वर्ण और जाति में भेद - distinction between varna and caste

 वर्ण और जाति में भेद - distinction between varna and caste


'वर्ण' शब्द का प्रारंभ ऋग्वैदिक काल के अंत में हुआ और 'जाति' शब्द उत्तर वैदिक युग में। वर्ण से तात्पर्य है शरीर का रंग और जाति से अभिप्राय है किसी विशेष समुदाय में जन्म और उसका निश्चित व्यवसाय। जब ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में आर्य भारत में आये और यहीं स्थायी रूप से बस गये, तब से यहाँ के मूल निवासियों से शरीर रचना और रंग में,

धर्म, रीति-रिवाजों आदि में भिन्न थे। वे गौर वर्ण के थे और प्रकृति पूजक थे। इसके विपरीत भारत के निवासी श्याम वर्ण के थे और उनकी धार्मिक धारणाएँ और विधियाँ भिन्न थीं। इसलिए समाज में दो वर्ण थे, एक आर्य और दूसरा अनार्य।


आर्यों ने अपने समाज में व्यवसाय के अनुसार तीन वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्थापित किये। इस प्रकार ‘वर्ण” का अर्थ है समुदाय या समूह या वर्ग। वर्ण या वर्ग का संबंध राजनीतिक और सामाजिक रहा, पर जाति का संबंधपरंपरागत पेशे और विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाजों व विश्वासों का पालन रहा है।

एक ही वर्ण में एक व्यवसाय और भिन्न-भिन्न व्यवसाय करने वाले लोग थे, परंतु एक जाति में एक ही व्यवसाय करने वाले लोग होते थे। वर्ण-व्यवस्था में अंतर्जातीय विवाह, खान-पान और सहभोज प्रचलित था, परंतु विभिन्न जातियों में ऐसी प्रथा नहीं होती थी। वर्ण-व्यवस्था में अस्पृश्यता का बाहुल्य नहीं हैं, परंतु जाति-व्यवस्था में छुआ-छूत का भेदभाव अधिक है। वर्ण-व्यवस्था में रक्त की शुद्धता पर बल दिया जाता था। परंतु जातियों में रक्त की शुद्धता, धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों की विशिष्टता पर अधिक जोर दिया जाता था। एक जाति में धार्मिक विधियाँ, सामाजिक रीति-रिवाज और आचरण एक से होते हैं, इनमें एकता और समानता होती है।