पूर्व मध्यकालीन चित्रकला - early medieval painting
पूर्व मध्यकालीन चित्रकला - early medieval painting
6वीं और 7वीं शताब्दी में अजंता की चित्रकला अपनी चरम परिणति पर पहुँची हुई थी, किंतु इसके पश्चात् यह कला अचानक समाप्त हो गयी तथा इसका जीवित रहने का भी आगे कोई लक्षण नहीं मिलता।
सामान्य रूप से कोई कला कभी समाप्त नहीं होती। यह बात अजंता की कला के साथ सिद्ध होता है। इसका कारण यह हुआ कि बौद्ध भिक्षुओं में विलासिता आ जाने के कारण जनता को इस धर्म में अश्रद्धा हो गई तथा ब्राह्मण धर्म फिर से पनपने लगा। जब बौद्ध चित्रकारों के प्रश्रयदाता समाप्त हो गये तो ये लोग लंका, चीन, जापान, अफगानिस्तान, तिब्बत तथा मध्य एशिया में चले गये क्योंकि वहाँ बौद्ध धर्म के अनुयायियों की कमी नहीं थी।
वहाँ जाकर इन कलाकारों ने वहाँ की परिस्थितियों के अनुकूल चित्र रचनायें कीं। अजंता के कुछ कलाकार बौद्ध नहीं थे उन्होंने ब्राह्मण धर्म से प्रेरित होकर कला का भव्य सृजन किया जो एलोरा गुफाओं में देखने को मिलता है।
इसी समय मूर्ति, शिल्प तथा वास्तु कला की बहुत उन्नति हुई और बहुत से भव्य मंदिर तथा मूर्तियाँ आदि बने जो कि ब्राह्मण धर्म से संबंधित थे। यवन आक्रमणकारियों ने इनमें से अधिकांश को नष्ट कर डाला। इस बात का इतिहास साक्षी है। उन्होंने भित्ति चित्र या चित्रपट जहाँ भी देखे नष्ट कर डाले। उससे बहुत सी अमूल्य कला सामग्री नष्ट हो गई, कुछ अवशेष ही मिलते हैं।
सर्व विदित है कि पूर्व मध्य काल के प्रारंभ में ही एलोरा, एलीफेंटा बाघ तथा बादामी गुफाओं का निर्माण हो चुका था।
इस समय में कुछ चित्रकारी संबंधीमहत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई जिनमें विष्णु धर्मोत्तर पुराण" मुख्य है। इस ग्रंथ के चित्र सूत्र में शारीरिक लक्षण, रंग अंकन विधान तथा तात्विक सिद्धांतों का कई अध्यायों में बड़ा विशद विवेचन हुआ है। इसी में लिखा है कि- कलानां प्रवरं चित्र धर्मकामार्थ मोक्षदम्।
मांगल्यं प्रथमं ह्येतदा गृहे यत्र प्रतिष्ठितम्॥
जिसका अर्थ है कि सब कलाओं में चित्रकला उत्तम है तथा चित्रकला की साधना से धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा घरों में चित्र रचना मंगलकारी है।
भवभूति कृत 'उत्तम राम चरित' की रचना भी इसी समय हुई थी। इसमें भी चित्रकला प्रसंग बहुत सुंदर है। बाणभट्ट का 'हर्ष चरित', 'कादम्बरी तथा दण्डी का 'दश कुमार चरित' भी इसी समय रचे गये जिनमें चित्रकला की महत्त्व वर्णित है।
चोल कला
दक्षिण में चोल साम्राज्य का उदय नवीं शताब्दी के अंत में हुआ। कला विशेषतया वास्तुकला, तक्षण कला एवं चित्रकला के क्षेत्र में चोल सम्राटों की 10वीं और 11वीं सदी में अनुपम देन है। तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर चोल सम्राट राज राज प्रथम ने 1000 ई. में बनवाया।
विद्वानों ने वास्तु और लक्षण कला की दृष्टि से तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर का विस्तृत विवरण दिया है, किंतु मंदिर में निहित कला का सूक्ष्म अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय चित्रकला के कुछ विशिष्ट उदाहरण भी प्राप्त हैं, जो अजंता व बाघ के पश्चात् दक्षिण में भारतीय संस्कृति में कला की एकरूपता को बनाये रखने के उद्देश्य से संभवत: चोल सम्राटों के प्रयत्न कहे जा सकते हैं। बृहदीश्वर का प्रांगण 500 ग 250 फीट है और इसके पहले 250 फीट का एक प्रांगण बाहर की ओर भी है। दोनों प्रांगणों में जाने के लिये दो गोपुरम (द्वार) बने हैं। इसका आकर्षण केंद्र 190 फीट ऊँचा विमान है। एक ओर मंदिर विजयालय चोलेश्वर का है। इनमें चित्रकला के अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं।
