पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला - early medieval sculpture
पूर्व मध्यकालीन मूर्तिकला - early medieval sculpture
राजपूत युग में मूर्तिकला का भी विकास हुआ। उत्तर प्रदेश, पूर्वी भारत, राजस्थान, मालवा, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं दक्षिण भारत में विभिन्न प्रकार की मूर्तियों का निर्माण हुआ। इनमें कुछ क्षेत्रीय विशेषताएँ थी । यद्यपि इस की अधिकांश प्रतिमाएँ इस्लाम के अनुयायियों ने विध्वंस कर दीं फिर भी जो अभी शेष हैं, वे कला की उत्कृष्टता प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं।
इस युग में पूर्वी भारत में पाल नरेशों में पाल नरेशों के राज्याश्रय में एक विशिष्ट प्रकार की मूर्तिकला विकसित हुई। पाल नरेशों की छत्रछाया में धीमान और वित्तपाल नामक दो श्रेष्ठ व दक्ष कलाकार समृद्ध हुए। वे अपनी कुशल मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध थे।
मध्य प्रदेश में मन्दसौर जिले के क्षेत्र में सींगलाजगढ़ में और खजुराहो में भी विशिष्ट मूर्तिकला शैली विकसित हुई। इस युग की मूर्तिकला की विशेषताएँ अधोलिखित हैं-
(1) स्वतंत्र खड़ी प्रस्तर प्रतिमाएँ
अनेक मंदिरों की बाहरी दीवारों और सभामण्डलों में अलंकरण के लिए खड़ी प्रस्तर प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की जाती थीं। कभी-कभी बौद्ध धर्म के चैत्यों और विहारों में बौद्ध मूर्तियों तथा हिंदू धर्म के मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ स्वतंत्र खड़े आकार में प्रतिष्ठित की जाती थीं और वहाँ उनकी पूजा और उपासना होती थी।
(2) धार्मिक मूर्तियाँ और सामान्य जीवन की मूर्तियाँ
इस युग में दो प्रकार की मूर्तियाँ होती थीं, प्रथम धार्मिक प्रतिमाएँ और द्वितीय मानव जीवन से संबंधरखने वाली प्रतिमाएँ। दोनों प्रकार की प्रतिमाओं में स्त्री और पुरुष की मानवाकृति होती थी बौद्ध व जैन धर्म और हिंदू धर्म तथा उसके विभिन्न संप्रदाय-वैष्णव, शैव, शाक्त आदि का अधिकतम विकास होने के कारण इन धर्मों में बहुदेववाद प्रचलित हो गया और अनेकानेक देवी-देवताओं की कल्पना हो गयी। इन में उपासना, पूजन और अर्चना के लिए इनकी विविध मूर्तियाँ निर्मित की गयीं। इन मूर्तियों का रुप और आकार धार्मिक संप्रदायों द्वारा निर्धारित कर दिया गया था। इसलिए विभिन्न धार्मिक मूर्तियाँ सभी क्षेत्रों में लगभग एक सी उपलब्ध होती हैं।
इन मूर्तियों में शिल्प की रचनात्मक प्रतिभा अभिव्यक्त न हो सकी। ऐसी मूर्तियों में विष्णु, लक्ष्मी, शिव, पार्वती, सूर्य, दिक्पाल, यक्ष, गन्धर्व, बुद्ध, जैन तीर्थंकर, गंगा यमुना आदि की प्रतिमाएँ हैं। इस युग की मूर्तियों में ऐलीफेण्टा द्वीप में भव्य और प्रभावोत्पादक शिव की भीमकाय मूर्ति और शिव-पार्वती का दृश्य प्रख्यात हैं। त्रिमूर्ति के मुखमण्डल पर अलौकिक प्रशान्त गंभीरता है। दूसरी मूर्ति में शिव की समाधि की अवस्था है और तीसरी मूर्ति में पार्वती के आत्मसमर्पण का भाव सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है। दूसरे प्रकार की मूर्तियाँ जन जीवन से संबंधित थीं। इनमें स्त्री और पुरुष दोनों की प्रतिमाएँ हैं। इन मूर्तियों में कलात्मक सौंदर्य और शिल्प की अभिरुचि व प्रवृत्ति, उसकी कला-कुशलता एवं प्रतिभा अभिव्यक्त हुई।
इन मूर्तियों में पारस्परिक और दैनिक जीवन के दृश्य, जैसे सोकर उठी हुई रमणी की अँगड़ाई, शिशु को दुलारती खिलाती व दूध पिलाती स्त्री, सौंदर्य के भार से अँगड़ाई लेती हुई, ढोलक, मृदंग, मंजीरे व बंशी बजाती हुई नृत्य करती हुई, दर्पण में अपना सौंदर्य देखती हुई, वस्त्र परिधान करती हुई, मेंहदी और अंजन लगाती हुई, बाल संवारती हुई, पैर से काँटा निकालती हुई, फलों को ले जाती हुई तथा विविध क्रीड़ाओं की भंगिमाओं में रत स्त्रियाँ, पूजा करती हुई स्त्री, प्रेम-पत्र लिखती त्री, विभिन्न कामुक भावों और मैथुन मुद्राओं में रत दृश्य, योद्धाओं, पशुओं और शालभंजिका के दृश्य, पत्थर ले जाते हुए श्रमिक के दृश्य, भूख से पीड़ित अस्थि-पंजर वाले मनुष्य का दृश्य आखेट में मग्न स्त्री-पुरुषों के दृश्य आदि हैं। इन मूर्तियों के सुंदर शरीर, हाव-भाव की मुद्राएँ और चेष्टाएँ, अवयवों के मोड़ और घुमाव, अंगो की लचक, उभार, बाँकापन और कोमलता आदि विलक्षण हैं।
