गुप्तकालीन धर्म की विशेषतायें - Features of Gupta religion

 गुप्तकालीन धर्म की विशेषतायें - Features of Gupta religion


गुप्तकाल में धार्मिक क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रवृत्ति उस रूप में प्रकट हुई जिसे मैक्समूलर जैसे विद्वान ने हिंदू नवाभ्युत्थान कहा है और फलतः गुप्तकाल ब्राह्मणों के पुनरुद्धार का युग माना गया है। परंतु इस युग के धार्मिक उत्साह के अनुराग का सूक्ष्म परीक्षण यह प्रमाणित करता है कि इस युग में ब्राह्मण धर्म के नवाभ्युत्थान जैसी घटना न तो थी और न होने का कोई कारण ही हो सकता था, क्योंकि मौर्यों के पतन और गुप्त सम्राटों के अभ्युदय के मध्यकाल में ब्राह्मण धर्म मरणासन्न नहीं था। अनेक विदेशी जैसे यवनदूत हेलीओडोरस, उज्जैन के शक क्षत्रप और कुछ कुषाण नरेश ब्राह्मण धर्म के प्रभाव से प्रसन्न हो गये थे। ब्राह्मण धर्म में उस समय भी ऐसी जीवनशक्ति और चेतनत्व था कि विदेशी लोग उससे अत्यधिक आकर्षित और प्रभावित होते थे।

इनके अतिरिक्त मौर्य युग के पश्चात् गौतमी पुत्र शातकर्णी जैसे भारतीय नरेशों ने अपने सुधार के कार्यों द्वारा ब्राह्मण धर्म की परंपरा और अनुश्रुति को बनाये रखा था। वस्तुतः समुचित रूप से ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धार गंगा की घाटी में शुंग राजवंश के प्रतिष्ठाता पुष्यमित्र के समय से ही चला आ रहा था और दक्षिण में तो अनेक राजवंशों का उत्कर्ष होता रहा जो वाजपेय और अश्वमेघ- 


यज्ञों के समान वैदिक विधियों और क्रियाओं को बारंबार करने में अपना महान गौरव समझते थे। अतएव गुप्तकाल में तो ब्राह्मण नवाभ्युत्थान का प्रश्न उठता ही नहीं।

कालिदास के ग्रंथों से बौद्धिक पुनर्जागरण अथवा साहित्यिक कृतित्व के पुनरुत्थान के संकेत नहीं प्राप्त होते हैं। वे प्राचीन काल में उद्धृत साहित्यिक स्वरूपों और शैलियों के विकास के द्योतक ही माने जाते हैं गुप्त सम्राटों ने वैष्णव और शैवमत नामक दो ब्राह्मणमार्गी संप्रदायों को संरक्षण प्रदान किया, परंतु इस संरक्षण से और वैष्णव मत शैवमत के सिद्धांतों से भी किसी धार्मिक पुनरुत्थान का बोध नहीं होता है। इन दोनों संप्रदायों के मूल सिद्धांत पहले से ही विद्यमान थे। अब गुप्त युग में सामंती जीवन के उद्भव के नये संदर्भ में वे अधिक से अधिक अनुयायियों को अपनी ओर आकृष्ट करने लगे। इसके अतिरिक्त धार्मिक जागृति और पुनरुद्धार के युग में धर्मोमाद के कारण सदैव आतंक,

संपीडन और हत्याएँ होती रहती हैं, परंतु गुप्तकाल किसी भी प्रकार की धार्मिक असहिष्णुता, धर्मोमाद तथा आतंक से मुक्त रहा है। चंद्रगुप्त का प्रसिद्ध सेनापति अम्रकार्डब बौद्ध धर्मानुयायी था और बौद्ध धर्मावलंबी प्रख्यात वसुबंधु समुद्रगुप्त का घनिष्ठ मित्र व अधिकारी था। फाह्यान के मतानुसार गुप्त सम्राट बौद्धों को भी राज्याश्रय देते थे। उपरोक्त प्रमाणों के प्रकाश में कुमारस्वामी का यह निष्कर्ष स्वीकार कर लेना अनुचित न होगा कि गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धार ही नहीं हुआ था, अपितु वह अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा को पहुँच चुका था।


गुप्त सम्राट विष्णु के उपासक थे और वे वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। गुप्त सम्राट विष्णु, शिव, पार्वती और कार्तिकेय (स्कंद) के भक्त और उपासक थे और ये विभिन्न रूपों में शिव की पूजा करते थे।

