कला का विकास एवं तिथिक्रम - Development and chronology of art

कला का विकास एवं तिथिक्रम - Development and chronology of art


गंधार कला का विकास और तिथिक्रम अत्यंत विवादग्रस्त है। इस पर प्रकाश डालने वाली मूर्तियाँ कम हैं। केवल कुछ मूर्तियों पर ही वर्ष अंकित हैं, जैसे हश्तनगर की 384 वर्ष की मूर्ति तथा लौरियाँ तंगई की 318 वर्ष की मूर्ति हैं। किंतु अभी तक यह नहीं ज्ञात नहीं हो सका है कि ये वर्ष किस संवत् के अनुसार है। अतः गंधार कला का तिथि निर्धारण मूर्तियों की विकास-शैली के आधार पर गया है। किंतु इस विषय में विद्वानों में विभिन्न मत हैं। सर्वप्रथम कनिंघम ने गंधार की मूर्ति-कला का स्वर्णयुग कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों का समय माना था,

किंतु दुर्भाग्यवश कनिष्क की तिथि के संबंध में उग्र मतभेद है। फर्गुसन ने इसका समय पहली शताब्दी ई.पू. से 5वीं शताब्दी ई. मानते हुए इसका स्वर्ण युग 400 ई. के आसपास माना। विंसेंट स्मिथ ने इस पर रोमन प्रभाव मानते हुए इसके चरम उत्कर्ष का समय 50 से 150 अथवा 200 ई. निश्चित किया था। ग्रुइन वेडल और फूशे इसका आरंभ पहली शताब्दी ई. पू. में मानते हैं। किंतु इसके चरम विकास का काल पहले विद्वान के मतानुसार चौथी शताब्दी ई. का उत्तरार्द्ध है और दूसरे के मतानुसार पहली शताब्दी ई.पू. है। यह पहली शताब्दी में ही इसका हास मानता है। वोगल फूशे से सहमत है, किंतु रोलैंड ने रोम और गंधार की कलाओं की तुलना करते हुए यह मत प्रकट किया है कि गंधार कला का आविर्भाव पहली शताब्दी ई. के उत्तरार्द्ध में हुआ और इसके

चरम उत्कर्ष का समय पहली शताब्दी ई. के अंत से चौथी शताब्दी ई. के आरंभ तक था। घिर्शमान ने इसका आरंभ पहली शताब्दी ई. में उत्कर्ष दूसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में और इसका ह्रास तीसरी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में माना है। इस विषय में दो नवीनतम मत हेरोल्ड इंघोल्ट तथा मार्शल ने प्रकट किये हैं। इंघोल्ट के मतानुसार शैली के आधार पर गंधार की मूर्तियों को 4 वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग की मूर्तियों का समय 144 ई. से 240 ई. है। उनके मतानुसार इसका आरंभ कनिष्क के राज्यारोहण से तथा समाप्ति ईरान के सासानी सम्राट शापुर प्रथम की विजय के साथ होती है। दूसरे वर्ग का समय बहुत ही कम 240 से 300 ई. तक का है। तीसरे वर्ग का समय 300 से 400 ई. का है। चैथे वर्ग की मूर्तियों का समय 400 से 460 ई. तक का है, जब श्वेत हूणों ने इस प्रदेश को जीत कर यहाँ बौद्ध विहारों और स्तूपों को गहरी क्षति पहुँचाई। इस प्रकार गंधार कला का विकास चार अवस्थाओं या युगों में हुआ। पहले युग में इस कला पर यूनानी प्रभाव के अतिरिक्त ईरान का प्रभाव भी पड़ने लगा था। दूसरे युग में ईरान के सासानी प्रभाव में वृद्धि हुई। तीसरे युग में मथुरा की कला का गहरा प्रभाव पड़ा और चौथे युग में इस कला पर ईरान का सासानी प्रभाव प्रबल होने लगा। सर-जान मार्शल ने जीवन पर्यंत गंधार कला का अध्ययन करने के बाद इसके क्रमिक विकास के संबंध में यह निष्कर्ष निकाला है कि इसका आविर्भाव शक शासन के समय में पहली शताब्दी ई. पू. में हुआ। पहलव शासकों से पहली शताब्दी ई. में इसे प्रोत्साहन मिला। 25 से 60 ई. तक इसका शैशव काल है। इसके बाद कुषाण सम्राटों के प्रोत्साहन से यह कला दूसरी शताब्दी ईस्वी में किशोरावस्था और यौवन दशा को प्राप्त हुई। इस प्रकार अधिकांश विद्वानों ने इस बात पर सहमति प्रकट की है कि कनिष्क के समय में गंधार कला को प्रबल प्रोत्साहन मिला।