पूर्व मध्यकालीन स्थापत्य - early medieval architecture

पूर्व मध्यकालीन स्थापत्य - early medieval architecture


647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद भारत के राजनीतिक क्षेत्र में विकेंद्रीकरण का आरंभ हुआ। उत्तर तथा दक्षिण भारत में अनेक शक्तियों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये। 9वीं शताब्दी के अंत तक उत्तर भारत में उल्लेखनीय राजवंश जैसे परवर्ती गुप्त वंश (530 से 820 ई. तक), कन्नौज का मौखरि वंश (475-749 ई.), तथा गुर्जर-प्रतीहार वंश (550-870 ई.) थे। इनमें से अंतिम राजवंश विशेष शक्तिशाली हुआ। गुर्जर-प्रतीहारों के बाद कन्नौज पर गहड़वाल वंश (1050-1200 ई.) का शासन रहा। अंय मुख्य राजवंशों में बंगाल में पाल (765-1175 ई.) और सेनवंश (1058-1230 ई.), दिल्ली - अजमेर में चाहमान वंश (550-1194 ई.), बुन्देलखंड में चंदेल (830-1308 ई.),

ग्वालियर क्षेत्र में कच्छपघात (950-1150 ई), त्रिपुर में कलचुरि (875-1195 ई.), मालवा में परमार (820-1395 ई.) तथा गुजरात में चालुक्य (960-1298 ई.) वंश का शासन रहा। इनके समकालीन दक्षिण के राजवंश भी इस दिशा में पीछे नहीं रहे। पूर्व मध्यकाल में दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट, चोल, चालुक्य और पल्लव राजवंशों का शासन था जिनकी कला का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है।


इन राजवंशों के शासन काल में देश में वास्तु तथा स्थापत्य कला का व्यापक तथा बहुमुखी विकास एवं विस्तार हुआ। वास्तु पर अनेक ग्रंथों की रचना इस काल में हुई, जिन पर धार्मिक एवं धर्म निरपेक्ष कला के विभिन्न रूप आधारित थे।


मंदिर स्थापत्य का शैली वर्गीकरण


राजपूत-युग की स्थापत्य कला की अभिव्यक्ति विशाल भव्य मंदिरों के निर्माण में हुई। इस युग की शिल्पकला के प्रमुख स्मारक मंदिर हैं, जिनके निर्माण से राजपूत नरेश खुले हाथ से दान देते थे। यद्यपि विदेशी आक्रमणकारी विध्वंसकों द्वारा अनेकानेक मंदिर नष्ट-भ्रष्ट कर दिये गये, परंतु आज भी कला के अनुपम स्मारक के रूप में अनेक मंदिर बच गये हैं। पूर्व मध्यकाल में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में निर्मित मंदिरों में थोड़ी-थोड़ी भिन्नता आ गयी थी और इसी कारण वहाँ की क्षेत्रीय शैली की कुछ विशेषतायें निर्मित हो गई। पूर्व मध्यकाल में मंदिर स्थापत्य की विभिन्न शैलियाँ प्रकाश में आयीं जिनका वर्गीकरण, विभिन्न राजवंशों के अनुसार निम्नलिखित है-

मंदिर-स्थापत्य की उक्त सूची को देखने से ज्ञात होता है कि पूर्व मध्यकाल में विभिन्न क्षेत्रों में मंदिर निर्माण की प्रवृत्तियों बहुत बढ़ी।

वास्तु तथा मूर्तिकला की वृद्धि में न केवल विभिन्न राजवंशों ने योग दिया अपितु अनेक धार्मिक संप्रदायों ने अपने-अपने संप्रदायों के विकास में इन दोनों ललितकलाओं का प्रचुर रूप में उपयोग किया।


पूर्व मध्यकाल में भारतीय मंदिरों का महत्व बहुत बढ़ गया। वे धार्मिक सामाजिक तथा शैक्षिक विकास के केंद्र बने। इस विचार धारा को मंदिरों के माध्यम से व्यावहारिक रूप प्रदान किया गया कि राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति हेतु देवालय सर्वाधिक उपयुक्त हैं। मंदिरों का महत्व बढ़ जाने से उनके रूपविन्यास में वृद्धि हुई। मंदिरों के आकार-प्रकार में वृद्धि हुई। उनके 'पंचायतन तथा सांधार रूप विकसित हुए। खजुराहो का लक्ष्मण मंदिर पंचायतन का सुंदर उदाहरण है मंदिरों में विद्यालय, संगीत तथा नाट्यशाला स्थापित हुई। उनके साथ उद्यान तथा छोटी-बड़ी पुष्करणियाँ बनने लगीं।


जो बात इस काल में उत्तर भारत के संबंधमें लागू होती है, वही दक्षिण के संबंधमें भी कही जा सकती है। विवेच्य काल में दक्षिण भारत में जिन मुख्य राजवंशों का शासन था, वे इस प्रकार हैं-


