ऋग्वैदिक धर्म की विषेषताएँ - Features of Rigvedic religion

ऋग्वैदिक धर्म की विषेषताएँ - Features of Rigvedic religion


(1) देवताओं का मानवीकरण


ऋग्वैदिक काल में प्रत्येक देवता या देवी किसी विशिष्ट प्रकृति की प्रतीक थी। आर्यों ने प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों और शक्तियों का दैवीकरण किया। परंतु कालांतर में आर्यों ने अपने देवी-देवताओं की कल्पना मानव के रूप में ही की अर्थात् उन्होंने अपने देवी-देवताओं में उन सभी सद्गुणों की कल्पना की जो मानव में पाये जाते है, परंतु उनमें मानवों की दुर्बलताएँ और दुर्गुण न थे। इन देवताओं के स्वभाव की प्रमुख विशेषताएँ इनकी सदाचारिता, नैतिकता, दानशीलता और दया थी। उनकी अनुकम्पा और प्रसन्नता की उपलब्धि हेतु उनकी आराधना और वन्दना की जाती थी। ऋग्वेद काल के आर्य अपने देवताओं से भयभीत और आतंकित नहीं होते थे।

वे उन्हें मानव जाति का मित्र मानते थे। वे प्रार्थना से और यज्ञों में घी, दूध, दही, अन्न आदि की आहुति देकर उन्हें प्रसन्न करते थे और उनसे समृद्धि के लिए वरदान प्राप्त करते थे। 


(2) सर्वदेववाद


ऋग्वैदिक काल में आर्यों के देवी-देवताओं की संख्या अधिक थी, परंतु उनमें किसी प्रकार की उच्चावच परंपरा नहीं थी, देवताओं के लिए ऊँच-नीच की भावनाएँ नहीं थीं। आर्यों ने सभी देवताओं की महिमा गायी है और एक देवता को दूसरे से बढ़कर माना है। जिस-जिस क्षेत्र का जो-जो देवता था,

वह उस क्षेत्र में प्रधान माना गया और उसी मात्रा में उसकी स्तुति और आराधना की गयी। प्रत्येक देवता को शक्तिशाली मानकर उसकी प्रार्थना और वन्दना की गयी। प्रत्येक देवता अपने अवसर पर सर्वोच्च होता था। वह मनुष्य को सबसे अधिक आनंद प्रदान करने वाला तथा मनुष्य को समृद्ध बनाने वाला होता था। इसीलिए आर्यों के लिए उनके सभी देवता सम्माननीय एवं पूज्य थे। (3) पुरुष देवताओं की प्रधानता ऋग्वैदिक धर्म में पुरुष देवों की प्रधानता थी। पृथ्वी, अदिति, उषा एवं सरस्वती जैसी देवियों को निम्न स्थान प्राप्त था।


(4) देवताओं का समूहकरण


आर्यों ने अनेक देवताओं को किसी प्रमुख देवता से संबंधितकर दिया था।

उदाहरणार्थ, इंद्रको कई देवताओं के साथ जोड़ा गया है। द्यौस उसका पिता, अग्नि उसका भाई, मारुत उसका सहगामी है। इसी प्रकार सूर्य को भी अय देवताओं से संबंधित किया गया। सूर्य अग्नि का रूप, उषा सूर्य की प्रिया और रात्रि की बहिन, अश्विन सूर्य पुत्री सूर्या का पति माना गया। कभी-कभी सभी देवी-देवताओं को "विश्वेदेवाः" नामक वर्ग के अंतर्गत सामूहिक रूप से इकट्ठा कर दिया गया। 


(5) मंदिरों व मूर्तियों का अभाव


ऋग्वैदिक काल के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ नहीं थी और न ही मंदिर थे। ऋग्वेद में मंदिर, देवालय या मूर्ति-पूजा का कहीं भी उल्लेख नहीं है।

यद्यपि देवताओं की कल्पना अनुराग से मानव रूप में होने लगी थी, परंतु मनुष्य रूप में उनकी मूर्तियाँ नहीं बनी थीं। इनमें से एक देवता के विषय में यह कहा जाता है कि "उसका शब्द सुनायी देता है, परंतु उसका आकार अदृश्य है। अतः ऋग्वैदिक युग में मंदिरों तथा मूर्तियों का अभाव था।


(6) पुरोहित वर्ग का अभाव


इस युग के धार्मिक जीवन का प्रमुख कारण था पुरोहित वर्ग की अनुपस्थिति। प्रत्येक गृहपति स्वयं पुरोहित था जो अपने गृह में स्वयं अग्नि प्रज्ज्वलित करता था और मन्त्रोच्चारण कर आहुति आदि देता था। 


