आर्थिक कारण - commercial purpose

आर्थिक कारण - commercial purpose


(1) जन्मजात व्यवसायों की अपरिवर्तनशीलता


ब्राह्मण व्यवस्थाकारों ने अपनी चातुर्वण व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक जाति के और मनुष्यों के व्यवसाय निश्चित कर दिये थे, परंतु जातियों की बढ़ती हुई अधिकता, आर्थिक समस्याओं और व्यक्तिगत अभिरूचि के कारण कई लोग अपने जाति विरुद्ध व्यवसायों को नहीं कर पा रहे थे। जाति के व्यवसाय के विपरीत अंय व्यवसाय द्वारा जीविका निर्वाह करना अधर्म माना जाता था। इसके लिए कठोर दंड की व्यवस्था भी थी। समाज में नवोदित जातियों और उप जातियों के लोग नवीन व्यवसायों और धंधों को अपनाना चाहते थे, पर वे ऐसा नहीं कर सकते थे। परिवर्तित आर्थिक परिस्थितियों के कारण जनता ने ब्राह्मणों की सामाजिक व्यवस्था का विरोध किया और नवीन धर्मोपदेशकों ने इस विरोध को प्रोत्साहन दिया।



(2) व्यवसाध्य यज्ञ और धार्मिक कार्य


वैदिक संस्कृति के यज्ञ बहुधा दीर्घकालीन होते थे जिनमें यज्ञ की व्यवस्था पर ब्राह्मणों की दान- दक्षिणा पर और यज्ञ की सामग्री पर अत्यधिक व्यय होता था। यज्ञ, अनुष्ठान एवं विविध धार्मिक कार्य और संस्कार अधिक व्ययसाध्य हो गये थे और इनको संपन्न करना सामान्य मनुष्य के सीमित आर्थिक साधनों से परे था। यह भी आर्थिक असंतोष का एक कारण बन गया था। इस आर्थिक असंतोष और द्वेष को बुद्धिवादी विचारकों ने तीव्रगति प्रदान की। 


(3) उत्तर-पूर्वी भारत में कृषि और व्यापार में क्रांतिकारीविकास और भौतिक परिवर्तन


उत्तर वैदिककाल के बाद आर्यों का प्रसार उत्तर पूर्व की ओर हुआ।

वे जंगल काटकर खेती करते गये। लोहे के अनेक उपकरणों के प्रयोग से यह कार्य सरल हो गया। लोहे के हल का उपयोग कृषि में होने लगा। कृषि और यंत्रों के तथा फसलों व पौधों के उन्नत ज्ञान के कारण कृषक अधिक अनाज उत्पन्न करने लगे। कम श्रम से अधिक उत्पादन की क्षमता बढ़ी। कृषि के विकास के अतिरिक्त लौह उपकरणों के बढ़ते हुए प्रयोग से अनेक शिल्पों तथा उद्योग धंधों में भी प्रगति हुई। इसके परिणामस्वरूप व्यवस्थापनों का पर्याप्त विकास तो हुआ ही है, शहरीकरण की युगांतकारी प्रक्रिया भी पहले उत्तर-पश्चिम में और फिर उत्तर भारत से पश्चिम में समुद्रतट की ओर तथा दक्षिण की ओर व्यापारिक मार्ग प्रारंभ हो गये।

मुख्य व्यापारिक मार्ग गंगा नदी के इर्दगिर्द बिहार में राजगृह से कौशांबी से गुजरते थे और ये विदिशा तथा उज्जैन होते हुए पश्चिमी समुद्र तट पर भड़ौच तक पहुँचते थे। उज्जैन से एक मार्ग महेश्वर होते हुए दक्षिण में महाराष्ट्र में प्रतिष्ठान ( पैठन) तक जाता था। जातक कथाओं में 500 से लेकर 1000 गाड़ियों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाले व्यापारिक काफिलों का विशद विवरण है। उन्नत कृषि, बढ़ते हुए शिल्प व्यवसाय और व्यापार के कारण उत्तर भारत में अनेक नगरों का विकास हुआ। ईसा पूर्व 600 से 300 के बीच देश में 60 नगरों के अस्तित्व प्रमाण प्राप्त होते हैं। इनमें चंपा, राजगृह, कौशांबी, वैशाली, वाराणसी, कुशीनगर, श्रावस्ती, पाटलिपुत्र, उज्जैन, महेश्वर आदि प्रमुख थे। नगरों में अधिकतर व्यापारी, उद्योग-व्यवसायी, शिल्पी और शासक वर्ग के लोग रहते थे।

अब शिल्पी उद्योगों के कारण उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन के क्षेत्र में विशिष्टीकरण का बोलबाला हो गया। इस युग में आहत मुद्राओं (सिक्कों) के प्रवचन से व्यापार में व्यापक विस्तार हुआ। विभिन्न कलाओं और शिल्पों ने व्यापार को मौद्रिक अर्थ व्यवस्था से पूरी तरह जोड़ दिया। शिल्पी, उद्योग-व्यवसायी और व्यापारी अपने-अपने हितों के संवर्धन के लिए संघों और श्रेणियों में गठित होने लगे। इन क्रांतिकारी परिवर्तनों के कारण शासक वर्ग तथा व्यापारी अत्यधिक धनी होने लगे। निजी संपत्ति की धारणा दृढ़ होने लगी और उसे सामाजिक मान्यता मिली। ग्रामों में कृषि का महत्व बढ़ जाने से भू-स्वामियों की मान-मर्यादा में वृद्धि हुई।

