सूत्रयुगीन आर्थिक पर्यावरण - Formulaic Economic Environment
सूत्रयुगीन आर्थिक पर्यावरण - Formulaic Economic Environment
निवास- गृह
साधारण लोगों के लिए धनी और निर्धन सभी के लिए निवास गृह की व्यवस्था थी। गृह निर्माण एक कला समझी जाने लगी थी। गृह निर्माण के लिए एक विशेष ज्ञान और बुद्धि-विवेक का प्रसार हो गया था। गृह के लिए विशेष रूप से भूमि का चयन होता था। गृह कच्चे और पक्के दोनों प्रकार के बनते थे। उनमें शुद्ध ताजे प्रकाश और जल की व्यवस्था की जाती थी। दरवाजे और खिड़कियों की समुचित व्यवस्था होती थी।
नगर और गाँव
यद्यपि ग्रामों की संख्या अधिक थी, परंतु सूत्रकारों ने जिस समृद्ध, जटिल,
सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का वर्णन किया है, उससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समाज सुखी और संपन्न था और लोग नगरों में भी रहते थे। नगरों का जीवन वैभवशाली और संपन्न था।
कृषि
जन साधारण का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। जौ और चावल की खेती प्रधानतः होती थी । कृषि की प्रणाली लगभग प्राचीन ही रही। बैलों द्वारा इन पर हल चलाये जाने, खेती करने, बंजर भूमि को छोड़ने और मन्त्रोच्चारण करके खेती को कार्य करने के हवाले सूत्र-ग्रंथों में हैं।
पशु-पालन
कृषि के साथ-साथ पशु-पालन भी लोकप्रिय व्यवसाय था। पशु-पालन भी जीविकोपार्जन का एक प्रमुख साधन था।
विभिन्न प्रकार के पशु पाले जाते थे जैसे, भेड़, बकरी, भैंस, घोड़ा, गधा, ऊँट आदि। परंतु गाय व बैल अधिक संख्या में पाले जाते थे। समाज में गाय की प्रतिष्ठा बढ रही थी। उनके प्रति लोगों की श्रद्धा में वृद्धि हो गयी थी। पशु ही संपत्ति माने जाते थे। जिसके पास जितनी ही अधिक कृषि योग्य भूमि और पालतू पशु होते थे वह उतना ही धन-संपन्न व्यक्ति समझा जाता था।
उद्योग-व्यवसाय
विभिन्न प्रकार के उद्योग-व्यवसाय प्रचलित थे। सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों की बुनाई का व्यवसाय, मिट्टी के बर्तन बनाने का व्यवसाय, लकड़ी की विविध वस्तुएँ बनाने का धन्धा,
वस्त्रों की रंगाई, धुलाई, सिलाई के व्यवसाय, कुशन, चटाई, टोकरियाँ आदि बनाने का व्यवसाय, स्वर्णकार आदि के व्यवसाय, अधिक प्रचलित थे। विभिन्न प्रकार की धातुओं का ज्ञान इस युग में था। धातुकार और लुहार का व्यवसाय भी था। दैनिक जीवन के व्यवहार में आने वाली अनेक वस्तुएँ धातुओं की बनायी जाती थीं। सूत्र-ग्रंथोंमें स्वर्ण, चाँदी, ताँबा, पीतल, लोहा, काँसा तथा अंय धातुओं का खूब उल्लेख हैं। इससे होता है कि घरेलू सामान व दैनिक जीवन की कई वस्तुओं के बनाने में इन धातुओं का उपयोग किया जाता था।
वाणिज्य तथा व्यापार
वैश्य वर्ग के लोग वाणिज्य और व्यापार करते थे। अपने व्यापार में अच्छी सफलता प्राप्त करने के लिए ये लोग पाण्ड्य सिद्धि नामक एक प्रकार का यज्ञ या हवन करते थे।
सामुद्रिक व्यापार विशेष रूप से नहीं होता था, क्योंकि बड़े बंदरगाहों तथा सामुद्रिक व्यापार-व्यवसाय के हवाले सूत्र-ग्रंथों में नहीं हैं। छोटी-छोटी नावों के उल्लेख से ऐसा आभास होता है कि नदियों और नावों द्वारा व्यापारिक माल लाया और भेजा जाता होगा। व्यापार के लिए मुद्राओं और नापतौल के बाँटों का प्रयोग होता था। पाणिनि ने निष्क, शतमान, कार्षापण, माप आदि मुद्राओं का उल्लेख किया है। आधक, पत्र, आचीत, द्रोण आदि बाँटों के हवाले भी उपलब्ध होते हैं।
यातायात
देश में व्यापारिक मार्ग थे। व्यापारिक नगर परस्पर ऐसे सार्वजनिक मार्ग या सड़क द्वारा जुड़े होते थे। इन पर पुल भी बने होते थे। व्यापारियों और यात्रियों की सुविधा हेतु मार्गों पर विश्राम स्थल भी बने थे। रथ यातायात का साधन था। गधों, ऊँटों और नावों का प्रयोग होता था ।
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