गुप्तकालीन वास्तुकला - Gupta architecture

गुप्तकालीन वास्तुकला - Gupta architecture


एरण गुप्तकालीन नगर था, ऐसा वहाँ उपलब्ध अवशेषों से ज्ञात होता है। कनिंघम को वहाँ काफी दूर तक दुर्ग के अवशेष मिले थे। उनसे ज्ञात होता है कि आरंभ में नगर को वीणा नदी के तट पर इस प्रकार बसाया गया था कि नदियाँ ही दुर्ग के लिए खाई का काम दें। तीन ओर से वह वीणा नदी से घिरा हुआ था, चौथी ओर दो अंय छोटी नदियाँ थीं, जो नगर के पश्चिम भाग में बहती थीं और वीणा नदी में गिरती थीं। नदियों द्वारा बने इस प्राकृतिक खाई के भीतर दुर्ग का जो प्राचीर रहा होगा, उसका वह भाग जो वीणा नदी को छूता था, कदाचित् कालांतर में नदी में ढह कर नष्ट हो गया। उसके दक्षिणी-पश्चिमी भाग के ही अवशेष कनिंघम को देखने को मिले थे।

उन्होंने इन अवशेषों को अपनी रिपोर्ट में संलग्न मानचित्र में जो अंकन किया है, उससे ज्ञात होता है कि नदी के किनारे के दुर्ग के प्राचीर कदाचित् एकदम सीधी दीवारों के रूप में रहे होंगे। इसका अनुमान उत्तर-पश्चिमी भाग में उपलब्ध सीधी दीवार के अवशेषों से किया जा सकता है। दक्षिण-पश्चिम की ओर का जो अंश वीणा नदी की परिधि से बाहर था, वहाँ दीवारों में थोड़ी- थोड़ी टू पर घुमाव दिया गया है। इन घुमावदार भाग में कदाचित् ऊँची गोल बुर्जियाँ रही होंगी। इस विस्तृत प्राचीर के भीतर दक्षिणी कोने पर एक दूसरा छोटा प्राचीरों का घेरा था, कदाचित् यह घेरे के भीतर राजप्रासाद अथवा सैनिक छावनी का रहा होगा। इस दुर्ग से बाहर कुछ हटकर ही गुप्तकालीन मंदिरों के अवशे ष मिले हैं; इससे ऐसा अनुमान होता है कि उस समय लोग दुर्ग के बाहर भी बसते थे। 


धार्मिक वास्तु


गुप्तकालीन नागरिक वास्तुओं की अपेक्षा धार्मिक वास्तुओं के अवशेष अधिक मात्रा और ठोस रूप में उपलब्ध हैं। ये वास्तु दो परंपराओं में विभक्त हैं। एक तो पश्चिमी और दक्षिणी भारत में पहले से प्रचलित परंपरा के क्रम में है जिनमें पर्वतों को काट कर बनाये गये लयण वास्तु हैं, दूसरी परंपरा चुनाई द्वारा ईंट और पत्थर के वास्तु निर्माण की है। 


लयण- वास्तु


पर्वतों को काट कर लयण (गुहा) बनाने की परंपरा का आरंभ भारत में मौर्य काल में हुआ था। इस प्रकार के जो लयण चैत्य और विहार गुप्तकाल में बने वे अधिकांशतः गुप्त साम्राज्य के बाहर,

अजंता, एलोरा और औरंगाबाद में हैं। गुप्त साम्राज्य के भीतर इस परंपरा के लयण केवल मध्यप्रदेश में वाव नामक स्थान पर देखने में आते हैं। बौद्धों की इस वास्तु परंपरा का अनुकरण ब्राह्मण और जैन-धर्म के माननेवालों कदाचित् गुप्तकाल में करना आरंभ किया। उनके बनाये लयण एलोरा में काफी संख्या में देखने में आते हैं। पर गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत उन्होंने प्रारंभिक प्रयोग मात्र ही किया। इस प्रकार के लयण मध्यप्रदेश में विदिशा के निकट उदयगिरि में ही अब तक जाने गये थे। उनमें प्रायः सभी ब्राह्मण हैं केवल एक जैन है। इस प्रकार का एक ब्राह्मण लयण गुप्तकाल में बिहार में भी बना था। यह लयण भागलपुर जिले में मंदारगिरि पर है।


अजंता के लयण


अजंता स्थित लयणों की संख्या 29 है। उनमें से पाँच तो ईसा पूर्व की शताब्दियों के हैं। शेष का निर्माण गुप्तकाल में हुआ है।

