छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आर्थिक परिस्थिति - Economic situation in 6th century BC
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में आर्थिक परिस्थिति - Economic situation in 6th century BC
छठी शताब्दी ई. पू. में भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का प्रादुर्भाव एवं प्रसार हुआ था। बौद्ध और जैन साहित्य अत्यंत विशाल है। इन साहित्यों में कहीं कहीं ऐसे निर्देश हैं, जिनसे भारत की आर्थिक दशा पर प्रकाश पड़ता है। पाणिनि के अष्टाध्यायी का भी रचनाकाल छठी या पाँचवी शताब्दी ई.पू. माना जाता है, अतः आर्थिक जीवन की जानकारी के लिए भी इस ग्रंथ का सहारा लिया जाता है।
नगर और ग्राम - बौद्धकालीन भारत अर्थात् छठी शताब्दी ई.पू. में नागरिक जीवन विकसित हो चुका था। बौद्ध ग्रंथ नगर तथा ग्राम संगठन पर प्रकाश डालते हैं, उनसे पता चलता है कि बुद्धकाल में आबादी का अधिकांश भाग गाँव में ही रहता था।
यहाँ मकानों में सम्मिलित परिवार रहते थे, मकानों के अतिरिक्त गाँवों में खेत होते थे, जो कि व्यक्तिगत संपत्ति होते थे। प्रत्येक ग्राम प्रायः आत्मनिर्भर होते थे। सहकारिता और वस्तुविनिमय के आधार पर जीवन-यापन होता था। ग्राम के समीप के वनों, चरागाहों पर सामूहिक स्वत्व होता था। ग्रामीण अर्थनीति भूमि के स्वतंत्र स्वत्व पर आधारित थी। इस युग में बहुसंख्यक किसान ऐसे थे, जो अपने खेतों में स्वयं या कुछ वेतनभोगी कर्मकरों की सहायता से खेती किया करते थे। किसान अपना कर उपज के छठे भाग से बारहवें भाग तक गाँव के मुखिया (ग्राम भोजक) द्वारा राजा को प्रदान करते थे। ग्राम भोजक गाँव के शासन की देखरेख करता था।
बौद्ध ग्रंथों में बहुत कम नगरों का उल्लेख मिलता है। दीघनिकाय में 6 नगरों का उल्लेख मिलता है— चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कौशांबी व वाराणसी। इनके अतिरिक्त बौद्ध साहित्य मिथिला, वैशाली, पाटलिपुत्र, उज्जैन, साकल, पैठान और महिष्मती आदि नगरों का उल्लेख करता है। जैन ग्रंथों में भी अनेक नगरों के नाम आए हैं। बौद्ध और जैन साहित्य में चर्चा किए जाने वाले नगरों के अतिरिक्त भी नगर अवश्य रहे होंगे।
उस समय के नगर प्रायः दुर्गरूप से बनाए जाते थे। दुर्ग में राजप्रसाद, राज्य संबंधी इमारतें बाजार तथा प्रमुख मनुष्यों के निवास स्थान रहते थे। इन नगरों की निर्माण योजना बड़े ढंग से बनाई जाती थी।
मकान बनाने के लिए पत्थर, ईंट और लकड़ी तीनों का प्रयोग होता था। नगरों में बहुधा मकान कई मंजिल ऊँचे होते थे। बड़े मकानों में स्तंभ, वातायन, नालियाँ, कुएँ पाकशाला, स्नानगृह तथा शौचालय आदि की पृथक-पृथक व्यवस्था होती थी। नगरों में लोग समृद्धि, सुख और विलास का जीवन भी बिताते थे।
व्यवसाय
लोगों का मुख्य पेशा खेती करना था, साथ ही विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधे विकसित होने के कारण अनेक व्यवसाय प्रचलित थे। कपड़े का व्यवसाय इस काल में काफी समृद्ध था।
वाराणसी में रेशमी कपड़ों का तथा गंधार में ऊनी कपड़े का व्यवसाय समृद्ध था। स्त्री और पुरुष दोनों आभूषण प्रेमी थे, अतः आभूषण व्यवसाय भी उन्नत था। काष्ठकार गाड़ी, रथ आदि बनाते थे। वास्तुकला भी उन्नत दशा में थी। बढ़ई, कर्मार, दस्तकार, जौहरी, नलकार, रंगरेज, कसाई, मछुए, माली, नाई आदि अनेक प्रकार के पेशा करने वाले लोग थे। बौद्ध साहित्य इन व्यवसायों का भी वर्णन करता है जैसे वैद्य, ज्योतिषी, नट, नापित, रजक, शिकारी, बूचड़, नाविक, गायक, लेखक, पुरोहित आदि।
