बुद्ध प्रतिमा का विकास - development of buddha statue

 बुद्ध प्रतिमा का विकास - development of buddha statue


मथुरा के कलाकारों की भाँति गंधार के शिल्पियों ने भी बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण किया था, किंतु यह मूर्ति शैली की दृष्टि से मथुरा की मूर्ति से भिन्न है। मथुरा में यक्षों और योगियों की पुरानी परंपरा का अनुसरण करते हुए तथागत की मूर्ति का निर्माण किया गया था, किंतु गंधार के शिल्पियों ने इस विषय में यूनानी कला का अनुसरण किया। प्रायः यह कहा जाता है कि यूनानियों ने अपने सूर्य देवता अपोलो की प्रतिकृति का अनुसरण करते हुए बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण किया है। किंतु इस विषय में आनंद कुमार स्वामी का यह मत अधिक समीचीन जान पड़ता है कि गंधार की मूर्तिकला में अपोलो को बुद्ध नहीं बनाया गया, किंतु बुद्ध को अपोलो बनाया गया है।

इसका यह अभिप्राय है कि गंधार के कलाकारों का उद्देश्य तो भारतीय आधार पर बुद्ध की मूर्ति को बनाना था, किंतु उनका हाथ यूनानी कला में सधा हुआ था, इसलिए उन्होंने बुद्ध को यूनानी आदर्शों के अनुसार गढ़ा। गंधार की बुद्धमूर्ति में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं (1) बुद्ध का चेहरा यूनानी देवता अपोलो के अनुसार विशुद्ध अंडाकार और सौम्य भाव रखने वाला बनाया गया है। (2) रोम में अपोलो और एफ्रोडाइटयूनानी मूर्तियों के सिर में जूड़ा बनाया जाता था। इसमें बाल सिर के ऊपर एक या दो जूड़ों के रूप में बँधे हुए होते थे। यूनानी सूर्य देवता के सिर पर बनाये गये ऐसे उभार को क्रोबीलोज कहते थे।

गंधार के कलाकारों ने इसका अनुसरण करते हुए बुद्ध के सिर पर उष्णीष बनाया। (3) बुद्ध का वेष भी तत्कालीन रोम में प्रचलित देश के अनुसार है। उस समय रोम में टोगा का वेष प्रचलित था। टोगा नागरिकों द्वारा धारण किया जाने वाला तथा सारे शरीर को ढँकने वाला चोगा या एक बड़ी चादर होता था। गंधार कला में बुद्ध को ऐसा चोगा पहने दिखाया गया है। रोलैंड के मतानुसार ऑगस्टस के युग में रोम की मूर्तियों की भाँति बुद्ध के वस्त्रों की सलवटों को गहरी लकीरों के रूप में उकेरा गया है। इस प्रकार बुद्ध की प्रतिमा पर पहली शताब्दी ई.

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की रोमन कला का स्पष्ट प्रभाव है। किंतु इसके साथ ही गंधार के कलाकारों ने बुद्ध को बनाते हुए अपने प्रधान उद्देश्य को विस्मृत नहीं किया और इसे बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के आधार पर बनाया। इन मूर्तियों के अर्धनिमीलित नेत्र भौतिक जगत् से अनासक्ति की भावना को प्रकट करते हैं। इनके मुखमंडल पर माधुर्य प्राणिमात्र के प्रति कल्याण की कामना को सूचित करता है। इन मूर्तियों के कान लंबे हैं। ये संभवतः बुद्ध द्वारा सिद्धार्थ के रूप में बड़े कुंडल धारण करने के कारण ऐसे हो गये हैं। कुछ मूर्तियों में कुषाण प्रभाव के कारण मूँछे भी दिखाई गई हैं। गंधार का प्रदेश शीतप्रधान था, अतः यहाँ बुद्ध के दोनों कंधे ढके हुए दिखाये गये हैं और बुद्ध के व भारी और मोटे हैं। उपरले वस्त्रों के भीतर से मथुरा की मूर्तियों की भाँति निचले वस्त्र नहीं दिखाई देते हैं। बुद्ध की कुछ बैठी मूर्तियों में एक दाँया कंधा नंगा दिखाया गया है।.