इन गुप्तकालीन चैत्यों में दो (लयण 19 और 26) चैत्य और शेष सब विहार हैं। चैत्यों में लयण 19, लयण 26 से पहले का बना प्रतीत होता है। ये चैत्यगृह अपनी सामान्य रूपरेखा में गुप्त-पूर्व के चैत्यों के समान ही हैं। कुब्जपृष्ठ के नीचे दोनों ओर पंक्तिबद्ध स्तंभ टोड़ों के ऊपर छत को उठाये पूरी गहराई तक चले गये हैं और स्तूप के पीछे अर्धवृत्त बनाते हैं। स्तूप गर्भभूमि पर हर्मिका और छत्रावली के साथ खड़ा है। इन चैत्यों की उल्लेखनीय बात यह है कि पूर्ववर्ती चैत्यों के भीतर-बाहर कहीं भी बुद्ध मूर्ति का उच्चित्रण नहीं हुआ था। इन गुप्तकालीन चैत्यों के भीतर-बाहर अनेक स्थलों पर बुद्ध की मूर्ति का उच्चित्रण हुआ है, स्तूप में भी सामने की ओर उनकी मूर्ति उकेरी गयी है।


विहारों में गुप्तकालीन प्राचीनतम विहार 11, 12 और 13 कहे जाते हैं, उनका समय 400 ई. के आसपास अनुमान किया जाता है।

16वीं लयण का निर्माण वाकाटक नरेश हरिषेण के मंत्री ने और लयण 17 को उनके एक मांडलिक सामंत ने कराया था। इनका समय 500 ई. के आसपास है। लयण 1 और 2, 600 ई. के आसपास बने होंगे। 16वें और 17वें लयण की ख्याति मुख्य रूप से अपने चित्रों के कारण है किंतु वास्तु-कला की दृष्टि से भी वे उतने ही महत्त्व के हैं। लयण 16, 65 फुट वर्गाकार 20 स्तंभों का मंडप है, जिसके अगल-बगल भिक्षुओं के रहने की 6-6, बरामदे के दोनों सिरों पर दो-दो और पीछे दो कोठरियाँ हैं। पीछे की दो कोठरियों के बीच में एक चैकोर गर्भगृह है जिसमें बुद्ध की प्रलंबपाद (पैर नीचे किये) मूर्ति है। स्तंभों का सौंदर्य अवर्णनीय है। उनमें कोई भी एक-सा नहीं है।

फिर भी उनमें ऐसी समन्वयता है कि उनकी विविधता किसी प्रकार खटकती नहीं। लयण 17 भी लयण 16 के समान ही है। इन दोनों लयों की दीवारों पर बुद्ध और जातक कथाओं के चित्र अंकित किये गये थे और छतें बहुविध चित्रों से अलंकृत थीं। इनका उल्लेख पहले किया जा चुका है। लयण 2 का मंडप समस्त लयणों के मंडपों से बड़ा है, वह 87 फुट वर्गाकार है और उसमें 28 स्तंभ हैं। अंय लवणों में केवल लयण 24 ही उल्लेखनीय है, इसका मंडप 75 फुट वर्ग में है और उसमें 20 स्तंभ हैं। कदाचित् पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन् द्वारा चालुक्य नरेश पुलकेशी के पराजय के पश्चात् सातवीं शती के मध्य में लयणों का निर्माण अजंता में समाप्त हो गया। एलोरा के लयण


अजंता से प्रायः 75 मील दूर सह्याद्रि की पर्वतश्रृंखला में एलोरा के लयण हैं।

इस समूह में बौद्ध, ब्राह्मण और जैन तीनों ही धर्मों से संबंधित लयण हैं। किंतु बौद्ध लयण अंय दो धर्मों के लयणों से पहले के हैं। ये बौद्ध-लयण शृंखला में दक्षिणी छोर पर स्थित हैं और संख्या में 12 है। उनका निर्माण काल 550 और 750 ई. के बीच आँका जाता है। इन 12 लयणों में से केवल 5, जो प्राचीनतम है, गुप्तकाल के हैं। पाँचवें लयण के अतिरिक्त अंय सब लवण अजंता के लवण-विहारों के समान ही वर्गाकार हैं। लयण 5 वर्गाकार न होकर आयताकार है। वह लंबाई में 117 फुट और चौड़ाई में 70 फुट है। मंडप के भीतर गर्भ- भूमि तक दोनों ओर स्तंभों की पाँत चली गयी है। उदयगिरि के लयण


