गुप्तकालीन साहित्य - Gupta Literature
गुप्तकालीन साहित्य - Gupta Literature
गुप्तकाल में संस्कृत भाषा और साहित्य का खूब विकास हुआ। गुप्त सम्राटों के विद्यानुराग और राज्याश्रय से, राज्य भाषा संस्कृत होने से, शिलालेख, प्रशस्ति, राज्यादेश संस्कृत में होने से, ब्राह्मण धर्म के पुनरुद्धार और उसके प्रचार में संस्कृत का उपयोग होने से इस युग के विद्वानों, कवियों, लेखकों, दार्शनिकों, धर्माचार्यों, नाटककारों आदि के द्वारा अपने ग्रंथों में संस्कृत का उपयोग होने से, राष्ट्रभाषा संस्कृत होने से एवं देश में शांति और सुव्यवस्था से संस्कृत साहित्य का खूब उत्कर्ष हुआ। इस साहित्यिक श्रीवृद्धि के कारण गुप्त युग को पेरीक्लीज युग और अगस्टन युग कहा जाता है। गुप्त युग की साहित्य की उन्नति निम्नलिखित है-
(1) प्रशस्तिकार और कवि
गुप्त युग में हरिषेण साव, वीरसेन साव, वत्स भट्टी, वसुल जैसे महान प्रशस्तिकार और कवि हुए हैं।
इन्होंने अभिलेखों व दिग्विजयों को काव्यमय संस्कृत में उत्कीर्ण किया है। इनकी प्रशस्तियों से तत्कालीन संस्कृत की सरल, उन्नत, परिष्कृत और अलंकारिक काव्य शैली पर प्रकाश पड़ता है।
गुप्तयुग अपने विश्वविख्यात कवियों और उनके काव्यग्रंथों के लिए भी प्रसिद्ध है। इस युग के सर्वोच्च कवि कालिदास हैं। कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की राजसभा का मेधावी साहित्यिक और राजकवि था । कालिदास ने शकुंतला", "मालविकाग्निमित्र" और "विक्रमोर्वशी' जैसे नाटक,
“कुमार संभव' और 'रघुवंश' नामक महाकाव्य, "ऋतुसंहार" जैसी गीति काव्य और "मेघदूत" जैसे खंड काव्य लिखे हैं कालिदास की कविता अपने सौंदर्य, सरसता, सरलता, भावों और उपमाओं के लिए प्रसिद्ध है। कालिदास के ओज और प्रसिद्ध गुणों में, उसकी उपमाओं की सुंदरता, अनुकूलता और विविधता में, उसके अनोखें अलंकारों के सौष्ठव में, उसके करुणा, प्रेम व शृंगार के भावों के उत्कृष्ट प्रदर्शन में, उसकी शैली की सरलता एवं शब्द चयन के माधुर्य में तथा उसके चरित्र-निर्माण में संस्कृत का कोई भी कवि उसके मुकाबले में ठहर नहीं सकता। अपने इन गुणों के कारण ही कालिदास संस्कृत साहित्य में अद्वितीय हैं
एवं संसार के श्रेष्ठतम कवियों में हैं। रावण वध" नामक महाकाव्य का रचियता वत्स भट्टी इस काल का अंय महान कवि है। रीति ग्रंथ काव्यादर्श" और "दशकुमार चरित" का लेखक दंडिन भी इस युग की महान विभूति थी। वीरसेन साव चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में प्रसिद्ध कवि और महान व्याकरणाचार्य था। "किरातार्जुनीय" का रचयिता भारवी भी इस युग का प्रतिभा संपन्न कवि था। कतिपय विद्वानों का मत है कि भर्तृहरि भी इसी काल में हुए। उनके तीन ग्रंथ "नीतिशतक" " शृंगारशतक” और “वैराग्यशतक" काव्य की दृष्टि से अतुलनीय और महत्वपूर्ण हैं।
(2) नाटककार
गुप्त युग संस्कृत के श्रेष्ठ नाटकों के लिए प्रसिद्ध है। इस युग में "शकुंतला" नाटक का लेखक कालिदास, "मृच्छकटिका" नाटक का लेखक शूद्रक,
