मथुरा की बुद्ध प्रतिमा की विशेषतायें - Features of Buddha statue of Mathura
मथुरा की बुद्ध प्रतिमा की विशेषतायें - Features of Buddha statue of Mathura
इस समय मथुरा में बुद्ध की जिस प्रतिमा का विकास हुआ उसकी कुछ विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं
- (1) डॉ. कुमार स्वामी के मतानुसार इसकी पहली विशेषता सीकरी या रूपवास नामक स्थानों से प्राप्त होने वाले सफेद चित्तियों वाले लाल बलुए पत्थर से इनका बनाया जाना है।
(2) इन मूर्तियों को चारों ओर से कोर कर बनाया गया है। इस प्रकार से ये मूर्तियाँ चतुर्दिक दर्शन वाली हैं। ऐसा न होने पर इनको बहुत अधिक गहराई में कोरा गया है।
(3) इनका सिर मुंडा हुआ होता है।
(4) इनके सिर पर किसी प्रकार के घुँघराले बाल नहीं होते हैं। इनका उष्णीष सर्पिल अथवा क्रमशः ऊपर की ओर उठते हुए चक्र जैसे होता है।
(5) इनमें कोई उर्णा (मस्तक पर बिन्दी) तथा चेहरे पर कोई मूँछ नहीं होती है।
(6) इनका दायाँ हाथ अभय मुद्रा में ऊपर उठा रहता है तथा बाँयें हाथ की मुट्ठी प्रायः बंधी होती है। बैठी हुई मूर्तियों में यह हाथ जांघ पर पड़ा रहता है और खड़ी मूर्तियों में यह हाथ वस्त्रों की सलवटों को संभाले हुए दिखाया जाता है।
(7) कोहनी सदैव शरीर से कुछ दूरी पर होती है।
(8) वक्षःस्थल बहुत उन्नत होता है, किंतु ऐसा होने पर भी यह पूर्ण रूप से पुरुष मूर्ति के रूप में दिखाया जाता है।
(9) वस्त्र प्रायः शरीर से बिल्कुल सटे हुए, चुस्त और भीतर से मांसल शरीर के अंग प्रत्यंग को प्रदर्शित करने वाले होते हैं। कलामर्मज्ञ इस प्रकार को आर्द्र वस्त्र कहते हैं, क्योंकि बारीक वस्त्र भीग जाने पर शरीर के अंगों से सट जाते हैं तथा भीतर के मांसल देह को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के आर्द्र वस्त्रों की विशेषता न केवल बुद्ध की मूर्तियों में अपितु मथुरा की अन्य मूर्तियों में भी दिखाई देती है। वस्त्रों की सलवटों को एक विशेष ढंग में व्यवस्थित किया जाता है।
(10) बुद्ध को कभी भी कमल पर बैठे हुए नहीं दिखाया जाता है, उन्हें सदैव सिंहासन पर बैठे हुए प्रदर्शित किया जाता है, इसमें चैकी के नीचे सिंह बने होते हैं। खड़ी मूर्तियों में प्रायः पैरों के बीच में बैठा हुआ एक सिंह दिखाया जाता है, जिस प्रकार पशुओं में सिंह का स्थान सर्वश्रेष्ठ होता है, उसी प्रकार बुद्ध का स्थान सर्वोपरि है। इसकी प्रतीकात्मक व्यंजना सिंह की मूर्ति से की जाती है।
( 11 ) बुद्ध की प्रतिमा के नाक-नक्श और हावभाव निर्वाण की शांति और माधुर्य के स्थान पर असाधारण शक्ति के भाव को प्रकट करते हैं।
(12) इन मूर्तियों का प्रभामंडल बिलकुल सादा और अनलंकृत होता है अथवा किनारे पर बहुत कम गहराई में अर्धवृत्ताकार आकृतियों से अंकित आधी चूड़ियाँ होती गंधार में इसी समय बनायी जाने वाली बुद्ध की मूर्ति में ये विशेषताएँ बहुत ही कम मात्रा में मिलती हैं।
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