गुप्त सम्राटों और उनकी प्रजा में उदात्त दान-शीलता और धर्मपरायणता थी। वे बौद्ध बिहारों, स्तूपों, ब्राह्मणों, विभिन्न धार्मिक स्थानों, मंदिरों आदि को दान देते थे और उन्हें निर्माण करवाते थे। बौद्ध भिक्षुओं के निवास, आहार और वस्त्र की व्यवस्था भी दान से की जाती थी। गुप्तकालीन धर्म की अय विशेषतायें निम्नलिखित हैं।


(1)धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था


गुप्तकाल में सत्ताधारी वर्ग और श्रेष्ठ ब्राह्मण वर्ग ने धर्म का आश्रय लेकर वर्णों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के प्रयत्न किये। शैवों और वैष्णवों ने अच्छे कर्मों पर अधिक बल दिया।

महाभारत के एक परिच्छेद में कहा गया है कि द्विजों की सेवा पर भगवद्भक्ति से शूद्रों को मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इस बात पर बल दिया जाने लगा कि शूद्र भी अपने अच्छे व्यवहार और कार्यों से दूसरे जन्म ब्रह्मत्व प्राप्त कर सकता है। कर्म और पूर्वजन्म के सिद्धांत को मान लिया गया। इसके अनुसार व्यक्ति को पूर्व जन्म के कर्म ही उसकी प्रकृति, प्रारब्ध, सामाजिक स्थिति, सुख-दुख आदि निश्चित करते हैं। इस सिद्धांत ने समाज में विभिन्न वर्णों के सदस्यों को प्रभावित किया क्योंकि अब शूद्र और अंय हेय व्यवसाय करने वाले व्यक्ति भी सोच सकते थे कि यदि उनके कर्म श्रेष्ठ रहे तो वे शासक, अधिकारी, ब्राह्मण आदि भी हो सकते हैं।

इस युग के शूद्रक के मृच्छकटिक नाटक में एक शूद्र कर्मचारी बसन्त सेना की हत्या करना स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह पुनः ऐसा कार्य नहीं करना चाहता जिससे उसे इस जन्म में दास बनना पड़े। ऐसी धारणाओं से प्रत्येक वर्ण के सदस्यों का यह मत था कि उनको परंपरागत नियमों और वंश परंपरा के अनुकूल दिये गये सामाजिक कर्तव्यों और व्यवसायों का ही निर्वाह करना चाहिए। इस प्रकार जनता को अपने कर्तव्यों पर भरोसा दिलाने और वर्ण-व्यवस्था पर आधारित सामाजिक विभाजन को कायम रखने में धर्म की प्रमुख भूमिका थी।



(2) ब्राह्मण धर्म के उत्थान हेतु प्रयास


गुप्त सम्राटों के राज्याश्रम में वैदिक धर्म का पुनरुत्थान और खूब विकास हुआ। उन्होंने ब्राह्मण धर्म के विविध अनुष्ठानों, प्रणालियों,

विभिन्न यज्ञों और देवी-देवताओं की पूजा, उपासना, तीर्थ यात्रा, शांतिक और स्वास्तिक पूजा पाठ, दानपुण्य आदि प्रारंभ किये। संस्कृत भाषा को वैदिक धर्म के ग्रंथों शास्त्रों और धार्मिक विचार के लिए अपनाया गया। इससे वर्तमान ब्राह्मण धर्म की आधारशिला गुप्तकाल में भली-भाँति रख दी गई थी। 


(3) धार्मिक देवी-देवता


गुप्तकाल में वैष्णव और शैव धर्म अधिक लोकप्रिय हो गये। विष्णु के दस अवतार का सिद्धांत सर्वमान्य हो गया और ये दस अवतार थे मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह,

वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्किा विष्णु मानव को कल्याण और परिरक्षण का देवता माना जाने लगा। सभी अवतारवादियों ने विष्णु को सृष्टि का रक्षक माना। यद्यपि राम व कृष्ण को विष्णु का अवतार मान लिया गया था परंतु कृष्ण-लीला और राम-सीता की पूजा का प्रचार नहीं हुआ था। शिव सृष्टि का संहारक माना जाने लगा था और मानव आकृति व लिंग आकृति में तथा तांडव नृत्य करती हुई प्रलयंकारी मुद्रा में शिव की पूजा व उपासना होती थी। विष्णु और शिव की पूजा के अतिरिक्त ब्रह्मा, सूर्य, कार्तिकेय (महासेन), गणेश, नाग और यक्ष की पूजा भी होती थी और इनके मंदिर निर्मित किये गये थे। गुप्त युग में शक्ति उपासना या देवी उपासना का भी खूब प्रचार हुआ। लक्ष्मी, दुर्गा, पार्वती, महिषासुरमर्दिनी आदि की पूजा होने लगी। शक्ति, करुणा और वात्सल्य की प्रतीक सात माता (सप्तमात्रिक) को भी माना जाने लगा और इनकी मूर्तियाँ बनाई गई।