मंदिरों की बाहरी व भीतरी दीवारों पर अनेकानेक मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयीं। मूर्तियों के किनारों को सजाने के लिए पाषाण में सुंदर कलापूर्ण पुष्पावली भी उत्कीर्ण की गयी।
(3) घटनाओं के विशाल दृश्यों का सफल अंकन
गुप्त युग में घटनाएँ संकुचित रूप में छोटे-छोटे पाषाण फलकों पर उत्कीर्ण की गयी थीं, परंतु इस युग में दृश्यों के अंकन के हेतु लगभग 30 या 31 मीटर ऊँची विशाल चट्टानें तक चुनी गयीं। इनमें कथानकों के दृश्य, ऐतिहासिक या अर्द्ध ऐतिहासिक दृश्य, पौराणिक दृश्य आदि उत्कीर्ण किये गये। दुर्गा- महिषासुर युद्ध रावण द्वारा शिव का कैलाश उठाने का विशाल दृश्य, शिव-पार्वती का विवाह दृश्य, नरसिंह अवतार का कथानक, गंगावतरण का दृश्य आदि पाषाण में अत्यंत कलाकुशलता और सजीवता से उत्कीर्ण किये गये।
(4) श्रृंगार की प्रधानता
इस युग की मूर्तिकला में श्रंगार की प्रधानता है। कोणार्क तथा जगन्नाथपुरी के मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण प्रतिमाओं का संबंध राधा-कृष्ण की प्रेम-क्रीड़ा से है। इन्हीं मूर्तियों में नायिका भेद और नामकन्या की बड़ी सुभग मूर्तियाँ बनायी गयी हैं। इनके भोले मुखमण्डल पर से आँख हटाये नहीं हटती पत्र लिखती हुई स्त्री की एक मूर्ति अत्यंत भावभंगिमामय एवं आकर्षक है। अंय स्थानों के मंदिरों में दीवारों पर दर्पण से अपना मुख और लावण्य निहारती हुई युवती की, नेत्रों में अंजन लगाती हुई रमणी की, अपने वस्त्र पहनती हुई स्त्री की तथा सुंदर बाल सँवारती हुई महिला की मूर्तियाँ अत्यंत ही सुकोमल, हाव- भाव पूर्ण एवं लालित्यमय हैं। उनमें उभार और लचक की बाहुल्यता है। अनेक मूर्तियों में माता की ममता को अनूठे ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
माता अपने स्नेह से ओतप्रोत हृदय को निकाल कर रख रही है। भुवनेश्वर, पुरी और खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर अनेक मुद्राओं में मिथुन मूर्तियाँ भी अंकित की गयी हैं। इसलिए ये अश्लील मूर्तियाँ कही जाती हैं। संभव है यह शाक्त और वज्रयान तंत्रवाद का प्रभाव हो।
(5) सजीवता, नवीनता और मौलिकता का अभाव
इस युग की मूर्तियों में सजीवता, नवीनता और मौलिकता नहीं है। मूर्तियों के लक्षणों और लांछनों को नियमबद्ध कर दिया गया था। विभिन्न संप्रदायों और मतों के देवी-देवताओं की मूर्तियों के रुप,
आकार आदि प्राचीन अनुभवों के आधार पर नियमबद्ध कर दिये गये थे। मूर्ति विज्ञान का नया विषय ही निरुपित किया गया था। इसमें विभिन्न मूर्तियों के निर्माण के लिए उनके स्वरूप, भेद, मुखमण्डल, भुजाएँ, आयुध, वाहन आदि निर्दिष्ट कर दिये गये थे। निर्माण और उत्प्रेरण के लिए नियम, माप, नाप आदि निर्धारित कर दिये गये थे। नियमों का नियंत्रण होने से मूर्तिकार को अपनी अभिरुचि, शिल्प कला- कौशल और रचनात्मक प्रतिभा को अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं था। इसलिए इस युग की मूर्तियों में अनुमति की गहनता, शिल्पी की व्यक्तिगत रचनात्मक प्रतिभा, लचीलापन, स्वच्छंदता, सजीवता, नवीनता और मौलिकता नहीं है, किंतु फिर भी मूर्तिकार का कला-चातुर्य, मुख मण्डल की सुंदर आकृति और शरीर के सौष्ठव को उत्कीर्ण करने में चमक उठा है।
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