वैदिक सहित्य का रचनाकाल - Creation of Vedic

वैदिक सहित्य का रचनाकाल - Creation of Vedic


वैदिक साहित्य के संपूर्ण रचनाकाल के संबंध में इतिहासकारों के अनेक मत हैं, परंतु सौभाग्य से एक पहलू पर पर्याप्त सहमति है। रचनाकाल की दृष्टि से इस विपुल साहित्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है- पूर्व वैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल ।


सामान्यतया ऋक संहिता के रचनाकाल को पूर्व वैदिक काल तथा शेष अन्य संहिताओं एवं ब्राह्मण आरण्यक, उपनिषदों के रचनाकाल को उत्तर वैदिक काल माना जाता है, किंतु एक ही संहिता अथवा ग्रंथ में स्तरीकरण के स्पष्ट चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं। उदाहरण के तौर पर अनेक सूक्त ऐसे प्रतीत होते हैं, जो परवर्ती काल के हैं। अन्य वैदिक ग्रंथों में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिसमें रचनाकाल के अन्य कालक्रम को भी देखा जा सकता है,

जैसे कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण, ऐतरेय के मूल खंड। इसी प्रकार उपनिषदों को भी एक निश्चित काल में बांधना संभव नहीं है। यदि कुछ उपनिषद ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रंथों के समकालीन हैं तो कुछ बुद्ध के काल से बहुत पूर्व के नहीं हैं और कुछ तो उसके बाद के हैं। इसी प्रकार यद्यपि भाषाविज्ञान की दृष्टि से अथर्ववेद को अत्यंत परवर्ती काल का माना जाता है, किंतु उसकी विषय सामग्री ऋग्वेदकालीन जनजीवन से बहुत अलग नहीं लगती है। वैदिक साहित्य के रचनाकाल की समस्या के इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ऋग्वेद का रचनाकाल ईसा पूर्व लगभग 1500 से 1000 तक तथा उत्तर वैदिक काल ईसा पूर्व लगभग 1000 से 600 तक रहा होगा।