कापिशी - Cotton

कापिशी - Cotton


अफगानिस्तान में गंधार कला का एक महत्वपूर्ण केंद्र कुषाण सम्राटों की गर्मियों की राजधानी कापिशी थी। फ्रेंच पुरातत्वज्ञों को इसके वर्तमान स्थान बेग्राम पर हाथीदाँत के बहुत से फलक मिले हैं जो किसी समय शृंगार-पेटियों या रत्न- मंजूषाओं पर जड़े हुए थे। इनमें हमें एक ओर विशुद्ध भारतीय प्रभाव और दूसरी ओर कुछ वस्तुओं पर रोमन कला का प्रभाव दिखाई देता है। भारतीय कला के उदाहरण प्रायः मथुरा की कला से बहुत सादृश्य रखते हैं। इनमें अशोक वृक्ष पर वामपाद से प्रहार करती हुई स्त्रियाँ हैं। इनके बालों के जूड़े को कई घेरों में एक-दूसरे के ऊपर उठा कर निकलती हुई लट के साथ दिखाया गया है। इसे प्राचीन साहित्य में शुक्लांशुक अट्टाल कहा जाता था। इस केश-भूषा का चित्रण मथुरा में भी पाया जाता है।

हाथीदाँत पर अंकित अन्य दृश्यों में शृंगार का सामान ले जाने वाली प्रसाधिका, उड़ते हुए हंस, पूर्ण घट, हंस क्रीड़ा, प्रसाधन और नृत्य करने वाली स्त्रियाँ तथा वंशी बजाती हुई और लंबे केशों से पानी निचोड़ती हुई स्त्रियाँ हैं। इन खियों के मांसल शरीर की कामुक अनुभूति वैसी है जैसी मथुरा के वेदिका- स्तंभों की नारियों में पायी जाती हैं। कापिशी में पश्चिमी कला का प्रभाव सूचित करने वाले अनेक रंगीन प्याले मिले हैं। यह स्थान उन दिनों पूर्व और पश्चिम के व्यापार का महान केंद्र था और इन पात्रों को संभवतः व्यापारी रोम से लाये थे। इन पात्रों पर अनेक यूनानी दृश्य अंक्ति है,

जैसे एकली और हेरा के द्वंद का दृश्या एक तिकोने प्याले पर ज्यूस के गरुड़ द्वारा गेनीमेडी के अपहरण के और एक वृषभ द्वारा यूरोप के अपहरण के दृश्य अंकित हैं। मसाले के बने गोल टिकरों पर रोम देश के सुंदर स्त्री पुरूषों के और पान गोष्ठियों के दृश्य अंकित हैं इन कलावशेषों से यह सूचित होता है कि कापिशी के व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र को एक ओर मथुरा की तथा दूसरी ओर रोम की कला ने बहुत प्रभावित किया था। कलाशास्त्री ग्लोव्यू ने दृढतापूर्वक यह स्थापना की है कि कापिशी के हाथीदांत के फलक अधिकांश रूप में मथुरा की कला की देन है। काबुल से 12 मील उत्तर खैरखाना में 1936 में एक पुराने मंदिर से सूर्य की मूर्ति मिली थी। इसमें सूर्य दोनों पैर लटकाये हुए ललितासन में अपने सेवक दंड और पिंगल के मध्य में दो घोड़ों के रथ पर बैठे हुए हैं। सूर्य चौथी शताब्दी के सासानी राजाओं का वेष धारण किये हुए हैं।


अफगानिस्तान से बलख जाने वाले मार्ग पर बामियाँ का दर्रा बड़ा महत्व रखता है। इस दर्रे के निकट अनेक गुफायें हैं। इनमें अजंता जैसे भित्ति चित्र हैं। इन चित्रों पर सासानी युग के ईरान की छाप है। और मध्य एशिया की चित्रकला का प्रभाव है। उन दिनों बामियाँ चीन तथा मध्य एशिया से भारत आने वालों का प्रवेश द्वार था। यहाँ श्रद्धालु, धर्मपिपासु बौद्ध चीन और मध्य एशिया से तथा व्यापारी ईरान और रोम से आते थे। श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों को भारत के दिव्य रूप का दर्शन करने के लिए न केवल यहाँ भित्तिचित्रों का निर्माण किया गया, अपितु बुद्ध की अतीव भीमकाय मूर्तियाँ बनाई गई थीं। इस समय ऐसी दो मूर्तियाँ मिलती हैं, जिनमें से एक 114 फीट ऊँची और दूसरी 173 फुट ऊँची हैं। बामियाँ के बाद उत्तर की ओर बढ़ते हुए बैक्ट्रिया सुप्रसिद्ध यूनानी राज्य की राजधानी बैक्ट्रिया आती थी। यह उन दिनों न केवल व्यापार का, अपितु कला और संस्कृति का बहुत बड़ा केंद्र था। यहाँ नवविहार नामक एक विहार के अवशेष मिले हैं। आमू नदी के उत्तरी तट पर तिरमिज इस कला का एक बड़ा केंद्र था। यहाँ पहली शताब्दी ई. के एक स्तूप में बोधिसत्व की प्रतिमाएँ मिली हैं।