भारतीय संस्कृति के प्रसार के कारण - Due to the spread of Indian culture

भारतीय संस्कृति के प्रसार के कारण - Due to the spread of Indian culture


(1) भारतवर्ष की अनुकूल केंद्रीय स्थिति


प्राचीन युग में हिंद महासागर में स्थित होने के कारण भारत की केंद्रीय अनुकूल स्थिति थी और वह प्राचीन विश्व के सभ्य तथा सुसंस्कृत देशों के सामुद्रिक मार्गों के मध्य में पड़ता था। वह पूर्व और पश्चिम के देशों को परस्पर संबंधितकरने के हेतु एक कड़ी के समान था। इसके अतिरिक्त भारत एशिया के दक्षिण भाग में स्थित होने से एशिया के विभिन्न देशों के साथ जल और थल दोनों मार्गों से अपना संबंध सरलता से स्थापित कर सका। अत्यंत प्राचीन काल से ही भारतीय पूर्व और पश्चिम के विभिन्न देशों को आते-जाते रहे और उन्होंने इन देशों से अपने संबंधस्थापित कर लिये।


 (2) स्वर्ण की लालसा एवं व्यापारिक सोच


पूर्व के देश जैसे जावा, सुमात्रा, मलाया, ब्रह्मा आदि प्राचीन काल में धन-धान्यपूर्ण देश थे। वे स्वर्ण की खानों के देश समझे जाते थे। उनकी धन-संपन्नता और स्वर्ण की खानों के कारण भारतवासी इन पूर्वी देशों को स्वर्णभूमि या स्वर्णद्वीप कहते थे। अनेक भारतीय स्वर्ण प्राप्त करने की अधिक लालसा के कारण समुद्र पार इन देशों को गये। भारत के अनेक व्यापारी इन देशों में व्यापार करने तथा धनोपार्जन के उद्देश्य से गये। ये व्यापारी पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में नील नदी के मुहाने पर स्थित अलेक्जेंड्रिया या सिकंदरिया नगर तक के प्रदेशों को आया-जाया करते थे।

इन देशों की असभ्य और अनुन्नत जातियाँ भारत के साहसी और सभ्य वणिकों के संपर्क में आयी और उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रथम पाठ उनसे सीखे। अनेक जातक कथाओं, जैन ग्रंथों, बृहत्कथा तथा अंथ साहित्यिक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि व्यापार और धन कमाने की लालसा ने भारत तथा अंय देशों के सांस्कृतिक संबंधों में गतिशीलता प्रदान की।


(3) उपनिवेश स्थापना की भावना


प्राचीन काल में कभी-कभी पराक्रमी राजकुमार अपने भाग्य की खोज करने, नवीन राज्य और उपनिवेशों की स्थपना करने के हेतु भारत के बाहर समुद्र पार ब्रूस्थ देशों को जाते थे।

उपनिवेश तथा अपने राज्य स्थापित करके उन पर शासन करने के ध्येय से अनेक साहसी योद्धा राजवंशी लोक भी भारत से बाहर गये। वे स्थायी रूप से विदेशों में निवास कर अपने नवनिर्मित राज्यों पर शासन करने लगे। ये राजकुमार और उनके राज्य भारतीय संस्कृति के केंद्र बन गये । तिब्बती अनुश्रुति के अनुसार अशोक के एक पुत्र कुस्तन ने मध्य एशिया के खोतान प्रदेश में भारतीय उपनिवेश और अपना राज्य स्थापित किया। कौंडिक नामक एक साहसी भारतीय ब्राह्मण के नेतृत्व में अनेक भारतीय पूर्वी देशों को गये और उन्होंने हिंदू उपनिवेश की स्थापना की। चीनी इतिहास में इसे फूनान कहते थे। पूर्वी देशों में भारतीयों के ऐसे राज्य स्थापित हो गये और उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रसार में बड़ा योग दिया। 


(4) धर्म प्रचार


अशोक, कनिष्क हर्ष जैसे धर्मनिष्ठ भारतीय सम्राटों ने लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर अनेक बौद्ध धर्म प्रचारक और भिक्षुओं के समूह विदेशों में अपने धार्मिक सिद्धांतों के प्रसार के हेतु भेजे। धीरे-धीरे अंय बौद्ध धर्म प्रचारक, ब्राह्मण आचार्य तथा उपदेशक भी भारतीय सौदागरों के साथ-साथ विदेशों में गये। वे भारतीय विचार और संस्कृति को अपने साथ लेते गये। ये असभ्य बर्बर विदेशी जातियों में जाते तथा भीषण बाधाओं के होने पर भी उन्हें अपने धर्म का उपदेश देते थे और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें सभ्य, सुसंस्कृत और उन्नत बनाते थे। परिणाम यह हुआ कि चीन, जापान, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, कंबोडिया, ब्रह्मा, लंका, अफगानिस्तान, तिब्बत, खोतान, चीनी, तुर्किस्तान आदि देशों में जहाँ- जहाँ भी भारत के बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्म के प्रचारक गये, वहाँ भारत की भाषा, साहित्य, धर्म और संस्कृति का अत्यधिक प्रसार हुआ और वे देश भारतीय संस्कृति के प्रभाव में आ गये।