उदयगिरि विदिशा के निकट, बेसनगर से दो मील दक्षिण-पश्चिम और साँची से 5 मील पर स्थित लगभग डेढ़ मील लंबी पर्वत शृंखला है।

उसकी अधिकतम ऊँचाई उत्तर-पूर्वी भाग में 250 फुट है। इसके बीच का भाग नीचा है जिसमें पहाड़ के आरपार एक संकरी गली कटी हुई है। इसे किसी समय फाटक लगाकर बंद किया जाता रहा होगा। उसके उत्तरी भाग में फाटक के चिह्न अब भी वर्तमान हैं। इस पहाड़ी का पत्थर नर्म और परतदार है और इसी परतदार पत्थर होने का लाभ उठा कर उसके उत्तर-पूर्वी भाग में दस-बारह लयण काटे गये थे। अधिकांशतः बहुत छोटे हैं, किंतु जो भी लयण है, उनके द्वार के सामने चुनाई कर बरामदे अथवा मंडप बनाये गये थे। इन लयणों में से दो में द्वितीय चंद्रगुप्त के काल के अभिलेख हैं, तीसरे में गुप्त संवत् 106 का लेख है, उसमें किसी शासक का नाम नहीं है किंतु उसे कुमारगुप्त प्रथम के काल का कहा जा सकता है।


पहला लवण पहाड़ी की आधी ऊँचाई पर स्थित है। उसे लयण कहना कुछ असंगत लगता है, क्योंकि उसका सामना और एक किनारा चुनाई कर खड़ा किया गया है।

उसकी छत प्राकृतिक पर्वत के आगे निकले भाग से बनी है। यह 7 फुट लंबा और 6 फुट चौड़ा कमरा है। सामने चार खंभे हैं। बीच में खंभों में तीन फुट का अंतर है और इधर-उधर खभे केवल एक फुट के अंतर पर हैं। पीछे की दीवार में पर्वत को कोर कर कोई प्रतिमा बनायी गयी थी, किंतु अब वह नष्ट हो गयी हैं केवल एक खड़ी आकृति की रेखा भर बच रही है। दूसरा लयण लगभग भूमितल के निकट है और बहुत कुछ नष्टप्राय है। यह लवण लगभग आठ फुट लंबा और 6 फुट चौडा था। सामने की दीवाल नष्ट हो गयी है किंतु पर्वत में दो अर्ध- स्तंभों के चिह्न बच रहे हैं।


तीसरा लयण दूसरे लयण से लगभग 41 फुट हट कर दायीं ओर है। इस लयण के द्वार पर वीणावादक के चित्रण के आधार पर कनिंघम ने इसका उल्लेख वीणा-यण के नाम से किया है।

यह लयण लगभग 14 फुट लंबा और पौने बारह फुट चौडा है और उसमें 6 फुट ऊँचा और सवा दो फुट चौड़ा अलंकृत द्वार है। द्वार के सिरदल और बाजू में अलंकरणों की तीन पाँत हैं। सिरदल के निचली पाँत में पाँच कमल हैं जिनके बीच गोल फलक में आकृति अंकित है। बीचवाले कमल में सिंह अगल-बगलवाले में मकर और शेष दो में वीणावादक और सितारवादक अंकित हैं। अलंकरण पातों के बाहर अर्ध-स्तंभों का अंकन हुआ है जिनके ऊपर घंटाकार शीर्ष है और उनके ऊपर मकरवाहिनी है। भीतर एकमुखी लिंग प्रतिष्ठित है। लयण के सामने चुना हुआ मंडप था जो अगल-बगल दो छोटे तथा बीच में दो बड़े स्तंभों के सहारे खड़ा था। यह मंडप एक अंय खुले लयण के आगे तक चला गया था। यह खुला लवण सवा दस फुट लंबा और पौने सात फुट चौडा है। उसमें अष्टमातृकाओं का उच्चित्रण हुआ है।


चौथा लयण भी खुला हुआ है और 22 फुट लंबा, पौने तेरह फुट ऊँचा और केवल तीन फुट चार इंच गहरा (चौडा) है। इसकी दीवार पर वराह का सुप्रसिद्ध उच्चित्रण हुआ है। वराह के दोनों ओर गंगा यमुना के अवतरित हो और मिल कर समुद्र में जा मिलने का सुंदर उच्चित्रण हुआ है। गंगा और यमुना नदी धाराओं के बीच क्रमश: मकर और कच्छप पर खड़ी घट लिये नारी के रूप में अंकित की गयी हैं और समुद्र को वरुण के रूप में पुरुष रूप में घट लिये दिखाया गया है।


