गंधार कला - Gandhara Art
गंधार कला - Gandhara Art
आरंभिक शताब्दियों में जब मथुरा में बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण हुआ, उसी समय गंधार प्रदेश मैं एक विभिन्न प्रकार की मूर्तिकला का विकास हुआ। प्राचीन काल में सिंधुनदी के पूर्वी और पश्चिमी तट पर पेशावर की घाटी, स्वात, बुनेर और बाजौर के प्रदेशों को गंधार कहा जाता था। सिंधुनदी के पूर्व में पूर्वी गंधार की राजधानी तक्षशिला थी और पश्चिमी गंधार की राजधानी पुष्कलावती । यह प्रदेश भारत और पश्चिमी जगत के बीच में बसा हुआ था। इस भौगोलिक स्थिति के कारण यह विभिन्न जातियों के आक्रमण का शिकार और विभिन्न देशों के व्यापारिक मार्गों का केंद्र बना तथा यहाँ विविध जातियों की संस्कृतियों का संगम हुआ। यह प्रदेश सर्वप्रथम छठी और पाँचवीं शताब्दी ई. पू. में हखामनी साम्राज्य का अंग बना। चौथी शताब्दी ई. पू. में कुछ समय तक यह सिकंदर की सेनाओं के अधिकार में रहा।
उसके बाद यहाँ चंद्रगुप्त ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया, किंतु एक शताब्दी के मौर्य शासन के बाद दूसरी शताब्दी ई. पू. में यहाँ यूनानियों का शासन पुनः स्थापित हुआ। पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व में शर्कों ने इन्हें जीत लिया, किंतु लगभग एक शताब्दी बाद पहलवों और कुषाणों ने शकों को हराया। तीसरी शताब्दी ई. में इस प्रदेश पर पुनः ईरान के सासानी सम्राटों ने तथा चौथी शताब्दी में किदार कुषाणों ने अपना शासन स्थापित किया। 465 ई. श्वेत हूणों ने यहाँ प्रबल विध्वंस और विनाश की तांडव लीला करते हुए इस प्रदेश के प्राचीन स्मारकों को गहरा धक्का पहुँचाया। इस संक्षिप्त विवरण से यह स्पष्ट है कि गंधार प्रदेश पर ईरानी, यूनानी, भारतीय, शक, पहलव और कुषाण जातियों के हमले होते रहे तथा इसने इन सब जातियों के प्रभावों को ग्रहण किया।
इसके साथ ही प्राचीन काल में भारत और चीन से पश्चिमी जगत को जाने वाले महत्वपूर्ण स्थलीय व्यापारिक मार्ग इसी प्रदेश से होकर गुजरते थे अतः यह प्रदेश उस समय व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ विभिन्न देशों की कलाओं के प्रभाव को ग्रहण कर रहा था। इन सबके समन्वय से जो कला यहाँ ईसा की पहली चार शताब्दियों में विकसित हुई उसे गंधारकला कहा जाता है। यह प्रधान रुप से यूनानी और भारतीय कला के सम्मिश्रण से बनी थी, इस पर ईरान और रोम का भी प्रभाव भी पड़ा था।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लगभग 100 वर्ष पहले 1870 ई. में अपनी सभ्यता और संस्कृति का मूल स्रोत यूनान को समझने वाले पश्चिमी जगत् को इस कला का परिचय लिटनर के लेखों से मिला तो पश्चिमी विद्वानों ने इस कला को अत्यधिक महत्व दिया,
भारतीय कला पर इसका गहरा प्रभाव माना, इसकी यूनानी बौद्ध कला का नाम दिया। किंतु इस विषय में हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस कला का उत्कर्ष उस समय हुआ जब भारत में यूनानी शासन समाप्त होकर अतीत की वस्तु बन चुका था। इस कला के प्रधान पोषक और संरक्षक यूनानी नहीं, अपितु मध्य एशिया से आने वाले शक और कुषाण थे, अतः इसे यूनानी बौद्ध कला का नाम देना ठीक नहीं प्रतीत होता । इसके आविर्भाव और विकास के प्रधान क्षेत्र के आधार पर इसे गांधार कला का नाम देना समीचीन प्रतीत होता हैं।
गंधार कला की शैलियाँ
गांधार कला को दो बड़ी शैलियों में बाँटा गया है। पहली कला-शैली या संप्रदाय का विकास पहली दूसरी शताब्दी ई में हुआ। इस कला का माध्यम एक विशेष प्रकार का भूरे काले रंग का परतदार पत्थर था। इस शैली की सभी मूर्तियाँ इसी पत्थर की बनी होती हैं। दूसरी परवर्ती शैली का समय पाँचवी शताब्दी ई. माना जाता है। इस समय इस कला का माध्यम परतदार पत्थर न होकर मिट्टी, चूना, पलस्तर, मसाला या गचकारी था। इन दोनों कला- शैलियों के हजारों उदाहरण प्राचीन गंधार प्रदेश और अफगानिस्तान से मिले है। इनसे यह प्रतीत होता है कि इस कला के सात बड़े केंद्र थे- तक्षशिला, पुष्कलावती, नगरहार, रवात नदी की घाटी, कापिशी, बामियाँ, बाल्हीक या बैक्ट्रिया।
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