भी दी जाती थी। यज्ञ ही धर्म का प्रमुख स्वरूप और मोक्ष प्राप्ति का साधन बन गया था। इन सब कारणों से जनता ने ब्राह्मण धर्म और यज्ञवाद का विरोध किया। 


(3) वेद-वाद


वेदों को अपौरूषेय माना गया। ब्राह्मण धर्म में वेदों को सर्वोपरि माना गया। यहाँ तक कहा जाने लगा कि "वेदों में जो कुछ कहा गया है, वही धर्म है, उसके विरुद्ध जो कुछ भी हैं, वह अधर्म है।" सभी सत्यों, विधि-विधान, निषेधों और धार्मिक प्रमाणों तथा संस्कारों का आधार वेद मान लिये गये।

आत्मोन्नति और मुक्ति के लिए वेदों का ज्ञान पर्याप्त माना गया, परंतु इस एक मात्र पुस्तक ज्ञान के प्रति असंतोष प्रकट किया गया। स्वतंत्र विचारकों और चिंतकों ने इस वेद-वाद का विरोध किया, उन्होंने इसकी कटु आलोचना की, क्योंकि इससे मनुष्य का बौद्धिक विकास कुण्ठित होता था और स्वतंत्र तर्क- वितर्क तथा अंय धार्मिक मतों के विकास के लिए मार्ग अवरूद्ध हो गया था।


 (4) बहुदेववाद


ब्राह्मण धर्म में अनेक देवी-देवताओं की कल्पना की गई और मोक्ष प्राप्ति के लिए देवी-देवताओं का पूजन-अर्चन, आराधना, समर्पण आदि आवश्यक माने जाने लगे,

परंतु स्वतंत्र तार्किकों ने इस बहुदेववाद को मानव की मुक्ति के लिए निरर्थक बतलाया। उनका कथन था कि मनुष्य का कर्म ही उसका भाग्य-विधाता है।


(5) तंत्र-मंत्र और अंध-विश्वास


इस युग में तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, भूत-प्रेत में लोगों का अंध-विश्वास बढ़ रहा था। लोगों का विश्वास था कि मंत्रों में देवी शक्ति होती है, मंत्रों से शत्रु का विनाश और युद्ध में विजय प्राप्त की जा सकती है, सुख-समृद्धि में वृद्धि हो सकती है, रोगों को छू किया जा सकता है और देवी-देवता भी वश में किये जा सकते हैं। प्रगतिवादी बुद्धिजीवी लोगों ने इसका घोर विरोध किया।


 (6) धार्मिक साहित्य की क्लिष्टता


ब्राह्मण धर्म की दुरूहता कर्म-कांड और धार्मिक क्रिया-विधियों की जटिलता के साथ-साथ धार्मिक ग्रंथों की संख्या में भी वृद्धि हुई और संस्कृत भाषा की क्लिष्टता बढ़ गई। धार्मिक साहित्य अत्यंत व्यापक हो गया। प्रत्येक धार्मिक ग्रंथ, संस्कार और कर्म-कांड के लिए पुरोहितों की आवश्यकता होने लगी। इससे पुरातन वैदिक धर्म जन साधारण की समझ और सामथ्य के परे हो गया। साधारण जनता ऐसा सरल, सादा धर्म चाहती थी जो आडंबर और पांखडविहीन हो जो उनकी बोलचाल की भाषा में हो और जिसे वह भली-भाँति समझ सकें। (7) कर्म, तप और ज्ञान मार्ग की दुरूहता


इस युग तक कर्म, तप और ज्ञान मार्ग के प्रतिपादन से जनता में धार्मिक दुरूहता और बौद्धिक परिभ्रांति उत्पन्न हो गई थी। ब्राह्मणों ने इस तथ्य पर अधिक बल दिया कि मुक्ति की प्राप्ति के लिए मनुष्य धार्मिक क्रिया-विधियों,

अनुष्ठानों, यज्ञों एवं संस्कारों को विधिवत् संपन्न करे। यह धार्मिक कर्म-कांड के सिद्धांतों का प्रचार किया। उनका मत था कि मनुष्य वन में घोर तपस्या करे इंद्रियनिग्रह करे, भौतिक सफलताओं पर अंकुश रखे एवं परब्रह्म के साक्षात्कार के लिए मनन एवं ध्यान करने की शक्ति का विकास करे। कर्म और तपस्या के सिद्धांतों के अतिरिक्त तार्किकों और बुद्धिजीवियों ने ज्ञान-मार्ग का प्रतिपादन किया। उनका मत था कि आत्मा ईश्वर का अविच्छिन्न अंग है। वह ईश्वर से संबंधित है। वह ईश्वर में एवं ईश्वर का है, अतएव उसे ईश्वर में ही विलीन होना चाहिए। उनका कथन था कि आध्यात्मिक प्रगति, सांसारिक मुक्ति एवं अनंत आनंद और सुख की प्राप्ति के हेतु आत्मा की पवित्रता और उसका ईश्वर में विलीन होना अनिवार्य है। कर्म, तप और ज्ञान मार्ग के ये सिद्धांत इतने गूढ़ और क्लिष्ट थे कि साधारण मनुष्य के लिए इन्हें भली-भाँति समझना और उनका अनुकरण करना दुष्कर था। साधारण लोग न तो सभी प्रकार के कर्म-कांड में और यज्ञों को विधिवत संपन्न ही कर सकते थे, न वे संसार को त्याग कर घने वनों में जाकर तपस्या ही कर सकते थे और न गहन चिंतन और मनन द्वारा अनंत ईश्वरीय ज्ञान ही प्राप्त कर सकते थे। ये सभी सिद्धांत स्थूल बुद्धि वाले साधारण मनुष्य के लिए अति दुर्बोध थे।