इस काल के व्यवसायी लोग श्रेणियों' में संगठित थे इस बात के अनेक प्रमाण बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। प्रत्येक श्रेणी के अपने नियम थे, जिन्हें राज्य भी मानता था। उरग जातक के अनुसार 'श्रेणी' के मुखिया को 'प्रमुख' कहते थे।
अन्य साहित्यों में श्रेणी के मुखिया के लिए जेट्टक' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। बौद्ध साहित्य में श्रेणियों के स्वरूप पर विस्तार से कुछ नहीं लिखा गया है, परंतु उसमें की गई चर्चा के आधार पर इनकी सत्ता के संबंध में कोई संदेह नहीं किया जा सकता है। कच्चे माल की खरीद तैयार माल की बिक्री, काम के घंटे और मजदूरी निश्चित करना, मिलावट रोकना, आदि सभी काम ये श्रेणियाँ करती थीं। ये श्रेणियाँ उस काल के समाज संगठन की आधारशिला थीं।
व्यापार
छठी शताब्दी ई.पू. के व्यापार के संबंध में जातक ग्रंथों से एवं अन्य बौद्ध साहित्यों से उल्लेख उपलब्ध होते हैं। इस काल में देश के प्रमुख व्यापारिक केंद्र मार्गों द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे।
भारत का आंतरिक और बाह्य दोनों ही व्यापार उन्नत दशा में था, अतः जल तथा स्थल दोनों ही मार्गों को व्यापार के लिए प्रयोग में लाया जाता था। व्यापार करने वाले वणिक् विविध प्रकार के पदार्थों को लेकर देश-विदेश में क्रय-विक्रय किया करते थे। विलास की वस्तुओं से लाभ अधिक होता था, अतः उन वस्तुओं का व्यापार अधिक होता था। उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में व्यापार के कई प्रमुख मार्ग थे। एक मार्ग श्रावस्ती से प्रतिष्ठान ( आधुनिक हैदराबाद) जाता था, श्रावस्ती से राजगृह के लिए भी एक मार्ग था, तीसरा मार्ग श्रावस्ती से तक्षशिला को जाता था। इन मार्गों के अतिरिक्त भी व्यापार के अन्य महत्वपूर्ण मार्ग भी इस काल में विद्यमान थे। इस काल के व्यापारी सुदूरवर्ती प्रदेशों में भी व्यापार के लिए जाया करते थे। विदेशों से भी व्यापार होता था। व्यापारी बर्मा, लंका आदि को जाया करते थे। इस देशी तथा विदेशी व्यापार के कारण भारतवर्ष के नगरों की समृद्धि दिन प्रति दिन बढ़ रही थी। नगरों में आने वाले माल पर चुंगी वसूले जाने की व्यवस्था भी थी।
अर्थ नीति
ई.पू. छठी शताब्दी का काल अर्थ नीति का काल है। इस समय तक आते-आते वस्तु-विनिमय की पद्धति व्यापार एवं व्यवसाय के लिए अनुपयुक्त हो गई, अतः मुद्रा का प्रचार बढ़ा। बौद्ध साहित्य से मुद्रा पद्धति के संबंध में अनेक उपयोगी बातें ज्ञात होती है। उस समय का मुख्य सिक्का 'कार्षापण होता था। इसके अतिरिक्त निष्क, सुवर्ण और धरण नाम के सिक्कों का भी इस काल में प्रचलन था। यद्यपि मुख्यतया कार्षापण (Karshapan) ताँबे के होते थे, परंतु सोने और चाँदी के भी कार्षापण होते थे। विनिमय की सुगमता के लिए इस काल में अर्द्ध कार्षापण, पादकार्षपण आदि अन्य सिक्के भी होते थे। विविध वस्तुओं की कीमतों के संबंध में भी इस काल के साहित्यों में निर्देश मिलते हैं। पशुओं की कीमतें भी भिन्न-भिन्न होती थीं। उस समय वेतन तथा भृति के दर की चर्चा भी इस काल के साहित्यों में की गई है।
वार्तालाप में शामिल हों