सिंधु सभ्यता का पतन - Falling of Indus civilization

 सिंधु सभ्यता का पतन - Falling of Indus civilization


लगभग 2300 ई.पू. में जन्मी सिंधु घाटी की सभ्यता करीब 1750 ई.पू. तक जीवित रही। ई.पू. अठारहवीं सदी के अंत आते आते इस प्रदेश के दो प्रमुख नगर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो का तो बिल्कुल नाश हो चुका था। इस प्रदेश के अन्य केंद्रों ने भी धीरे-धीरे हमेशा के लिए अपने पूर्व अस्तित्व को खो दिया। इस सभ्यता के अंत होने का कारण निश्चित तौर पर अभी भी ज्ञात नहीं हो पाया है।


अनुमान किया जाता है कि इस सभ्यता को विदेशी लोगों ने आक्रमण करके नष्ट कर दिया। विद्वानों द्वारा ये मत दो बातों के आधार पर दिए गए हैं

पहला यह कि मोहनजोदड़ो के ऊपरी स्तर पर लगभग अड़तालीस नर कंकाल अन्वेषण में पाए गए हैं, दूसरा यह कि ऋग्वेद में वर्णित वैदिक देवता इंद्र का उल्लेख, जिसने कई दुर्गों को बर्बाद किया। इस प्रदेश में पाए गए कई नर कंकालों के अध्ययन से पता चलता है कि इन पर तलवार जैसी किसी तेज हथियार से आक्रमण किया गया, परंतु इन आक्रमणकारियों के बारे में किसी भी स्रोत से जानकारी प्राप्त नहीं हो पाई है। कई विद्वानों के मतानुसार आक्रमणकारी आर्य थे। इन विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद में वर्णित इंद्र ने ही अनेक दुर्गों को नष्ट किया। ऋग्वेद में हरियुपिया नामक शहर की चर्चा होने के कारण विद्वानों ने इसे हड़प्पा मान लिया है,

परंतु सिंधु सभ्यता के पतन के संबंध में उपर्युक्त विवेचना तर्क की कसौटी पर सत्य नहीं उतरती। यह अवश्य लगता है कि हड़प्पा संस्कृति के आखिरी चरण में कुछ नए लोग यहाँ जरूर आए, क्योंकि इस क्षेत्र से नए प्रकार के मिट्टी के बर्तन एवं हथियार मिले हैं, परंतु इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि ये लोग आक्रमण करने के उद्देश्य से यहाँ आए थे और उनके आगमन के कारण सभ्यता नष्ट हुई। प्राचीन और मध्यकाल के अन्य शहरों के नष्ट होने की जो भी जानकारी प्राप्त हुई हैं, वे मुख्यतया प्रशासनिक दृष्टि से मुख्य शहरों के संबंध में हैं। व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण शहरों पर सामान्यतया आक्रमण का विशेष असर अधिक दिनों तक नहीं पड़ता। यह आज भी विवाद का विषय बना हुआ है कि सिंधु प्रदेश पर आक्रमण बड़े पैमाने पर हुआ या नहीं।

यदि आक्रमण को सत्य भी मान लिया जाए तो आक्रमणकारी कौन थे? इतिहासकारों के एक मत के अनुसार सिंधु प्रदेश पर आक्रमण करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी, जिसके अनुसार यह भी निष्कर्ष निकलता है कि बाह्य आक्रमण ही इस सभ्यता के पतन का एकमात्र कारण नहीं था।


इतिहासकारों ने इस सभ्यता के पतन के कारणों पर प्रकाश डालते हुए अन्य मत भी दिए हैं। एक अन्य मत के अनुसार इस सभ्यता का विनाश बड़े पैमाने पर आग लगने के कारण हुआ है। इस विचार के तर्क स्वरूप इस सभ्यता के अधिकांश मकानों में लकड़ी के प्रयोग को दिया गया।

किसी कारणवश आग लगने से एक विशाल अग्निकांड के रूप लेने के कारण इस सभ्यता के विनाश की संभावना जताई गई। उपर्युक्त तथ्यों की सार्थकता खुदाई से भी हुई, ईसा पूर्व 1700 ई. में बलूचिस्तान के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर राख पाई गई है। वैसे सिंधु घाटी में इस तरह का कोई प्रमाण नहीं प्राप्त हुआ।


कुछ विद्वानों के मतानुसार इस सभ्यता का पतन बड़े पैमाने पर महामारी जैसे- प्लेग, मलेरिया आदि फैलने के कारण हुआ होगा। इस महामारी के कारण धीरे-धीरे इसका पतन हो गया होगा,

परंतु महामारी वाली बात भी किसी भी तरह प्रमाणित नहीं हो पाती है। सिंधु सभ्यता का सूक्ष्म अध्ययन किया गया। आश्चर्य इस बात पर होता है कि मिस्र में बिना किसी विशेष परिवर्तन के कोई-न-कोई राजा शासन करता रहा। सिंधु प्रदेश के शहरों के विनाश पर प्रकाश डालते हुए एक विचार यह भी आया कि जिन नदियों के किनारे ये नगर बसे हुए थे, उन नदियों ने अपना मार्ग बदल दिया हो, क्योंकि नदियों द्वारा मार्ग बदलने की बात सर्वविदित है।



इसके कारण नदियों के किनारे बसे व्यावसायिक नगर उजड़ गए होंगे।

उदाहरण स्वरूप हड़प्पा रावी नदी के तट पर था, परंतु रावी की दिशा बदल जाने से यह उससे दूर हो गया। अतः यहाँ की कृषि और सामुद्रिक व्यापार नष्ट हो गया। अंततः सभी नगरों के साथ ऐसा घटित हुआ होगा।


एक अन्य मत के अनुसार नदियों में बाढ़ को सिंधु सभ्यता के विनाश का कारण माना है। इस सभ्यता अधिकांश नगर नदियों के किनारे बसे थे। खुदाई ने सिद्ध कर दिया है कि उनमें से कुछ अनेक बार नष्ट हो गए थे और उन पर पुनः नगर बसाए गए।

अंततः वे सभी किसी-न-किसी समय बाढ़ में पूर्णतः नष्ट हो गए। एक अन्य मतानुसार जलवायु परिवर्तन के कारण सैंधव नगरों का विनाश हुआ। जनसंख्या वृद्धि भी एक अन्य कारण बताया गया है।


उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर ऐसा लगता है कि सिंधु सभ्यता के पतन के लिए किसी एक कारण को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अपनी उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचने के बाद सिंधु सभ्यता की सृजनात्मक शक्ति समाप्त होने लगी, नगरों का प्रशासन ढीला हो गया। धीरे-धीरे आर्थिक संकट ने इस सभ्यता को नष्ट किया, यह मत सबसे ज्यादा सत्य के करीब लगता है। किसी एक कारण से नहीं, अपितु उपरोक्त सम्मिलित कारणों से सिंधु सभ्यता का पतन हुआ।