बृहदीश्वर मंदिर में एक चित्र बड़ा आकर्षक है, जिसमें भगवान शंकर बैठे हुए दो अप्सराओं का नृत्य देख रहे हैं।
विष्णु भगवान भी चित्र में हैं तथा अंय गन्धर्व गण संगीत के विभिन्न वाद्यों को बजा रहे हैं। नृत्य करती हुई आकृतियों की मुद्रा लयपूर्ण तथा गतिमान है। एक घुड़सवार का भी सुंदर चित्र इसमें है। एक नटराज की विशाल आकृति का भी चित्रण है। राज-राज भी अपनी पत्नियों तथा अंय सेवकों सहित चित्रित है। इस मंदिर के अधिकांश चित्र। 7वीं शताब्दी में नायकों के राज्य में नष्ट कर दिये गये।
डॉ. शिवराममूर्ति के अनुसार चोल कला का सर्वोत्कृष्ट चित्र भगवान शंकर का असुरों को पराजित करने जाना है। असुरों के साथ उनकी भयभीत स्त्रियों के चेहरों पर करुणा और भय का भाव बड़ी कुशलता से चित्रित किया गया है।
भगवान शंकर के आठ हाथ बनाये हैं, जिनमें शस्त्रास्त्र हैं। उनके रथ सारथी के रूप में ब्रह्मा बैठे हैं। साथ ही गणेश चूहे पर, कार्तिकेय मोर पर और काली शेर पर आरूढ़ हैं। इसमें कई भाव एक साथ व्यक्त किये गये हैं, इसी से वह सर्वश्रेष्ठ चित्र माना गया है। सारे चित्र शैव मत के हैं।
पाल शैली
तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने लिखा है कि 9वीं शताब्दी में पूर्वी भारत में एक नयी शैली ने जन्म लिया जिसका केंद्र बंगाल था।
धर्मपाल तथा देवपाल नामक राजाओं के संरक्षण में चित्र बने तथा उस शैली का प्रमुख चित्रकार धीमान तथा उसका पुत्र वितपाल था। पश्चिम भारत की शैली का प्रभाव कम होने लगा और इस नव-निर्मित पाल शैली ने उसका स्थान ले लिया। नवीं शताब्दी में जो नई शैली सामने आई उसका संबंध पाल राजाओं से था। इसी कारण इस शैली का नाम पाल शैली पड़ा।
इस शैली में दृष्टान्त चित्र ही अधिकतर निर्मित हुये। इनका आधार महायान बौद्ध ग्रंथ प्रज्ञापारमिता आदि हैं। ये सब ताड़पत्र पर बने हैं। ये चित्र जातक कथाओं पर आधारित हैं।
ये चित्र अधिकतर बंगाल, बिहार और नेपाल में बने। ये चित्र ताड़ पत्रों पर बनाये गये हैं। इन चित्रों की चौड़ाई तो 2.5 से 30 तक है, किंतु लंबाई 21 है और कहीं-कहीं 36 तक है। इन ताड़ पत्रों के बीच में चित्र बने हैं तथा दोनों ओर 5 और 6 रेखाओं में लिपि है। इन चित्रित पाण्डुलिपियों में किसी चित्रकार का नाम नहीं मिलता है। ताड़ पत्रों पर दोनों छोरों पर छेद करके उसी आकार की काष्ट दफ्तियाँ लेकर, धागे पिरोकर इन चित्रित ताड़ पत्रों को बाँधकर पुस्तक रूप दिया जाता था। काष्ठ दफ्तियों पर भी बाहर और अन्दर चित्र बनाये गये हैं। ऊपर के चित्र तो लगभग सभी मिट गये हैं जिसका कारण यह है कि धार्मिक ग्रंथ होने के कारण पूजा-अर्चना के लिये उन पर चन्दन तथा रोली लगाई गई थी जिससे ये चित्र ढंक गये हैं या खराब हो गये हैं।
कुछ चित्रित पाण्डुलिपियाँ नालंदा महाविहार और विक्रम शिला देवविहार में रची गयीं। भगवान बुद्ध का ही जीवन चित्रण आदि इन पाण्डुलिपियों में मिलता है। कलाकार बड़ी श्रद्धा से इन चित्रों को बनाते थे तथा आर्थिक सहायता देने वाले श्रद्धालु अपने कल्याण की भावना से इन पाण्डुलिपियों को बनवाते थे।
