जाति प्रथा का विकास - development of caste system
जाति प्रथा का विकास - development of caste system
आर्यों की राजनीतिक प्रभुत्ता रक्त, वंश और वर्ण की शुद्धता की भावना श्रम विभाजन की प्रवृत्ति ने जाति प्रथा के निर्माण में अपना-अपना योग दिया है। ईस्वी सन् की प्रारंभिक सदियों में चार वर्णों से प्रारंभ होने वाली जाति प्रथा अधिकाधिक जटिल और गूढ़ होने लगी। कालांतर में चार वर्ण छोटी- छोटी जातियों और उपजातियों में विभाजित हो गये। प्रत्येक जाति और उपजाति का एक विशेष व्यवसाय हो गया और उस पेशे पर उस जाति का एकाधिकार हो गया। अब जन्म से ही मनुष्य की जाति या उपजाति निर्दिष्ट होने लगी। जातियों की संख्या की वृद्धि के साथ-साथ जाति प्रथा की संकीर्णता और अपरिवर्तनशीलता भी बड़ी । निम्नलिखित तत्वों ने भी जातियों की वृद्धि और उसकी अपरिवर्तनशीलता में बड़ा योग दिया।
1. पुरोहित वर्ग द्वारा जातियों के नवीन सिद्धांत
2. नवीन धंदे
3. विदेशियों की नवीन जातियाँ
4. समुदायों के देशांतर गमन और प्रवास से नवीन जातियाँ
5. रीति-रिवाजों में परिवर्तन और जाति- बहिष्कार
6. बौद्ध और जैन धर्म तथा अहिंसा का सिद्धांत
7. नवीन धार्मिक संप्रदाय
8. भाग्यवाद, कर्म और पुनर्जम के सिद्धांत
9. धार्मिक तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ
10. दीर्घ अवधि का प्रभाव
11. अंतर्जातीय विवाह और संबंध
12. मुस्लिम आक्रमणकारियों का प्रभाव
ब्रिटिश शासन काल की प्रारंभिक अवधि में जाति प्रथा ज्यों की त्यों बनी रही, किंतु ईसाई धर्म के प्रचार तथा अंग्रेजी शिक्षा एवं विदेशसंपर्क के फलस्वरूप जाति प्रथा कमजोर होती चली गई।
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