गुप्तकालीन स्थापत्य कला मंदिर - Gupta Architecture Temple

गुप्तकालीन स्थापत्य कला मंदिर - Gupta Architecture Temple


प्राचीन काल में भारत में मंदिर निर्माण की पृष्ठभूमि में जब हम गुप्तकाल पर दृष्टिपात करते हैं और तत्कालीन अभिलेखों में मंदिरों की चर्चा पाते हैं तो लगता है कि इस काल में मंदिर बहुत बड़ी संख्या में बने होंगे और वे अपने रूप में काफी विकसित होंगे। किंतु गुप्तकालीन कहे और समझे जानेवाले मंदिर- अवशेषों से जो रूप सामने आता है, वह वास्तुकला की दृष्टि से मंदिरों का अत्यंत शैशविक रूप ही प्रकट करता है। ईसा पूर्व और ईसा की आरंभिक शताब्दियों के उच्चित्रों और सिक्कों से ज्ञात देव गृहों की तरह इनमें से कोई भी मंदिर छत के रूप में कुब्जपृष्ठ अथवा स्तूपिका स्वरूप नहीं है। वे कुषाण सिक्कों पर अंकित देव मंडप की तरह सपाट ओरीयुक्त छतवाले भी नहीं हैं।

उनकी छत एकदम सपाट है। इस प्रकार ये उनसे एकदम अलग-थलग हैं। उच्चित्र फलकों और सिक्कों पर देवगृहों की कोई भू-योजना नहीं झलकती, इस कारण कहा नहीं जा सकता कि भूयोजना की दृष्टि से गुप्तकालीन मंदिर उनके कितने निकट थे। खड़े रूप में उच्चित्रों में देवगृह स्तंभों पर बने मंडप और दीवारों से घिरे कमरे दोनों ही रूपों में दिखाई पड़ते हैं। गुप्तकालीन मंदिर अधिकांशतः दीवारों से घिरे कमरे ही हैं। इस दिशा में गुप्तकालीन वास्तुकों के लिए पूर्ववर्ती वास्तुकारों से प्रेरणा ग्रहण करने जैसी कोई बात जान नहीं पड़ती।


सभी बातों को सम्यक रूप से सामने रख कर संतुलित रूप से देखने पर यही प्रतीत होता है कि गुप्तकालीन मंदिरों की परंपरा उक्त उच्चित्रों और सिक्कों पर अंकित वास्तुपरंपरा से सर्वथा भिन्न थी ।

हो सकता है गुप्तकालीन वास्तुकारों ने सपाट छतोंवाले मंदिर निर्माण की प्रेरणा लयण वास्तु से ग्रहण की हो। इस काल के प्रमुख मंदिरों का निम्नानुसार प्रस्तुत हैं -


1.शंकरमद का मंदिर


1. जबलपुर में तिगवा से तीन मील पूरब कुंडा नामक ग्राम में एक छोटा-सा लाल पत्थर का बना शिव मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग शंकरमढ़ कहते हैं। इसकी ओर अभी हाल में ही ध्यान आकृष्ट हुआ है। यह छोटी-सी कोठरी मात्र है, जो भीतर से लगभग वर्गाकार (5 फुट 7 इंच लंबा और 5 फुट 10 इंच चौडा) है,

बाहर से वह 10 फुट 8 इंच लंबा और 10 फुट 10 इंच चौड़ा है। यह बिना चूने-गारे के पत्थर की लंबी पटियों को रख कर बनाया गया है। छत पत्थर के दो पटियों से बनी है जो लोहे के अंकुशों से जुड़े हुए हैं। मंडप की छत पर संभवत: कमल के फूल का उच्चित्रण हुआ था पर अब उसके कुछ अंश छत की एक पटिया पर ही बच रहे हैं। द्वार के बाजुओं पर दोनों ओर उभरती हुई तीन पट्टियाँ हैं और ऊपर के सिरदल के दोनों कोनों पर चैकोर सामान्य अलंकरण हैं। इस मूल वास्तु के निर्माण के पश्चात् किसी समय इसके आगे एक मंडप जोड़ दिया गया था जो अब नष्ट हो गया है। इसे गुप्तकाल के अंत्यारंभ का मंदिर अनुमान किया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि मंडप भी गुप्तकाल के आरंभ में ही किसी समय बनाया गया होगा। 


2. साँची स्थित मंदिर


साँची के महास्तूप से दक्षिण-पूर्व हट कर एक छोटा सा सपाट छतों वाला मंदिर है जो भीतर से वर्गाकार 8 फुट 2 इंच और बाहर से 20 फुट लंबा और पौने तेरह फुट चौडा है। इसके सामने छोटा-सा चार स्तंभों पर खड़ा मंडप अथवा बरामदा है। ऊपर छत पर पानी निकलने के लिए पनाली लगी है। स्तंभों को छोड़ कर इस भवन में किसी प्रकार का कोई अलंकरण ज्ञात नहीं होता। स्तंभ नीचे चैपहल और ऊपर अठपहल हो गये हैं, उसके बाद चैकोर पीठ के ऊपर शीर्ष है जिन पर पशुओं का उच्चित्रण हुआ है। 