(7) यज्ञ


देवताओं को प्रसन्न करने के लिये यज्ञ किये जाते थे। सामान्यतया यज्ञ कार्य प्रत्येक मनुष्य अपने लिये स्वयं करता था। परंतु ऋग्वेद में विशाल और व्यवसाध्य यज्ञों का भी उल्लेख है। इन यज्ञों में कई वेदियाँ, बहुसंख्यक पुजारी और अत्यधिक यज्ञ-सामग्री होती थी। ऐसे यज्ञ राजा और धनवान ही संपूर्ण करते थे, परंतु यज्ञ स्वयं ही सब कुछ नहीं होते थे। वे देवताओं को प्रसन्न करने के लिए केवल साधन थे। यज्ञ और अनुष्ठान यजमान को समृद्धि और सुख प्रदान करने वाले माने जाते थे। ऋग्वैदिक काल के समाज में कई लोग स्मृति और अराधना को ही यज्ञों की अपेक्षा अधिक महत्वशाली और श्रेयस्कर मानते थे। ऋग्वेद में भी उल्लेख है

कि इंद्र के प्रति की गयी स्तुति घृत अथवा मधु की अपेक्षा अधिक मधुर होती है। यहाँ यह विशेष उल्लेखनीय है कि इस युग में फल, अन्न, दूध, घी आदि को यज्ञ में देवताओं हेतु अर्पण किया जाता था। इस काल में पशु बलि का प्रचलन नहीं था। 1.4.6 ऋग्वैदिक दार्बनिक विचारधाराएँ


आर्यों की धार्मिक और दार्शनिक विचारधाराओं पर ऋग्वेद की ऋचाएँ प्रकाश डालती हैं। उन्हां ेने अभी तक संसार और गृहत्याग तथा सन्यास और तप की कल्पना नहीं की थी। लोग वना में जाकर शरीर को विभिन्न यन्त्रणाएँ देकर तपस्या या प्रायश्चित नहीं करते थे।

वे विश्व को अमंगलकारी कष्ट का स्थान नहीं मानते थे। उनमें शरीर से मुक्ति प्राप्त करने तथा सांसारिक बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए कोई तीव्र लालसा या उत्सुकता नहीं थीं। उनके लिए विश्व और गहस्थाश्रम उत्तम स्थान थे। वे गृहस्थाश्रम में ही रहकर देवोपासना और नैतिकता से कल्याण प्राप्ति के लिए प्रयास करते थे। उन्होंने अपने देवताओं से शरीर की मुक्ति या मोक्ष की याचना नहीं की, परंतु वे देवताओं से स्थान-स्थान पर शतवर्षीय आयु, पुत्र, धन-धान्य और विजय की याचना करते हैं। वे प्रार्थना करते हैं, “भगवान! जीवन-यात्रा में हमें समुन्नत कीजिए। इन मनोकामनाओं और याचनाओं से प्रकट होता है कि आर्य लोग जीवन-संघर्ष से घबराते नहीं थे, उनमें पलायनवाद नहीं था,

निराशावादिता नहीं थी, मोक्ष प्राप्ति की उत्कण्ठा भी नहीं थी। उन्हें अपने सांसारिक जीवन से अनुराग था। उनके ऐहिक जीवन में आल्हाद था। उनकी धारणा थी कि यह संसार धर्म-परायण पुरुषों के लिए उदार देवताओं के संरक्षण में साहित्यिक जीवन व्यतीत करने के लिए उचित स्थान है।


ऋग्वेद में मनुष्यों के सदृगों और नैतिकतता पर भी बल दिया गया है। अधर्म तथा अधर्मी, पाप तथा पापी मनुष्यों के भाग्य का ऋग्वेद में कहीं उल्लेख नहीं होता है,


परंतु मृत्यु के उपरांत धर्मपरायण पुरुषां को प्राप्त होने वाले यश और गौरव पर अधिक जोर दिया जाता था। ऋग्वेद में स्वर्ग और नरक की कल्पना बिल्कुल स्पष्ट नहीं हैं।

ऋग्वेद में स्वर्ग तथा इससे भी अधिक श्रेष्ठ और उच्च स्थलों का उल्लेख आया है, परंतु नरक के लिए कोई वर्णन नहीं हैं इतना अवश्य कहा गया है कि मृत्यु के बाद पुण्यकर्मी मनुष्य सानन्द स्वर्ग में रहता है। संभव है, उस समय मोक्ष के स्थान पर स्वर्ग की प्राप्ति ही मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य माना जाता था।


मनुष्य के वर्तमान तथा भविष्य के विषय में कोई संघर्ष नहीं था। धर्म, अर्थ एवं काम के बीच में कोई विरोधाभास ही नहीं था। यह कल्पना की जाती थी कि संपूर्णमानव जीवन सुख और समन्वय की इकाई है। आत्मा और पुनर्जम के विषय में भी ऋग्वेद में स्पष्ट विचार व्यक्त किये गये हैं। ऋग्वेदकालीन ऋषि आत्मवादी थे। उनकी धारणा थी कि आत्मा अमर है। उन्होंने अमरता का वर्णन किया है। उनका विश्वास था कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा पितृलोक को जाती है जहाँ यम उसका स्वागत करता है और वहाँ उसके कर्मों के अनुसार वह दण्डित या पुरस्कृत होती है। इससे प्रकट होता है कि आर्य पुनर्जम में विश्वास करते थे, परंतु कर्म और उसके अनुसार आत्मा के बार-बार जन्म लेने का सिद्धांत ऋग्वैदिक काल के बाद में प्रचलित हुआ।