संस्कृति एवं सभ्यता में अंतर - difference between culture and civilization
संस्कृति एवं सभ्यता में अंतर - difference between culture and civilization
संस्कृति व सभ्यता में अंतर निम्नानुसार समझा जा सकता है-
(1) सभ्यता को मापा जा सकता है संस्कृति को नहीं
सभ्यता अथवा उपयोगितावादी व्यवस्था कुशलता की कसौटी पर मापी जा सकती है। एक वस्तु की उपयोगिता का तुलनात्मक दृष्टि से माप किया जा सकता है। सभ्यता के उत्पादनों का भौतिक तुलनात्मक अध्ययन करके हम यह कह सकते हैं कि कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है व कौन-सी हल्की है। उनकी कुशलता का अनुमान लगाया जा सकता है और तथ्यों की माप भी की जा सकती है। हल बक्खर की अपेक्षा ट्रॅक्टर श्रेष्ठ है। एक कार बैलगाड़ी से अधिक तेज चलती है, एक हवाई जहाज कार से भी तेज चलता है। ये ऐसे उदाहरण हैं जिन से सिद्ध होता है
कि सभ्यता की वस्तुओं की श्रेष्ठता या हीनता को उनकी क्षमता के आधार पर मापा जा सकता है, किंतु संस्कृति की श्रेष्ठता या हीनता का कोई माप संभव नहीं है। प्रत्येक समूह यह विश्वास करता है कि उसकी संस्कृति श्रेष्ठ है। स्पष्ट है सभ्यता की वस्तुओं के समान संस्कृति का स्पष्ट माप संभव नहीं है।
(2) सभ्यता सदैव ही आगे बढ़ती है परंतु संस्कृति नहीं
मेकाइवर के अनुसार सभ्यता न केवल आगे बढ़ती है बल्कि उन्नति भी करती है
और सदैव ही आगे बढ़ती रहती है जब तक कि उसमें सामाजिक निरंतरता का कोई बड़ा विपत्तिजनक अवरोध पैदा न हो सभ्यता हमेशा ही एक दिशा में प्रगति करती रहती है। यह संचयी है तथा इसकी प्रवृत्ति अनिश्चित समय तक बढ़ते रहने की है। मनुष्य ने जब से आटोमोबाइल्स का आविष्कार किया तब से यह निरंतर प्रगति कर रही है और आज तो इसने इतनी प्रगति कर ली है कि द्रुतगति के आटोमोबाइल्स से मीलों की यात्रा मिनटों में की जा सकती है। अतः स्पष्ट है कि सभ्यता सदैव आगे बढ़ती रहती है किंतु संस्कृति के इस संबंध में इस प्रकार स्पष्ट कथन प्रकट नहीं किया जा सकता।
(3) सभ्यता बिना प्रयास के आगे बढ़ जाती है संस्कृति नहीं
सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिये विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती।
संस्कृति के हस्तांतरण के सिद्धांत सभ्यता के हस्तांतरण के सिद्धांतों से भिन्न हैं। संस्कृति केवल समान विचार वालों को ही हस्तांतरित की जा सकती है। एक कलाकार के गुण की प्रशंसा कलाकार के गुण वाला व्यक्ति ही कर सकता है। पंखे की हवा का आनंद कोई भी उठा सकता है किंतु पंखे की तकनीकसे केवल कुछ ही परिचित होते हैं। अतः सभ्यता बिना प्रयास के आगे बढ़ जाती है किंतु संस्कृति नहीं।
(4) सभ्यता को सरलतापूर्वक ग्रहण किया जा सकता है, संस्कृति को नहीं
सभ्यता के उपकरणों को बिना किसी परिवर्तन के एवं बिना किसी प्रकार की हानि उठाये ग्रहण किया जा सकता है। एक देश में आविष्कृत मशीन का प्रयोग विश्व के किसी भी देश में उसी रूप में किया जा सकता है।
उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती, न ही उसके उपयोग से किसी प्रकार की हानि की संभावना रहती है। भारत में उत्पन्न बजाज स्कूटर का प्रयोग अंय देशों में भी उसी रूप में किया जाता है, परंतु संस्कृति को सामान्यतः बिना परिवर्तन के उसके मूल रूप में नहीं अपनाया जा सकता। एक संस्कृति का जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रसार होता है तो उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन हो ही जाता है।
(5) सभ्यता में कोई भी सुधार कर सकता है, संस्कृति में नहीं
एक कम बुद्धि वाला व्यक्ति भी सभ्यता में किसी उपकरण का प्रयोग करते करते उसमें सुधार ला सकता है,
परंतु एक बुद्धिमान व्यक्ति भी टैगोर या मिल्टन की कविताओं को सुधार नहीं सकता। संस्कृति व्यक्तिगत योग्यता, रुचि एवं विचारों से संबंधित हैअतः उसमें सुधार करने के प्रयत्न उसे और हानि पहुँचा सकते हैं।
(6) सभ्यता बाह्य एवं यांत्रिक है जबकि संस्कृति आंतरिक एवं सावयवी है
मेकाइवर के अनुसार सभ्यता वह है जो हम रखते हैं व संस्कृति वह है जो हम हैं। जो हम रखते हैं वह निश्चित रूप से भौतिक तो होगा ही अतः वह सभ्यता है। हम क्या हैं? जो हम हैं वह संस्कृति है। हमारे रीति-रिवाज, जिनके अनुरूप हम रहते हैं वह संस्कृति है।
संस्कृति व सभ्यता में अंतर स्पष्ट करने का यह तात्पर्य नहीं है कि संस्कृति में व सभ्यता में केवल विरोधाभास ही हो। वास्तव में दोनों ही एक दूसरे से संबंधित है पूरक हैं एवं एक-दूसरे पर आश्रित भी हैं। संस्कृति और सभ्यता न केवल एक-दूसरे पर आश्रित होती हैं वरन् उनके मध्य परस्पर अंत : क्रियात्मक संबंध भी होते हैं। कई तत्व ऐसे हैं जिन्हें संस्कृति एवं सभ्यता दोनों में सम्मिलित किया जा सकता है। जैसे विदेशी लेखकों की विज्ञान की वे पुस्तकें जिन्हें विदेशी प्रकाशकों द्वारा ही मुद्रित किया गया हो, उन्हें बिना किसी परिवर्तन के भारत में स्वीकार कर लिया जाता है।
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