सिंधु सभ्यता का सातत्य - Continuity of Civilization of Indus
सिंधु सभ्यता का सातत्य - Continuity of Civilization of Indus
सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में शहरी सभ्यता की ओर तीव्र गति से विकास हुआ। यह सभ्यता अपनी नगर योजना, नालियों की व्यवस्था, सार्वजनिक भवनों के निर्माण, दुर्गों और मीनारों के निर्माण, नगर प्रशासन और सफाई व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध थी। ये सारे गुण भारतीयों ने भिन्न-भिन्न कालों में अपनाए। पत्थर, पक्की ईंटों, स्तंभों, बाँध के उदाहरण सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता में दिखाई देते हैं। कालांतर में भारतीयों ने इनका अधिकाधिक प्रयोग किया।
सिंधु सभ्यता में कार्य विभाजन था, आगे चलकर पुरोहितों, शासकों, व्यापारियों, कुंभकारों, स्वर्णकारों, लौहकारों आदि का विकास हुआ।
वैदिक काल के प्रारंभ में इसी प्रकार के अनेक व्यवसाय मूलक वर्ग थे जो आगे चलकर जन्मगत होकर चतुर्वर्ण व्यवसाय में संगठित हो गए।
उत्खनन में इस सभ्यता के काल के मनोरंजन के साधनों में खिलौनों, शतरंज, पासा, चौपड़, शिकार, पशु-दौड़, मानव-पशु युद्ध आदि के प्रमाण मिलते हैं। इन सभी को परगामी सभ्यता ने ग्रहण कर लिया।
समृद्ध जीवन पद्धति वाली इस सभ्यता की अनेक सामग्रियाँ आगे के जीवन को प्रभावित करने वाली हुई। इस सभ्यता में घरेलू स्नानगृहों और नालियों पर विशेष बल डाला गया था।
आगे चलकर इन तत्वों का अन्य संस्कृतियों पर भी प्रभाव पड़ा। विशेष रूप से मोहनजोदड़ो में प्राप्त महास्नानागार, जिसका प्रयोग धार्मिक स्नानों के लिए विशेष रूप से किया जाता था, उत्तर भारतीय संस्कृति में आज भी विशेष धार्मिक पर्वों पर इस प्रकार के स्नानों का महत्व माना जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य उपयोग की वस्तुएँ जैसे पलंग, कुर्सी, मेज, चटाइयाँ, धातु और हाथी दाँत के बर्तन, विविध शृंगार सामग्री आदि जिनके अवशेष प्राप्त हुए हैं, आज भी उपयोग में लाई जाती है।
सैंधव नारियाँ अपने शृंगार में रुचि लेती थीं। उनके केश विन्यास और प्रसाधन सामग्री आभूषण,
सिंदूर, काजल, शलाकाएँ, दर्पण आगे चलकर भी स्त्रियों द्वारा प्रयोग में लाए गए। चूड़ियों का प्रयोग भी इसी सभ्यता से शुरू हुआ। सोने, चाँदी, हाथी दाँत आदि के आभूषण इस सभ्यता की तरह आज के समाज में भी प्रचलित है। सबसे ज्यादा आभूषण सिंधुवासी गले में धारण करते थे, जैसे- कंठा, हार, माला आदि। आज भी गले का आभूषण सबसे ज्यादा पाया जाता है। कंठ की रक्षा के लिए कंठा पहने जाते हैं और यह सिंधु सभ्यता की ही देन है।
इस सभ्यता का आर्थिक संगठन प्रेरणादायक सिद्ध हुआ। व्यावसायिक संस्थान सामूहिक बाजार के प्रबंध, तौल के बॉट, निर्यात के माल पर मुहर लगाने की व्यवस्था आदि का प्रबंधन उस युग में प्रारंभ हो जाना,
वास्तव में आश्चर्यजनक है। उनकी ये व्यवस्थाएँ एवं साथ ही मुद्राओं और मुहरों के लेख आगामी युगों में अनुकरणीय साबित हुए।
इस काल का प्रभाव परवर्ती भारतीय कला पर देखने को भी मिलता है। धातु को गलाने, मिलाने, साँचे में ढालने, पीट कर पतली चादर बनाने की कला को आगे चल कर भी अपनाया गया। उनकी वास्तुकला जैसे मोहनजोदड़ो के दुर्ग का स्तंभयुक्त हॉल आगे की वास्तुकला के स्तंभों की कला में भी झलकता है।
धार्मिक क्षेत्र में तो इस सभ्यता का प्रभाव आज भी देखने को मिलता है। उस काल में शुरू हुई शिव पार्वती, चंडी, काली, सरस्वती, लक्ष्मी आदि की पूजा आज के समाज में भी हमें देखने को मिलती है।
उनका पशुपति हिंदू धर्म का शिव हो गया। उनकी मातृ देवी ने शाक्त धर्म को जन्म दिया। इस सभ्यता के काल में प्रचलित पवित्र स्नान, जल-पूजा, वृक्ष पूजा भारतीय धर्मों में विशेषतया हिंदू धर्म में प्रभाव डाल गई। वृक्षों की पूजा जैसे- पीपल, तुलसी की पूजा आज के समाज में भी हमें देखने को मिलती है। गीता में भी वृक्षों में पीपल को सर्वोत्तम कहा गया है। इस काल से प्राप्त वृषभ, हाथी, सिंह, अश्व आदि की मूर्तियाँ कालांतर में क्रमश: यम, इंद्र, दुर्गा और बौद्ध की प्रतीक बन गई। इस काल में आरंभ हुई काली, चंडी आदि विविध मातृ-देवियों की चर्चा पुरानी एवं तांत्रिक साहित्यों में मिलती है। इस काल में ताबीज़ पहनने का प्रचलन प्रारंभ हो चुका था, जिसका प्रचलन आज भी देखने को मिलता है। सैंधव नर्तकियों और देवदासियों ने पूर्व मध्यकालीन मंदिरों में स्थान पाया। जॉन मार्शल के कथनानुसार हिंदू धर्म का कोई ऐसा अंग नहीं है, जो सिंधु काल के धर्म से प्रभावित न हुआ हो। इस प्रकार इस काल का सातत्य बना रहा।
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