गुप्तकालीन संस्कृति - Gupta culture
गुप्तकालीन संस्कृति - Gupta culture
गुप्त सम्राटों ने श्रेष्ठ सुव्यवस्थित शासन देश में शांति और समृद्धि के वातावरण उनकी उदारता व सहिष्णुता की नीति, उनकी विद्वता और विद्यानुराग, ललित कलाओं और साहित्य को उनका संरक्षण आदि ने सामाजिक जीवन में नवीन स्फूर्ति, पुनर्जागरण, आत्मचेतना और सम्यक विकास की भावना उत्पन्न कर दी और सांस्कृतिक सृजन का नवीन अनुकूल वातावरण निर्मित किया। फलतः भारतीय समाज ने अपना जितना बहुमुखी विकास गुप्तकाल में किया, उतना विकास शायद अंय युगों में नहीं किया।
गुप्तकालीन संस्कृति की विशेषतायें
गुप्तकालीन संस्कृति की विशेषतायें निम्नानुसार हैं।
(1) सुख समृद्धि का युग
गुप्त युग सुख-समृद्धि और संपन्नता का था। सामान्यतया लोगों में किसी बात का अभाव नहीं था। लोग सद्गुणसंपन्न, सुखी और फले-फूले थे। देश में विशाल नगरों की प्रचुरता व उनकी समृद्धि और धन-धान्यता, वहाँ के निवासियों की उदारता, धर्मपरायणता एवं दान-शीलता, राजमार्गों पर स्थित सुख- सुविधापूर्ण धर्मशालाएँ, अनेक स्थानों के दान और क्षेत्र आदि इस बात के प्रमाण हैं कि साधारण जनता सुखी, संतुष्ठ और समृद्ध थी।
(2) नैतिकता की संपन्नता का युग
गुप्त युग में लोगों में श्रेष्ठ चरित्र बल उच्च नैतिकता, सदाचारिता और सद्गुण संपन्नता थी। लोगों में शिष्टाचार, भद्रता, दान, अतिथि सत्कार, आदि गुण प्रचुर मात्रा में थे।
फाह्यान के कथनानुसार लोग इतने ईमानदार थे कि उनमें व्यवहार और लेन-देन के लिए लिखा-पढ़ी नहीं होती थी व लोगों में झगड़ालू वृत्ति नहीं थी। चोरी, लूट और अपराध नगण्य थे। बहुसंख्यक लोग शाकाहारी थे और अहिंसा का सिद्धांत मानते थे। सुरापान दुर्व्यसन माना जाता था। घरों में सूअर और मुर्गा मुर्गी नहीं पाले जाते थे। जीवित पशु भी नहीं बेचे जाते थे। गुप्तकाल में सामान्यतः लोग न तो माँस, लहसुन और प्याज खाते थे और न मद्य- पान ही करते थे। चांडाल ही, जो समाज से बहिष्कृत होते थे, आखेट करते, पशु-पक्षी और मछली मारते, माँस खाते और बेचते थे।
(3) विदेशियों का विलीनीकरण
भारत में यूनानी, बाख्ती, कुषाण, पहलव,
शक आदि विदेशी आक्रमण करने वाली जातियाँ बस गई थीं। जब उनके राज्य और शक्ति क्षीण हो गए तब वे भारतीय समाज की पाचन शक्ति के कारण, समाज में विलीन हो गए। गुप्त युग में भारतीयों में ये लोग घुलमिल गए और उनका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।
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