शिक्षा पद्धति - education system
शिक्षा पद्धति - education system
मनुस्मृति के अनुसार उपनयन संस्कार के बाद वेदारंभ संस्कार करके गुरू शिष्य को शिक्षा देना प्रारंभ करते थे। वे पहले नैतिक शिक्षा देते थे, जैसे पवित्र रहना, हवन-संध्योपासना आदि। तदनंतर हवन करने वाला छात्र, हल्के वस्त्र पहनकर आचमन करके और हाथ जोड़कर गुरू के समक्ष बैठता था। अध्ययन आरंभ करने से पूर्व वह गुरू के चरणों में प्रणाम करता था। तदनंतर वह "ओम्" पद का उच्चारण करता था।
प्राचीन समय की शिक्षा-पद्धति में मौखिक शिक्षा का प्रचलन अधिक था।
शिष्यों को गुरू उपदेश देते थे तथा शिष्य उसको स्मरण कर लेते थे। वेदों के अध्ययन में यह विधि विशेष रूप से प्रचलित थी। अतः वेदों को श्रुति भी कहा गया। वेदों का अशुद्ध पाठ करने को बहुत बड़ा दोष माना जाता था। अतः वेदों के विभिन्न पाठों-संहिता-पाठ, पद-पाठ आदि को सस्वर पढ़ने की व्यवस्था की गई थी।
प्राचीन शिक्षा-विधि में परिषदों के आयोजन, प्रश्न-उत्तर और वाद-विवाद का उपयोग महत्वपूर्ण था। किसी विषय का निर्णय करने के लिए विद्वत्परिषद् का आयोजन किया जाता था।
अध्ययन की सामान्य प्रणाली प्रश्न-उत्तर थी। विद्यार्थी गुरू से प्रश्न करते थे और आचार्य उसका उत्तर देते थे। विषयों के स्पष्टीकरण के लिए वाद-विवाद और शास्त्रार्थ किये जाते थे। उपनिषदों में इन विधियों का अधिक उपयोग है।
उत्तरवर्ती काल में गुरुकुलों और विश्वविद्यालयों का विकास हुआ। यहाँ आचार्य शिष्यों को पढ़ाते थे और उसकी समुचित व्याख्या करते थे। विद्यार्थी इनके अर्थों को समुचित प्रकार से समझ लेते थे। जहाँ कोई शंका होती थी, उसको वे गुरू से समझ लेते थे। तदनंतर वे आवृत्ति करके पाठ को कंठस्थ करते थे। उसके बाद उस पर मनन और चिंतन करते थे ।
जैन साहित्य के अनुसार शिक्षण के पाँच अंगों का विकास हुआ था। सबसे पहले पढ़ना, उसके था
बाद पाठ के विषय में किसी प्रकार की शंका होने पर प्रश्न पूछना, पुनः पढ़े विषय पर मनन करना, तदनंतर उस पाठ को स्मरण करना और अंत में उस पाठ पर व्याख्यान देना।
कौटिल्य ने शिक्षा-विधि को आठ पदों में विभक्त किया
(1) शुश्रूषा विद्यार्थी में आचार्य से विद्या प्राप्त करने की इच्छा।
(2) श्रवणम् आचार्य से पाठ को सुनना।
(3) ग्रहणम् सुने हुए पाठ को ग्रहण करना।
(4) धारणम् ग्रहण किए पाठ का स्मरण और चिंतना
(5) ऊपोह पाठ पर आचार्य से प्रश्नोत्तर
(6) ऊपोह उस पाठ पर आचार्य से वाद-विवाद
(7) विज्ञान - पाठ के अर्थों को समुचित रूप से जान लेना। (8) तत्वाभिनिवेश - शिक्षा को प्रयोग में लाना।
मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और बौधायन धर्मसूत्र के अनुसार शिक्षणालयों में अनध्याय (अवकाश) भी होते थे। तीन प्रकार के अनध्यायों (अवकाशों) का वर्णन प्राप्त होता है-
(1) नियमित अवकाश
प्रतिपदा, अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावास्या को अवकाश रखने के निर्देश हैं। विशेष अवसरों और त्यौहारों पर भी अनध्याय होते थे।
(2) आकस्मिक घटनायें उपद्रव, आक्रमण, लूटमार, दुर्घटना, दैवी आपत्ति आदि आकस्मिक घटनाओं के होने पर विद्यालयों में अनध्याय हो जाते थे। याज्ञवल्क्य ने इस प्रकार के 37 अनध्याय गिनाये हैं।
(3) शिष्टानध्याय विशिष्ट जनों के आने पर विद्यालयों में अवकाश कर दिया जाता था। इसको याज्ञवल्क्य ने कहा
प्राचीन कालीन भारत में परीक्षा प्रणाली का प्रचलन नहीं था। विद्यार्थियों को नित्य पाठ को दोहराना पड़ता था। यही दैनिक विधि थी। मिलिंदप हो से ज्ञात होता है कि शिक्षण काल के अंतिम दिन अंतिम पाठ ही सुनाकर विद्यार्थी की शिक्षा का अंत होता था। तत्पश्चात शिक्षण सत्र के अंतिम दिन विद्यार्थी को एक विद्वत सभा के संमुख उपस्थित होना पड़ता था। इस सभा में कई विद्वान आमंत्रित किये। जाते थे एवं वे विद्यार्थियों से विभिन्न प्रश्न पूछते थे और उनके सफल उत्तर देने के पश्चात ही विद्यार्थी को उत्तीर्ण माना जाता था। परीक्षा प्रणाली का प्रचलन पाल शासकों के काल में प्रारंभ हुआ जिसका वर्णन राजशेखर ने काव्य मीमांसा में किया है।
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