3. तिगवा का मंदिर


जबलपुर जिले में तिगवा, किसी समय मंदिरों का गाँव था, किंतु अब वहाँ के सभी मंदिर नष्ट हो गये हैं। केवल गुप्तकालीन एक मंदिर बच रहा है।

पत्थर का बना यह मंदिर 12 फुट 9 इंच का वर्गाकार है, ऊपर सपाट छत है, जिस पर भीतर कमल के फूल का अंकन है। सामने चार स्तंभों पर खड़ा मंडप है- भीतर गर्भगृह वर्गाकार केवल 8 फुट है। उसके भीतर नृसिंह की मूर्ति प्रतिष्ठित है। मंडप के स्तंभ नीचे तो चैपहल है, कुछ दूर जाकर वे अठपहल और फिर सोल पहल हो जाते हैं और फिर वे लगभग गोल रूप धारण कर लेते हैं। उसके ऊपर कुंभ है और तदनंतर तीन भागों में विभक्त पीठिका और तब शीर्ष पीठिका के ऊपरी भाग पर गवाक्षों का उच्चित्रण है और शीर्ष पर चारों ओर दो बैठे हुए सिंह और उनके बीच वृक्ष अंकित है। इस प्रकार इस मंदिर के स्तंभ काफी अलंकृत हैं। स्तंभों की तरह ही द्वार भी अलंकृत है। उसके अगल-बगल अर्धस्तंभों का अंकन हुआ है और उनके ऊपर गंगा-यमुना का अंकन है। सिरदल के ऊपर तेरह चैकोर टोड़े निकले हुए हैं, जो लकड़ी के धरण के अनुकृति जान पड़ते हैं। काष्ठ के उपकरण का पत्थर में अनुकरण, वास्तु की शैशविकता की ओर संकेत करता है।


4. एरण के मंदिर


समुद्रगुप्त और बुधगुप्त के अभिलेख तथा तोरमाण के काल के वराह मूर्ति के कारण एरण पुरातत्त्वविदों और इतिहासकारों के लिए एक परिचित स्थान है जो मध्यभारत के सागर जिले में स्थित है। यहाँ गुप्तकालीन तीन मंदिर पाये गये हैं।


(क) नृसिंह-मंदिर


यह मंदिर प्रायः ध्वस्त हो गया है। जिन दिनों कनिंघम ने इसे देखा था, केवल सामने का हिस्सा यथास्थित था। उसके मलबे की सामग्री का अध्ययन कर उन्होंने उसका जो रूप निर्धारित किया है, उसके अनुसार यह साढ़े बारह फुट लंबा और पौने नौ फुट चौडा था।

सामने चार स्तंभों पर स्थिर मंडप था। बीच के दो स्तंभों में साढ़े चार फुट का और किनारे के स्तंभ में सवा तीन फुट का अंतर था। इसके स्तंभ तो अपने स्थान पर नहीं हैं पर चबूतरे पर उसके जो चिह्न हैं। उससे ज्ञात होता है कि वे चैपहल थे। इस मंदिर के भीतर नृसिंह की जो मूर्ति प्रतिष्ठित थी वह 7 फुट ऊँची है। छत अंय मंदिरों की तरह ही सपाट थी और 13 फुट आठ इंच लंबे और साढ़े सात फुट चैड़े दो शिला-फलकों से बनी थी। इनका किनारा कुछ उठा था और दोनों फलकों के जोड़ पर एक तीसरा पतला फलक रख दिया गया था। 


(ख) वराह मंदिर


कनिंघम ने जिन दिनों इस मंदिर को देखा था, उस समय तक उसका समूचा ऊपरी भाग गिर गया था, नीचे की दीवारें और मंडप के दो स्तंभ बच रहे थे।

भीतर प्रतिष्ठित वराह मूर्ति यथास्थान थी। इस मूर्ति की ऊँचाई 11 फुट 2 इंच है और लंबाई में 13 फुट 10 इंच और चौडाई में 5 फुट डेढ इंच है। इन सूत्रों के आधार पर कनिंघम ने मंदिर का जो रूप उपस्थित किया है, उसके अनुसार इस मंदिर में 31 फुट लंबा और साढ़े पंद्रह फुट चौडा गर्भगृह तथा उसके सामने 9 फुट चौडा मंडप था, दीवार की मोटाई ढाई फुट थी। इस प्रकार समग्र मंदिर बाहर से साढ़े बयालीस फुट लंबा और साढ़े बीस फुट चौडा रहा होगा। छत का अवशेष उपलब्ध नहीं हो सका, किंतु गर्भगृह के दीवारों और मंडप के अवशेषों से स्पष्ट अनुमान होता है। कि उसके ऊपर छत अवश्य रही होगी। मंडप के स्तंभ का शीर्ष उपलब्ध नहीं है।