वराह लयण से थोड़ा हट कर पाँचवीं लयण हैं जिसमें चंद्रगुप्त द्वितीय के 82वें वर्ष का उनके सनकानिक सामंत का अभिलेख है। यह लयण 14 फुट लंबा और साढ़े बारह फुट चौड़ा है।

प्रवेश द्वार के सामने पत्थर काट कर बनाया गया 23 फुट आठ इंच लंबा और 5 फुट 10 इंच चौडा बरामदा है। द्वार जो बरामदे के दक्षिणी छोर के निकट है, काफी अलंकृत है पर दोनों ओर मकरवाहिनी वृक्षिकाएँ हैं जिसका लोगों ने सामान्यतः गंगा-यमुना के रूप में उल्लेख किया है। द्वार के दोनों ओर उच्चित्रण है और एक ओर के उच्चित्रण के ऊपर उपर्युक्त अभिलेख है।


इस लयण से कुछ हट कर दायीं ओर पर्वत को काट कर स्तूपनुमा वास्तु का निर्माण हुआ है, जिसका आधार चैकोर है और छत तवानुमा पत्थर का बना है।

इस कारण लोग इसको तवा लयण कहते हैं। इसके उत्तरी भाग में एक द्वार है और उसके भीतर 13 फुट 10 इंच लंबा और 11 फुट 9 इंच चौडा कमरा है। कमरे के पिछली दीवार पर एक अभिलेख है जिससे ज्ञात होता है कि उसे चंद्रगुप्त द्वितीय के सचिव पाटलिपुत्र निवासी वीरसेन ने निर्मित कराया था। इसके सामने पहले मंडप था इसका अनुमान द्वार के ऊपर बने खड्डे से होता है जिसके सहारे छत का निर्माण किया गया रहा होगा। द्वार के दोनों ओर द्वारपालों का अंकन हुआ था जो अब बहुत ही विकृत अवस्था में हैं। कमरे के छत के ऊपर साढ़े चार फुट व्यास के कमल के फूल का अंकन हुआ है।


वीरसेन लयण (तवा लयण) के बगल से पर्वत के आरपार गली बनी हुई है। इस गली के बनाने के लिए गहराई में केवल 12 फुट पत्थर काटे गये थे

और लंबाई में यह गली 100 फुट होगी। इस गली के बनाने से दोनों ओर जो दीवार निकली उसका उपयोग उच्चित्रण के लिए किया गया है। इस उच्चित्रण में अतंत-शैय्या का दृश्य अंकित है। भगवान् विष्णु शेषनाग पर लेटे हुए हैं और गरुड़ तथा सात आकृतियाँ उनके निकट हैं। यह काफी बड़ा उच्चित्रण है किंतु अब बहुत कुछ नष्ट हो गया है।


इस गली से आगे आठवाँ लयण है जो 10 फुट 4 इंच लंबी और 10 फुट चौड़ी कोठरी मात्र है। द्वार पर अर्ध-स्तंभ बना है जिस पर घंटाकार कटावदार शीर्ष है। इसमें एक ओर गणेश और दूसरी ओर माहेश्वरी का उच्चित्रण है।

इससे उत्तर-पूर्व कुछ हट कर उदयगिरि ग्राम के निकट नवा लयण है, जिसे नियम ने अमृत लयण का नाम दिया है। इसके भीतर शिवलिंग प्रतिष्ठित है किंतु संवत् 1093 (1036 ई.) के एक अभिलेख से, जिसे किसी यात्री ने एक स्तंभ पर अंकित किया है, ज्ञात होता है कि उन दिनों उसमें विष्णु की उपासना होती थी। यह उदयगिरि के समस्त लयणों में सबसे बड़ा है अर्थात् 22 फुट लंबा और 19 फुट चार इंच चौडा है। छत को सँभालने के लिए चार बड़े-बड़े, स्तंभ हैं जो 8 फुट ऊँचे और 7 इंच वर्गाकार हैं। इन स्तंभों के शीर्ष काफी अलंकृत हैं। उनमें चार कोनों पर चार पक्षधारी श्रृंगयुक्त पशु अपनी पिछली टाँगों पर खड़े हैं और अगले पंजों से अपना मुँह छू रहे हैं।

