गुप्तकालीन कला की विशेषताएँ - Features of Gupta Art

गुप्तकालीन कला की विशेषताएँ - Features of Gupta Art


गुप्तकालीन कला पर विचार किया जाय तो यह सहज अनुमान किया जा सकता है कि गुप्त-काल में लोग संभवत: छोटी-छोटी बातों में भी सौंदर्य-सृष्टि की ओर सजग थे और वे जीवन की सभी दिशाओं में अपनी भावनाओं कों कलात्मक रूप से सजीव, साकार और मौलिक अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत करने को उत्सुक थे। वे अपने प्रत्येक कार्य को कला के रूप में ही देखने की चेष्टा करते थे। लोगों में प्रत्येक वस्तु को कलागत दृष्टि से देखने के भाव व्याप्त थे और जीवन की यह सुकुमारता (नजाकत) वात्स्यायन की कोरी कल्पना न थी यह पुरातात्विक अवशेषों और साहित्यिक वर्णनों से भली भाँति परिलक्षित होता है। गुप्तयुग की कलाओं की निम्नलिखित विशेषतायें हैं। 


(1) रूढ़िवाद का अभाव


गुप्तयुग की कला में सौंदर्य और प्रतिबंध की विलक्षणता है। इस युग में कलाकार महत्व प्रदर्शन हेतु कलाकृति पर निर्भर नहीं था, परंतु उसने अपना ध्यान लालित्य पर केंद्रीभूत कर लिया था जो अलंकरण और सुशोभन की प्रचुरता में लुप्तप्राय नहीं होता था। उसकी कला का प्रमुख लक्ष्य न सिर्फ रूढ़िवाद के घोर घातक बोझ में छुटकारा पाना था बल्कि स्वच्छंदता और संतुलन था।


 (2) सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य


गुप्तकाल की कला में सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य की एक विशिष्ट भावना थी। इस भावना का प्रस्फुरण करने के लिये कला का अभ्यास और उन्नति की जाती थी।

“सदृण का मार्ग सौंदर्य का मार्ग है”- यह गुप्तकाल की कला की मार्गदर्शक अंतःप्रेरणा प्रतीत होती है। सुंदर कलापूर्ण आकृतियों का भारतीय संस्कृति के अनुरूप सृजन करना और उन्हें सर्वोच्च जीवन की आवश्यकताओं के लिये उपयुक्त करना यही एक स्वर्णिम सामंजस्य और अनुरूपता थी जिससे कि गुप्तकाल की कला निरंतर अक्षय आकर्षण की वस्तु बन गयी।


(3) गहन धार्मिक और आध्यात्मिक आदर्श


गुप्तयुग की ललित कलाओं की मूल प्रेरणा गहन धार्मिक और आध्यात्मिक आदर्शों से प्राप्त हुई। भव्य धार्मिक भवनों, देवालयों,

मंदिरों और प्रतिमाओं का निर्माण करके तथा देवी-देवताओं, संतों, धर्म प्रवर्तकों एवं ऋषि-मुनियों के चित्र अंकित करके इस काल की ललित कलाओं ने धर्म की सेवा की। धर्म और आध्यात्म के महत्व को, उसके तत्वों को ललित कलाओं ने अपने विभिन्न अंगों द्वारा अभिव्यक्त और प्रदर्शित किया। धर्म ने इस युग की ललित कलाओं के सामाजिक और दैनिक जीवन को प्रदर्शित करने के लिये प्रयासों को अवरूद्ध नहीं किया। विशुद्ध प्राकृतिक सौंदर्य की और ललित कलाओं के स्वच्छंद विकास में धर्म अवरोध नहीं बना। 


(4) कला "तकनीक की सादगी और अभिव्यंजना


गुप्तकाल में कला की "तकनीक या प्रणाली की सादगी और अभिव्यंजना का आनंद है

जिससे महान विचार, स्वाभाविक और सरल रूप में अंकित हो जाते हैं। ललित कलाओं के विषय और ‘“तकनीक” दोनों ही का विशिष्ट अनुरूपता में सामंजस्य हुआ है। बाह्य आकृति और आंतरिक अर्थ- शरीर और आत्मा के समान परस्पर जुड़ गये। जिस प्रकार शब्द और अर्थ लिखे रहते हैं, उसी प्रकार इस युग के जीवन और विचार के अनेक क्षेत्रों में एक अनुरूपता और संश्लेषण के आदर्श मिल गये। कला के क्षेत्र में इससे कम सुंदर समन्वय नहीं रहा।


(5) स्वाभाविकता और यथार्थवादिता


गुप्तयुग के प्रवीण कलाकारों के कुशल करों से जो कुछ भी निर्मित हुआ,

वह पूर्णरूपेण स्वाभाविक ही प्रतीत होता था और उनकी रचनाओं और कृतियों में यथार्थवादिता थी। आकृतियाँ जीवन से चुनकर स्वाभाविक कर ली गयी थीं, वे प्रवाहित जन-जीवन से ली गयीं। अब आकृतियाँ न तो शुंगकाल की सी पतली रहीं, न कुषाणकाल की सी गोला गुप्तयुगीन कला स्वाभाविक और यथार्थ थी । 


(6) लावण्य और लालित्य का संयमित प्रदर्शन


गुप्तकाल के कलाकार ने लालित्य और रूप का प्रदर्शन अपनी कृतियों में किया, परंतु उसकी विशेषता है

संयम के साथ रूप लावण्य और लालित्य का समन्वय कलाकार की कृतियों में लावण्य की वह मादकता नहीं छलकती जो मथुरा के कुषाणकालीन स्तंभों पर स्त्री-पुरुषों की आकृतियों में दृष्टिगोचर होती है। इस युग की आकृतियों के मुख पर एक अपूर्व आनंद और अंगप्रत्यंग में अपूर्व सौष्ठव और लावण्य छलकता है। गुप्तकला लावण्य और लालित्य का संयमित प्रदर्शन करती हैं। 


(7) कला का विशुद्ध भारतीय रूप


गुप्तयुग के पूर्व के काल में भारत की ललित कलाओं पर विदेशी प्रभाव था। स्थापत्य कला और मूर्ति कला में पाश्चात्य देशों के कला तत्व मिश्रित हो गये थे जिससे कला का एक नवीन रूप प्रस्फुटित हुआ था।

इसे गांधार कला शैली कहा जाता था। परंतु गुप्तयुग में ये विदेशी तत्व लुप्तप्रायः हो गये, गांधार कला शैली का शरीर नष्ट हो गया और कला का विशुद्ध भारतीय रूप स्पष्ट हो गया और इसका उत्तरोत्तर विकास हुआ।


गुप्तकाल की कला की उपर्युक्त वर्णित विशेषताओं के कारण ही विद्वानों, आलोचकों और कला मर्मज्ञों ने यह निष्कर्ष निकाला कि गुप्तकाल की ललित कलाएँ प्राचीन भारत की कलाओं के सर्वोत्कृष्ट नमूने हैं। गुप्तकाल की ललित कलाओं ने भारतवर्ष में जो गौरवमय स्थान प्राप्त कर लिया था, उससे उसमें ऐसी शक्ति, दृढता, मधुरता और आकर्षण आ गया कि वह एशिया के अधिकांश भागों में ललित कलाओं की परंपराओं को रूप दे सकी। भारत की सीमा के पार नवीन वातावरण में इस कला को ले जाने


पर वृहत्तर भारत के सांस्कृतिक साम्राज्य का सृजन हुआ। गुप्तकालीन कला एवं स्थापत्य की विस्तृत विवेचना निम्नानुसार है-