(4) प्रतिमा निर्माण एवं उपासना


गुप्तकाल में देवी-देवताओं की पूजा-उपासना के लिए उनकी मूर्तियाँ बनाई गई और उन्हें मंदिरों में प्रतिष्ठित किया गया। मूर्ति-पूजा का खूब प्रचार बढ़ा। विष्णु, शिव, ब्रह्मा, पार्वती, महिषमर्दिनी, लक्ष्मी, स्कंद, सूर्य, जैन तीर्थंकरों, बुद्ध और बोधिसत्वों की प्रतिमाएँ निर्मित की गई और उनकी पूजा-उपासना होने लगी, इससे भक्ति-भाव का खूब विकास हुआ। भक्ति और भगवत प्रेम से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भक्ति की प्रधानता गुप्तयुग की विशिष्टता है। भक्ति की अभिव्यंजना दान-पुण्य करने, ध्वजस्तंभों, प्रवेश द्वारों, मूर्तियों और मंदिरों के निर्माण में हुई। 


(5) धार्मिक ग्रंथों का संकलन


गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म अत्यधिक विकास हुआ। गुप्त सम्राटों ने ब्राह्मण धर्म के विकास के लिए हर संभव प्रयास किये।

गुप्तकाल भारतीय इतिहास का वह काल था जब विभिन्न मत-मतांतरों और उनके दार्शनिकों ने अपने सिद्धांतों, विचारों, क्रिया विधियों और गाथाओं को स्मृतियों, पुराणों, रामायण, महाभारत, धर्म-शास्त्रों और दार्शनिक ग्रंथों में व्यवस्थित रूप से संकलित कर लिया। गुप्तकाल के अतिरिक्त किसी अय काल में धार्मिक ग्रंथों के संकलन का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। 


(6) देवी उपासना एवं तांत्रिक समुदाय


गुप्तयुगीन धर्म की एक महत्वशाली विशेषता थी देवी की उपासना। शैव और वैष्णव संप्रदायों में देवी उपासना का खूब प्रचार और प्रसार हुआ। देवियों में लक्ष्मी, पार्वती,

दुर्गा या भगवती और सप्त मातृकाओं की पूजा-उपासना होती थीं ब्राह्मण धर्म में देवियों के प्रतिष्ठित हो जाने से शक्ति पूजा की प्रथा चल पड़ी। कालांतर में देवी उपासना के फलस्वरूप इस युग के अंतिम चरण में तांत्रिक समुदाय का उत्कर्ष हुआ।


(7) बौद्ध धर्म की स्थिति


गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म भी अपने महायान और हीनयान संप्रदायों सहित प्रचलित था, पर यह धर्म बंगाल, बिहार और गंगा की घाटी की अपेक्षा पंजाब काश्मीर और अफगानिस्तान में अधिक लोकप्रिय था। इन प्रदेशों में एवं मथुरा, सारनाथ, नालंदा, अजंता एलोरा, कार्ली,

जुहार, कान्हेरी आदि स्थानों में अनेक बौद्ध बिहार थे, जहाँ सहस्रों बौद्ध भिक्षु भिक्षुणियाँ निवास करते थे। दक्षिण भारत में आंध्र, काँचीवरम् और लंका बौद्ध धर्म के केंद्र थे। अनेक बौद्ध बिहार, स्तूप, चैत्य आदि निर्मित किये गये। उनमें बुद्ध जीवन की अनेक घटनाएँ और जातक ग्रंथों के कथानक उत्कीर्ण किए गए। महायान संप्रदाय के मौलिक धर्मशास्त्र और दर्शन ग्रंथ युग में ही लिखें गए। महायान संप्रदाय के अनुयायी बुद्ध और बोधिसत्वों की भक्ति पर बल देते थे और विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करते थे। (8) जैन धर्म की स्थिति


गुप्तकाल में उत्तरी भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में जैन धर्म अधिक प्रचलित था। मथुरा, वलभी, पुंड्रवर्धन, कर्नाटक, मैसूर, मदुरा आदि जैन धर्म के प्रसिद्ध केंद्र थे। जैन धर्म में भी तीर्थंकरों की मूर्ति की पूजा, तीर्थ यात्रा, तीर्थस्थान, धार्मिक कर्म-कांड, दान-पुण्य आदि किये जाते थे। जैन धर्म में व्याप्त मतभेदों के निवारणार्थ और धार्मिक ग्रंथों का संशोधन व परिवर्धन करने के लिए सन् 313 और 453 ई. में वलभी में दो सम्मेलन हुए और 470 ई. में मदुरा में भी अधिवेशन हुआ। इस युग में जैन धर्म के सिद्धांतों और दर्शन पर नवीन ग्रंथों की रचना हुई।