गुप्तकालीन नृत्य कला - Gupta dance art
गुप्तकालीन नृत्य कला - Gupta dance art
प्राचीन काल से ही इस देश में नृत्य का प्रचार रहा है और साहित्य में स्त्री-पुरुष दोनों के नृत्य करने का उल्लेख मिलता है, पर यह कला नारी प्रधान ही अधिक थी। गुप्त काल में नृत्य की लोकप्रियता इतनी अधिक बढ़ गयी थी कि परिवार के भीतर तो लड़कियाँ नृत्य सीखतीं और नृत्य करती ही थीं परिवार के बाहर भी उसका व्यापक प्रचार था। मंदिरों में, समाज में, राजदरबार में नृत्य हुआ करते थे। नृत्य ने एक पेशे का रूप धारण कर लिया था और लोगों के बीच नर्तकियों का काफी सम्मान था । लोग पुत्र- जन्म, विवाह आदि के अवसरों पर घरों में उनका नृत्य कराते थे।
नृत्य के रूपों के संबंध में साहित्य से विशेष प्रकाश नहीं पड़ता। मालविकाग्निमित्र में छलिक नामक नृत्य का उल्लेख हुआ है, पर उसके रूप-स्वरूप की कोई चर्चा नहीं है। इसी प्रकार नर्तकियों द्वारा चामर नृत्य किये जाने का उल्लेख मिलता है। नृत्य के दृश्यों का कतिपय अंकन गुप्तकालीन चित्रों और तक्षण में हुआ है। उनसे उनके स्वरूप का कुछ अनुमान किया जा सकता है। अजंता के 17वें लयण में
नृत्य का एक अंकन मिलता है। उसमें एक नर्तकी नृत्य कर रही है और उसके साथ चार खियाँ मँजीरा और एक पुरुष मृदंग बजा रहा है। इसी प्रकार बाघ के चैथे लयण में दो नृत्य-समूहों का चित्रण हुआ है। इन दोनों ही नृत्य समूहों में मृदंग, झाल और दंड बजाती स्त्रियों से घिरी एक स्त्री नृत्य कर रही है। सारनाथ से प्राप्त एक शिलाफलक पर क्षान्तिवादक जातक का दृश्य अंकित है। उसमें एक स्त्री वेणु, भेरी, झाल और मृदंग बजाती स्त्रियों के बीच नृत्य कर रही है। भूमरा के शिव मंदिर के फलकों में भी कुछ नृत्य करते गणों का अंकन हुआ है।
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