काँची का पल्लव वंश 6वीं सदी के उत्तरार्ध से 9वीं शती के अंत तक शक्तिशाली रहा। दक्षिणापथ में वातापी के चालुक्य वंश की सत्ता छठीं शती के आरंभ से लेकर 8वीं शती के मध्य तक रही चालुक्यों की दूसरी शाखा गुजरात की थी, जिसका शासन 10वीं सदी के अंत से 13वीं सदी के अंत तक रहा। मान्यखेट का राष्ट्रकूट वंश (650-982 ई.) चौथी बड़ी शक्ति के रूप में था। दक्षिण भारत की पाँचवीं शक्ति चोलवंश की थी जिसने 9वीं सदी के मध्य से लेकर 13वीं सदी के मध्य तक दक्षिण भारत की प्रमुख सत्ता के रूप में शासन किया।


मुदरा में पाण्डुवंश का शासन 7वीं सदी के आरंभ से 10वीं सदी के प्रथम चतुर्थांश तक कायम रहा। इनके अतिरिक्त उत्तरी कोंकण में कदम्ब (985-1300 ई.) द्वार-समुद्र में होयसल वंश (1010-1345 ई.) तथा दक्षिण कोंकण में शिलाहारों (775-1215 ई.) का प्रभुत्व रहा। देवगिरि में यादव, तलकाड तथा कोलार में गंग तथा केरल क्षेत्र में चेर प्रभावशाली थे। तेलंगाना क्षेत्र में काकतीय वंश (1043-1316 ई.) और वनवासी तथा गोवा में कदम्ब वंश का शासन था।


उक्त तथा अंय कई छोटे राजवंशों के समय में ललित कलाओं को बड़ा प्रोत्साहन मिला। मंदिर स्थापत्य की जिन मुख्य शैलियों का विकास इस काल में हुआ उनका विवरण इस प्रकार है -


(क) उत्तरी द्रविड़ देश शैलियाँ (550 से 10वीं सदी के मध्य भाग तक)


1. कर्णाट शैली (550 से 750 ई.)- बादामी के चालुक्या


2. आरंभिक आंध्र-कर्णाट शैली (7वीं सदी के आरंभ से 10वीं सदी तक) - वेंगी के पूर्वी चालुक्य।


1. कुन्तल शैली (650 से 900 ई.)- मान्यखेट के राष्ट्रकूटा


2. गंगवाड़ी शैली (9वीं 10वीं सदी) तलकाड, कोलार तथा नंदी के गंगवंशा


3. नोलम्बवाड़ी शैली (ई. 9वीं सदी)- हेमावती के नोलम्बा


(ख) दक्षिणी द्रविड़ देश शैलियाँ (650 से 950 ई.)


1. पल्लव शैली (650 से 10वीं सदी) कांची के प्रारंभिक तथा परवर्ती पल्लव वंशा 


2. पाण्ड्य शैली (8वीं सदी के मध्य से 10 वीं सदी के आरंभ तक) - मदुरा के प्रारंभिक पाण्ड्य । 


3. आरंभिक चोड़मण्डल शैली (8वीं के मध्य से 10वीं सदी के अंत तक ) तंजौर के प्रारंभिक चोड़, मुत्तरैया तथा कुवेला


4. परवर्ती चोड़मण्डल शैली (अंतिम 10वीं से 13वीं सदी के अंत तक ) तंजौर का चोड़वंश।


(ग) उत्तरी द्रविड़ देश की परवर्ती शैलियाँ (10वीं सदी से 14वीं सदी तक)


1. रेनानाडु शैली ( 9वीं से 11वीं सदी) - तेलगू क्षेत्र के चोल तथा वैडुम्ब


2. उत्तरी कर्णाट शैली (973 से 1189 ई.) कल्याण के पश्चिमी चालुक्या 


3. दक्षिण कर्णाट शैली (1100 से 1291 ई.) द्वार समुद्र के होयसला


4. तैलंग शैली (1043 से 1326 ई.)- काकतीया


5. पश्चिमी कर्णाट शैली (10वीं से 12वीं सदी) वनवासी तथा गोवा के कदम्ब


6. केरल शैली (10वीं से 13वीं सदी) केरल के शासका


उत्तर तथा दक्षिण भारत के मंदिर स्थापत्य की जिन विभिन्न शैलियों की तालिका ऊपर दी गयी है उनका विकास मुख्य रूप से अपने-अपने क्षेत्र में होता रहा। वास्तु की इन शैलियों में कतिपय स्थानीय विशेषताओं का जुड़ना स्वाभाविक था, किंतु इन विशेषताओं के होते हुए मंदिर स्थापत्य के मूल तत्व मध्यकालीन भारत में प्रायः समान मिलते हैं।