पहले ताड़ पत्रों को लिपि बद्ध किया जाता था तथा चित्रों के लिए उनमें कुछ स्थान छोड़ दिया जाता था। बाद में चित्रकारों के पास ये पाण्डुलिपियाँ भेजी जाती थीं, जो कि इनमें बड़ी कुशलता से चित्र बनाते थे, किंतु कहीं भी चित्रकारों ने अपना नाम नहीं लिखा है, यह इस शैली की विशेषता है जो अजंता से मिलती है, क्योंकि वहाँ के महान चित्रकारों ने भी अपने नाम नहीं लिखे हैं।
दक्षिण शैली
दक्षिण शैली का समय 10वीं से 15वीं शताब्दी तक माना जाता है, यद्यपि 17वीं शताब्दी तक इस शैली के चित्र बने। उत्तर भारत में इसी समय में चित्रकला का पतन प्रारंभ होता है, किंतु दक्षिण में कला पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। यह शैली अपना अस्तित्व बनाये रही। यह भी हो सकता है कि उत्तर भारत के कलाकार इस युग में दक्षिण पहुँचे हों और उन्होंने वहाँ कला की रचना की हो। परंतु दक्षिण शैली का विकास स्वतंत्र रूप से ही हुआ। इस शैली में अजंता की 9वीं व 10वीं गुफा से लेकर राजपूत एवं मुगल कला तक में दक्षिण शैली का प्रभाव मालूम होता है।
दक्षिण शैली की तीन प्रमुख पद्धतियाँ देखने को मिलती हैं जिनको (1) द्रविड़ (2) बेसर व (3) नागर कहा जाता है। पहली पद्धति दक्षिण में जन्मी तथा वहीं विकास हुआ।
नागर पद्धति जिसे 'आर्यावर्त्त शैली भी कहा जाता है, उत्तर से निर्मित होकर दक्षिण में पहुंची। द्रविड़ पद्धति में मुख्यतया मूर्ति निर्माण ही अधिक हुआ। बेसर पद्धति के विषय में कुछ अधिक सामग्री प्राप्त नहीं हुई है। कुछ हस्तलिखित ग्रंथों में यह ज्ञात होता है कि वहाँ लेखन और चित्रण दोनों को महत्व दिया जाता था।
दक्षिण शैली में निर्मित बृहदीश्वर मंदिर तंजौर के भिाि चित्र तथा जिनकांची तिरुपतिकुरम् के वर्धमान मंदिर के चित्रों में अजंता शैली का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
दक्षिण शैली की बाह्य सज्जा तो स्थायी प्रभाव की है
परंतु उसकी भावाभिव्यंजना भारतीय है। 16वीं सदी की दो हस्तलिखित पोथियाँ प्राप्त हुई हैं जिनमें एक तो अहमदनगर में बनी तथा दूसरी अली आदिलशाह के काल में बनी जिसका नाम "नुजूम अल उलूस" है। इन दोनों पुस्तकों में भारतीय तथा ईरानी छाप है। आदिलशाह कला का प्रेमी था इसलिये उसने फारस तथा ईरान से कलाकार बुलाये थे। गुफाओं के निर्माण में दक्षिण का विशेष योगदान मिलता है।
बाघ, सित्तनवासल, तंजौर के मंदिर पल्लव कालीन तिरुचिरापल्ली की गुफायें, विशाखापट्टनम की गुफायें, पूना - बम्बई के मध्य भाजा, कार्ले व नासिक की बौद्ध कालीन गुफायें आदि सभी में दक्षिण शैली का प्रभाव मिलता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से दक्षिण शैली को दो भागों में विभक्त किया जाता है-
(1) विजय नगर के नरेशों तथा बहमनी के सुल्तानों के समय की कला (इस समय को दक्षिण शैली का उद्भव युग भी कहते हैं)।
(2) बहमनी साम्राज्य के पतन के बाद बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुंडा के राज्यों की कला (15वीं से 17वीं सदी तक कला की उन्नति हुई)।
दक्षिण शैली के चित्र स्फुट तथा दृष्टान्त दोनों प्रकार के हैं। 'रागमाला' चित्रावली का भी निर्माण यहीं हुआ था जो बड़ौदा में सुरक्षित है। इसी प्रकार के चित्र विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। जिनमें हैदराबाद संग्रहालय, गोलकुंडा, सालारजंग (हैदराबाद) आदि विशेष हैं।
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