इसकी छत भी अंय लयणों से भिन्न है। स्तंभ के ऊपर बने धरण से वह नौ वर्गों में बँटा है। बीच के वर्ग में चार वृत्तोंवाले कमल के फूल का अंकन है। उसकी खाली जगह भी रेखाओं से भरी हुई है। इस लयण का द्वार भी अय लयणों की अपेक्षा अधिक अलंकृत है किंतु दोनों ओर मकरवाहिनी का अंकन है बीच में समुद्रमंथन का दृश्य उच्चित्रित है और इसके ऊपर नवग्रह का अधबना उच्चित्रण है। इस लयण के सामने एक तीन द्वारोंवाला बरामदा था जिसमें बाद में एक हाल जोड़ दिया गया जिससे उसका आकार 27 फुट वर्ग के मंडप-सा बन गया। इस मंडप के कुछ स्तंभ और दीवार ही अब बच रहे हैं। कदाचित् यह लयण समग्र लयण समूह में सबसे बाद का है, ऐसा कनिंघम का मत है।


दसवाँ लयण पर्वत के उत्तरी-पश्चिमी छोर पर है और उस तक पहुँचना सहज नहीं है। यह लयण 50 फुट लंबा और 16 फुट चौड़ा है

और अनगढ़ पत्थर चुन कर बने दीवारों से पाँच कमरों के रूप में विभक्त है। आखिरी कमरे से लगा एक और लयण है जिसमें इसी प्रकार बने तीन कमरे हैं। पहले लयण में एक अभिलेख है जिससे ज्ञात होता है कि इस लयण का निर्माण गुप्त संवत् 106 में हुआ था और उसके द्वार पर पार्श्वनाथ की स्थापना की गयी थी। उदयगिरि के लयणों में अकेला यही लयण जैन-धर्म से संबद्ध है; अंय सब ब्राह्मण लयण हैं।


उदयगिरि के इन लवणों में न तो वह भव्यता है और न वह सुचारुता जो अंयंत्र ज्ञात बौद्ध लयणों में देखने में आती है। इनके बाहर मंडप चुन कर बनाये गये थे,

यह कुछ असाधारण-सी बात है, यह भी अंया अज्ञात है। वास्तुकला के दो विधाओं का यह समन्वय तितव्यीयता की दृष्टि से किया गया था अथवा पत्थर की अनुपयुक्तता के कारण, कहा नहीं जा सकता। किंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि चुनाई के काम में भी वह सुधरता नहीं है जो अंय चुने हुए वास्तुओं में देखने में आता है। स्तूप


स्तूपों का विकास मूलतः अस्थिसंचायक के रूप में हुआ था पर पीछे वे अस्थिसंचायक और स्मारक दोनों रूपों में बनने लगे। गुप्त काल में दोनों ही प्रकार के स्तूप बने। गंधार और मध्यप्रदेश में उनकी विस्तृत परंपरा थी, किंतु ईंटों के बने होने के कारण प्रायः वे सभी नष्ट हो गये। मथुरा में कुषाणकालीन जैन- स्तूप के चारों ओर की वेदिका की स्तंभ और बड़ेरियाँ मिली हैं जो उनसे तत्कालीन और परवर्ती स्तूपों की कुछ कल्पना की जा सकती है।


गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत अवशिष्ट स्तूपों में बस सारनाथ स्थित धमेख स्तूप ही ऐसा है जिसकी कुछ चर्चा की जा सकती है। यह संभवत: छठी शती ई. का है। यह ईटों का बना 128 फुट ऊँचा और आकार में गोल नलाकार है। आज वह जिस रूप में उपलब्ध है, उसके तीन अंग हैं। नीचे का आधार, बीच का भाग और तूदा आधार ठोस पत्थर का बना है और उसमें आठ दिशाओं में आगे को निकला हुआ शिखरयुक्त पतला उभार है जिसके बीच में मूर्तियों के लिए रथिकाएँ बनी हैं। उनकी मूर्तियाँ अब अनुपलब्ध हैं। शेष भाग पर सुंदर ज्यामितिक तथा लतापत्र की एक चौड़ी पट्टी है। ऊपर का तूदा ईटों का बना है।


इसी आकार का एक दूसरा स्तूप राजगृह में है जो जरासन्ध की बैठक के नाम से प्रसिद्ध है और संभवत: इसी काल का है। इसका आकार कुछ मीनार सरीखा है, कदाचित् इसीलिए युवान च्वांग ने उसका उल्लेख मीनार के रूप में किया है।