यह वह युग था जब कि पौराणिक धर्म का व्यापक उन्मेष हुआ। विष्णु, सूर्य, शिव, शक्ति तथा गणेश की पंचदेवोपासना इस काल में अत्यधिक विकसित हो चुकी थी। इन मुख्य देवों के अतिरिक्त अंय अनेक पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा का विकास इस काल में हुआ। ये पौराणिक धर्म प्राचीन वैदिक धर्म की विभिन्न शाखाओं के रूप में थे। पूर्व मध्यकालीन कला में तांत्रिक प्रभाव का उन्मेष मिलता है, जो इस युग की एक विशेषता है। जैन धर्म का इस काल में प्रायः समस्त भारत में प्रसार हुआ। दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदाय के जो मंदिर मध्यकाल में निर्मित हुए उनकी संख्या बहुत बड़ी है। ये मंदिर विशेषतः गुजरात राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में बने, गुप्तकाल के कला केंद्रों की अपेक्षा अब अधिक स्थानों पर कला के उक्त दोनों अंगों का विकास हुआ।


मंदिर स्थापत्य की उक्त शैलियों में से केवल मुख्य शैलियों का ही संक्षिप्त विवरण यहाँ दिया जा रहा है। इन प्रमुख शैलियों के अनेक तत्व अंय शैलियों के मंदिरों में भी मिलते हैं। प्रायः उत्तर भारत की नागर शैली तथा दक्षिण की द्राविड़ शैली के मंदिरों का आधिक्य मिलता है। इन दोनों शैलियों की मिश्रित 'बेसर शैली के भी उदाहरण अनेक मंदिरों में उपलब्ध हैं, विशेषतः कर्नाटक में।


पूर्व मध्यकाल में मंदिर-स्थापत्य के कतिपय लक्षणों का विकास हुआ, जो उत्तर तथा दक्षिण भारत में, थोड़े-बहुत विभेदों के साथ द्रष्टव्य हैं। मंदिर की उपमा भारतीय वास्तु शास्त्र में मानव शरीर से दी गयी। मध्यकाल में पंचायतन तथा सांधार प्रासादों का निर्माण बड़े रूप में संपन्न हुआ। भूमितल से लेकर ऊपर के शिखर तक मंदिर के जिन मुख्य अंगों के वर्णन शास्त्रों में मिलते हैं वे क्रमश: इस प्रकार हैं- 


(1) अधिष्ठान या चैकी इस पर सज्जापट्टी अलंकरण रूप में रहती थी। उसे 'वसंत पट्टिका' कहा जाता था। 


(2) वेदिबंध - यह अधिष्ठान के ठीक ऊपर का गोल या चैकोर अंग है। यह प्राचीन यज्ञ वेदियों से उद्भूत हुआ। 


(3) अंतर पत्र - वेदिवध के ऊपर की कल्पवल्ली या पत्रावली पट्टिका ।


(4) जंघा मंदिर का मध्यवर्ती धारण-स्थला


(5) वरंडिका मंदिर का ऊपरी बरामदा ।


(6) शुकनासिका - मंदिर के ऊपर का वहिनिसृत भाग। उसका आकार तोते की नाक की तरह होने के कारण उसका यह नाम पड़ा।


(7) कंठ या ग्रीवा - शिखर के ठीक नीचे का भाग।


(8) शिखर शीर्ष स्थल । शिखर पर खरबुजिया आमलक होता था। धीरे-धीरे गोल आमलक ने लंबोतरा रूप ग्रहण किया और अंत में उसी का शिखर रूप बना।


मंदिर वस्तु के ये अष्टांग देशव्यापी बन गये। मंदिर के द्वारमुख या प्रवेश द्वार को गंगा-यमुना, घटपल्लव, हंस, कीर्तिमुख आदि अलंकरणों से सजाया जाता था। संपूर्ण द्वार को कई शाखाओं में विभक्त करने की परंपरा मध्यकालीन स्थापत्य में रूढ़ हो गयी। तत्कालीन साहित्य में पंच तथा सप्तशाखाद्वार के उल्लेख मिलते हैं। ऐसे द्वार सात उत्तरंग वाले होते थे। उनके नाम नागशाखा, रूपशाखा, व्यालशाखा,

मिथुनशाखा आदि मिलते हैं। इन विभिन्न शाखाओं पर कलाकारों ने मुख्य देवप्रतिमा के अतिरिक्त सप्तमातृका, नवग्रह, नर-नारी, यक्ष, गन्धर्व, सुपर्ण, किन्नर, नाग आदि के रोचक आलेखन किये। अलंकरणों के रूप में वृक्षों, लताओं तथा पशु-पक्षियों की सज्जापट्टियाँ विकसित हुईं। पूर्णघट, कीर्तिमुख, शतदल कमल आदि विविध अलंकरण मंदिरद्वारों पर मिलते हैं। मंदिरों के अंय भागों को भी विविध अलंकरणों से मंडित करने की परंपरा चल पड़ी। ये अलंकरण धार्मिक तथा लौकिक दोनों थे। नदी देवता गंगा-यमुना को पावनता के प्रतीक रूप में देवालयों आदि के द्वारों पर अंकित किया जाता था । प्रतीकों की जो दीर्घ परंपरा भारतीय धर्मों में मिलती हैं उसको कलाकारों ने वास्तुकला में मूर्तरूप देकर अमर बनाया। ऐहिक और पारलौकिक कितनी ही मनोरम कल्पनाएँ मंदिरों में साकार हुई।