अब वैदिकोत्तर काल में पशुओं की अपेक्षा कृषिभूमि से ही व्यक्ति की धन संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित की जाने लगी। नगरों में धनवान व्यापारी या श्रेष्ठी (सेठी) अपनी संपत्ति के कारण और गाँवों में गृहपति अपनी-अपनी कृषि भूमि के कारण समाज में महत्वपूर्ण होने लगे थे। अब पशु ही संपत्ति की इकाई नहीं था। संपत्ति का संचय विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन व्यापार और कृषि के रूप में हो रहा था। इससे गाँवों और नगरों में नवीन वर्ग अस्तित्व में आये, नये धनवान वर्ग का उद्भव हुआ। इससे आर्थिक विषमताएँ भी उत्पन्न हो गयीं। इस भौतिक परिवर्तन से समाज में नवीन समस्याएँ और विषमताएँ बढ़ी। इनमें से अधोलिखित प्रमुख थीं।


(अ) उत्तर पूर्व भारत में कबाइली जीवन था। यहाँ आर्येत्तर जनजातियाँ थीं।

ये छुट-पुट आबादी वाले ऊँची भूमि पर कुदाल से खेती करते थे और चावल तथा छोटे दाने वाली फसलों को उत्पन्न करते थे। वे पशुओं को केवल माँसाहार के लिए पालते थे, कृषि में उनके उपयोग के लिए नहीं जब आर्यों का प्रसार इस क्षेत्र में हुआ, तब यज्ञ विधान की परंपरा के कारण उन्होंने पशु-वध विशेष रूप से प्रचलित रखा। इस बीच नवीन कृषि प्रणाली में कृषि कार्य के लिए अधिकाधिक पशुओं की आवश्यकता बढ़ने लगी। लोगों ने अनुभव किया कि पशुओं की सुरक्षानितांत आवश्यक है। पशु वध चाहे आर्यों के वैदिक यज्ञों में हो या उत्तर पूर्व की जनजातियों में हो अब यह अनावश्यक परंपरा मान ली गयी थी। पशुधन कृषि का मुख्य


आधार बन गया था। धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और माँसाहारी जीवन इस पशुधन के निरर्थक सर्वनाश के साधन माने जाने लगे थे।

अतः पशु वध की निंदा की जाने लगी और पशुओं को सुख देने वाला और अन्न देने वाला कहा जाने लगा। अब धर्मोपदेशक पशु-वध विरोध करने लगे और वे अहिंसा का उपदेश देने लगे।


उपनिषदों में भी पशु वध की कटु आलोचना की गयी।


(ब) औद्योगिकी और लौह शिल्पकला के ज्ञान से अप्रभावित रहने वाली अनेक आर्येतर जनजातियाँ आर्यों के जीवन में व्याप्त भौतिक समृद्धि की तुलना में बहुत ही निम्न स्तर का जीवन व्यतीत कर रहीं थीं।

आदिम जनजातियाँ लौह यंत्रों के ज्ञान और कृषि संस्कृति से ओत-प्रोत वर्णविभक्त समाज से अलग- थलग रहकर मुख्यतया शिकारियों और बहेलियों का जीवन व्यतीत कर रहीं थीं, वे वन की उपज पर जीवन-निर्वाह कर रहीं थीं। उनके सांस्कृतिक पिछड़ेपन और हेय व्यवसायों के कारण वैदिकोत्तरकाल में समाज में अस्पृश्यता का विकास हो गया, छुआ-छूत और ऊँच-नीच की भावना बढ़ गयी। नवीन धर्मोपदेशकों और विचारकों ने इसका विरोध किया।


(स) पूर्वोत्तर भारत का प्राचीन जनजातीय जीवन नये सामाजिक और आर्थिक ढाँचे के लिए अब उपयोगी नहीं रह गया था। वैदिक संस्कृति के अंय तत्व उनके समाज में घर कर गये,

जैसे- जाति-व्यवस्था, यज्ञवाद, पुरोहितों का प्रभुत्व, वेदवाद, व्यापारियों और श्रेष्ठी वर्ग की धन संपन्नता आदि। समाज में निर्धनता, उसके कारण अस्पृश्यता, चोरी, झूठ, हिंसा, घृणा, बर्बरता आदि सामाजिक दोष भी बढ़ गये। इससे प्राचीन जीवन प्रणाली और नवोदित सामाजिक समूहों की आकांक्षाओं में परस्पर टकराव होने लगे। ऐसी परिस्थितियों में ऐसे नवीन सामाजिक, धार्मिक तथा दार्शनिक विचारों की खोज हुई जो एक ओर तो जनता के नये भौतिक जीवन की समृद्धि और उसमें बुनियादी परिवर्तनों के अनुरूप हों और दूसरी और समाज में व्याप्त कुप्रथाओं जैसे पशुवध, क्रूरता, अस्पृश्यता, ऊँच-नीच, पुरोहिती प्रभुत्व, वेदवाद, यज्ञवाद आदि पर कठोर प्रहार कर उनका उन्मूलन कर सकें।


फलतः ईसा पूर्व छठी सदी में गंगाघाटी के क्षेत्र में वैदिक धर्म और समाज में व्याप्त कुप्रथाओं के विरुद्ध प्रचार के लिए अनेक धर्मोपदेशकों का आविर्भाव हुआ।