संस्कृति एवं समाज - culture and society
संस्कृति एवं समाज - culture and society
संस्कृति की उपरोक्त वर्णित विशेषताओं से यह स्पष्ट है कि संस्कृति मानव का निर्माण है एवं उसके अस्तित्व की निरंतरता के लिये भूतकाल की विरासत के रूप में हस्तांतरणशीलता अत्यंत आवश्यक है। यह भी सही है कि संस्कृति किसी एक व्यक्ति या समूह पर निर्भर नहीं होती, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपना जीवन स्वयं जी सकती है। मानव समाज में ही संस्कृति का निर्माण होता है, वहीं संस्कृति विकसित होती है। अतः सांस्कृतिक विकास की गति बहुत कुछ समाज पर निर्भर रहती है।
अब तक के विश्लेषण से स्पष्ट हो चुका है कि संस्कृति एक सामाजिक विरासत है।
यह पैतृकता से प्राप्त नहीं होती है वरन् यह एक सीखा हुआ व्यवहार होता है जिसे मनुष्य, समाज का सदस्य होने के नाते सीखता है। इस प्रकार यदि एक समाज संपूर्णमानव समाज की एक इकाई है तो संस्कृति उस इकाई का एक भाग है। संस्कृति समाज रूपी बड़े फोटोग्राफ की छोटी फोटोप्रति है। संस्कृति यदि समाज का दर्पण है तो समाज भी संस्कृति का दर्पण है।
संस्कृति समाज पर आश्रित है
संस्कृति मानव निर्मित वातावरण का एक भाग है। समाज में रहकर मानव, संस्कृति का निर्माण करता है।
समाज के बाहर संस्कृति का निर्माण नहीं होता। उसके निर्माण समाज पर आश्रित होते हैं। समाज उसके निर्माणों को स्वीकार कर सकता है या अस्वीकार भी। इसी प्रकार व्यवहार का एक तरीका मान्य भी किया जा सकता है व अमान्य भी घोषित किया जा सकता है। अतः यह स्पष्ट है कि संस्कृति समाज पर आश्रित रहती है।
संस्कृति समाज में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। समाज में ही संस्कृति का विस्तार होता है समाज में ही संस्कृति का विकास होता है। समाज ही सांस्कृतिक विरासत का साधन है। इस प्रकार स्पष्ट है कि समाज एवं संस्कृति में घनिष्ठ संबंध है। मेलिनोस्की ने इसीलिये कहा है कि संस्कृति सामाजिक विरासत है" । लिंटन के अनुसार संस्कृति सामाजिक पैतृकता है" लुई के अनुसार "संस्कृति समाज की संपूर्ण परंपरा है।
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