धर्म का स्वरूप - form of religion

 धर्म का स्वरूप - form of religion


धर्मप्रधान भारतीय संस्कृति में धर्म को बहुत महत्व दिया गया है। धर्म के अंतर्गत न केवल ईश्वरोपासना, अध्यात्म और नैतिक व्यवहार हैं, अपितु मनुष्य का व्यक्तिगत आचरण, दैनिक कर्तव्य, पारस्परिक व्यवहार और सामाजिक व्यवहार भी इसकी मर्यादा में आते हैं। विविध संस्कार, विद्याध्ययन, विवाह, संतानोत्पत्ति, माता-पिता-गुरु की सेवा, शारीरिक और मानसिक उन्नति, राजनीति, समाज और अर्थ, इन सभी व्यवहारों का समावेश धर्म में हो जाता है।


धर्म का स्वरूप बहुत व्यापक है। आधुनिक रिलीजन या मजहब पद इसके पर्याय प्रतीत नहीं होते हैं। धर्मपद की रचना अय से हुई है। इसका अर्थ है- धारण करना,

सहारा देना और पालन करना। इसका अभिप्राय है ध्रियते यः स धर्मः', 'धरति धारयति वा लोकं यः स धर्मः 'प्रियते लोकः अनेन सधर्मः' अथवा 'धारणाद् धर्म इत्युच्यते महाभारतकार का कथन है- धारणा करने के कारण इसको धर्म कहते हैं। यह प्रजा को धारण करता है।


प्राचीन ऋषियों की धर्म की परिभाषा अति सरल और व्यवहारिक थी। जिसके द्वारा मनुष्य उन्नति करे, कल्याण को सिद्ध करे, वह धर्म है। अपने लिए जो दुःखद और प्रतिकूल है, वैसा आचरण दूसरों के प्रति न करना धर्म है। दस प्रकार के व्यवहार धर्म हैं धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, स्वच्छता, इंद्रिय- निग्रह,

धी, विद्या, सत्य, अक्रोध। छान्दोग्य उपनिषद् में धर्म के तीन स्कन्ध कहे गये हैं- (1) यज्ञ, अध्ययन और दान (2) तपस्या (3) ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए आचार्य कुल में रहना।


मनु का कथन है कि जगत की भौतिक संपत्तियाँ यहीं रह जाती हैं, केवल धर्म ही साथ जाता है। संपूर्ण जगत की प्रतिष्ठा धर्म से होती है। सांसारिक जन धर्मिष्ठ के पास जाते हैं। धर्म द्वारा वे पाप को दू करते हैं। धर्म में सब कुछ प्रतिष्ठित है, अतः धर्म सर्वश्रेष्ठ है।

धर्म का रूप कल्याण है। इसकी सृष्टि परमात्मा ने की थी। विद्वानों के अनुसार धर्म का पालन करते हुए मृत्यु भी श्रेयस्कर है। धर्म के महत्व के कारण ही मुनियों ने उसकी शिक्षा देने की प्रार्थना की थी। धर्म के उपादान


प्राचीन आचार्यों ने धर्म के उपादानों की व्याख्या करके उसके अनुकूल आचरण करने का उपदेश दिया था। धर्म के उपादान और प्रमाण सर्वप्रथम वेद हैं, तदनंतर स्मृति और सदाचरण हैं। मन की शुभ भावनाएँ और संकल्प भी धर्म के उपादान माने गये हैं।


गौतम धर्मसूत्र, आपस्तंब धर्मसूत्र और हारीत ने धर्म के लिए वेदों को प्रमाण माना था। वसिष्ठ ने श्रुति और स्मृति के अतंतर सदाचरण को धर्म का प्रमाण कहा। मनु के अनुसार धर्म के प्रमाण चार हैं श्रुति, स्मृति, सदाचार और जो अपने को प्रिय लगे। याज्ञवल्क्य ने इन चार तत्त्वों को प्रमाण मानकर उचित संकल्पज काम को भी धर्म का प्रमाण कहा है। -