उसको छोड़ कर स्तंभ की ऊँचाई दस फुट है, उसका चैकोर तल वर्गाकार दो फुट चार इंच है। तल चार पट्टियों में विभक्त है। सबसे निचली पट्टी के ऊपर दो पतले कंठ हैं फिर एक गोल पट्टी है। तदनंतर फिर पतला दुहरा कंठ है और उसके ऊपर दो पट्टियाँ हैं। इन पट्टियों के पर एक कंठ है और इस तल के ऊपर स्तंभ का धड़ है जो वर्गाकार एक फुट साढ़े सात इंच है। स्तंभ का यह भाग 9 खण्डों में विभक्त है। नीचे दो फुट दो इंच का पूर्णघट है। जिससे लताएँ बाहर निकल रही हैं। घट के नीचे रज्जुका है, घट के ऊपर लता-पत्र की एक पतली पट्टी है और फिर उसके ऊपर पाँच फुट दस इंच भाग सोल पहल है। इसमें चार दिशाओं के चार पहलों में जंजीरयुक्तघंटे का अंकन है

और ऊपरी भाग में प्रत्येक पहल में अर्धवृत्त बना है। इसके ऊपर उलटा कमल-घट है और फिर उसके ऊपर दो फुट दो इंच का वैसा ही पूर्ण घट है जैसा तल में है। इस पूर्णघट के ऊपर आमलिका रूपी कंठ है तदनंतर आठ इंच की चैकोर बैठकी है जिसके चार कोनों पर घुटनों के सहारे खड़ी चार मानवाकृतियाँ हैं और बीच में दो परस्पर गुंथे सर्प हैं, उनके ऊपर अर्धफूल है। इसकी बैठकी के ऊपर कटावदार कंठ है और इस कंठ के पर पुनः दो भागों में विभक्त बैठकी है जो दो भिन्न रूपों में अलंकृत है। इसके ऊपर शीर्ष रहा होगा। इस प्रकार इस स्तंभ का अलंकरण अत्यधिक और भारी है।


इस मंदिर का महत्त्व इस दृष्टि से है कि इसमें प्रतिष्ठित वराह मूर्ति पर हूण- नरेश तोरमाण के शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख है।

इस अभिलेख के अनुसार मातृविष्णु के छोटे भाई धन्यविष्णु ने इसका निर्माण कराया था और इन दोनों भाइयों ने कुछ ही पहले बुधगुप्त के शासन काल में एरण में ही विष्णुध्वज स्थापित किया था। इस प्रकार इस मंदिर का निर्माण काल निश्चित है।


(ग) विष्णु मंदिर


वराह मंदिर के उत्तर में एक अंय मंदिर था जिसमें तेरह फुट दो इंच विष्णु प्रतिष्ठित थे। यह मंदिर आकार में लंबोतरा था, उसके सामने मंडप बना था। बाहर से यह साढ़े बत्तीस फुट लंबा और साढ़े तेरह फुट चौडा था। भीतर से यह केवल 18 फुट लंबा और 6 फुट चौडा था। मंडप दो अत्यधिक अलंकृत स्तंभों पर बना था जिसकी टोड़ों के साथ ऊँचाई 13 फुट थी । ये स्तंभ यथास्थान खड़े हैं।

किंतु गर्भगृह की दीवारें एकदम गिर गयी हैं। इस मंदिर का द्वार, जो उपलब्ध है, काफी अलंकृत है। द्वार के सिरदल के बीच में गरुड़ का उच्चित्रण है। द्वार के बाजू का अलंकरण तीन भागों में बँटा है। भीतरी भाग सर्प की कुंडलियों से मंडित है, बीच के भाग में पुष्पांकन है और किनारे पत्तियाँ अंकित हैं। बाजू के निचले भाग में गंगा और यमुना का अंकन है। इस मंदिर का छत भी सपाट था। किंतु अय मंदिरों की तुलना में काफी भारी था और मंडप के स्तंभों से सवा तीन फुट ऊपर था। छत और मंडप के स्तंभों के बीच के भाग में अलंकरण की एक पट्टी थी। इस मंदिर की एक उल्लेखनीय बात यह है कि इसके अगल-बगल और पीछे के दीवारों के निचले भाग कुछ आगे को उभरे हुए हैं जो पूर्वोल्लिखित किसी मंदिर में देखने में नहीं आता और परवर्ती मंदिरों में विकसित रूप में देखने को मिलता है।