"मुद्राराक्षस" और "देवी चंद्रगुप्तम्" नाटक का लेखक विशाखदत्त तथा "स्वप्नवासवादत्तम" का रचियता भास अधिक प्रसिद्ध थे। "वासवदत्ता" का गद्य काव्यकार सुबंधु भी इसी युग का है।
(3) नीति ग्रंथ और स्मृतियाँ
गुप्त युग में रचे नीति ग्रंथों में कामंदक का 'नीति-सार' ग्रंथ अनुपम है। इसके अतिरिक्त इस युग में स्मृति ग्रंथों या कानून ग्रंथों की रचना भी हुई। इनमें नारदस्मृति", "कात्यायन स्मृति", "पाराशर स्मृति", "बृहस्पति स्मृति" और "याज्ञवल्क्य प्रसिद्ध हैं।
(4) कोष और व्याकरण
अमरसिंह द्वारा 'अमरकोष' इसी युग में रचा गया है। चंद्रशोमी नामक बंगाली बौद्ध भिक्षु ने 'चंद्रव्याकरण' लिखा जो बहुत लोकप्रिय हो गया।
(5) गल्पग्रंथ
गुप्तकाल में दो प्रसिद्ध गल्प ग्रंथ पंचतंत्र और हितोपदेश' रचे गये। मूल 'पंचतंत्र' ग्रंथ विष्णु शर्मा ने लिखा था। ये ग्रंथ मनोरंजक ढंग से विभिन्न कथाओं द्वारा नीति की शिक्षा देते हैं।
(6) दर्शन और दार्शनिक ग्रंथ
गुप्त युग में प्राचीन वैदिक धर्म के प्रसार के कारण विभिन्न धार्मिक विचारों में संघर्ष हुआ, जिससे दार्शनिक विचारों के विकास में बड़ा सहयोग प्राप्त हुआ। इस युग में प्रचलित बौद्ध धर्म के संप्रदाय महायान और हीनयान के प्रवल प्रसार से भी नवीन दार्शनिक विचारों का प्रादुर्भाव हुआ। इसके अतिरिक्त विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के प्रकांड पंडित और आचार्य परस्पर वादविवाद के नवीन तर्क और युक्ति तथा दार्शनिक विचार प्रस्तुत करते थे। इन सबके परिणामस्वरूप गुप्तयुग में ब्राह्मण, बौद्ध और जैनदर्शन का खूब विकास हुआ और तीनों धर्मों के विद्वानों ने अपने-अपने दार्शनिक ग्रंथ लिखे।
लगभग 300 ई. में मीमांसा दर्शन पर शबर ने 'शबर भाष्य लिखा। इसमें याज्ञिक अनुष्ठानों के साथ-साथ आत्मा, ईश्वर, सृष्टि, मुक्ति आदि की समीक्षा की गयी है
और प्राचीन मीमांसा सूत्रों का विकास किया गया है। ईश्वर कृष्ण ने सांख्य दर्शन प्रणाली पर सांख्यकारिता' ग्रंथ लिखा वैशेषिक दर्शन प्रणाली पर आचार्य प्रशस्त पाद ने पदार्थ धर्मसंग्रह ग्रंथ लिखा। तीसरी सदी के अंत में योग दर्शन पर आचार्य व्यास ने 'व्यास भाष्य' लिखा। न्यायदर्शन पर वात्सायन ने सन्याय भाष्य लिखा। इसमें बौद्धों के माध्यमिक और योगाचार संप्रदायों के मंतव्यों और दार्शनिक विचारों का खंडन किया गया और न्याय सूत्रों की समीक्षा की गयी। उद्योतकर ने न्याय भाष्य पर “न्यायवर्तिक” नामक विद्वतापूर्ण टीका लिखी।
गुप्तयुग में बौद्धों की दार्शनिक प्रणालियों और विचारधाराओं पर भी ग्रंथ लिखें गये। बौद्ध दार्शनिक साहित्य का गुप्तयुग में पर्याप्त विकास हुआ।
तीसरी सदी के अंत में बौद्धों के प्रसिद्ध दार्शनिक आसंग ने "योगाचार भूतिशास्त्र”, “प्रकरण आर्य वाचा", "महायान सूत्रालंकार”, “महायान संपरिग्रह "वज्रच्छेदिकाटीका" आदि ग्रंथ लिखे। उसके भ्राता वसुबंधु ने हीनयान और महायान मत के दर्शन पर अनेक ग्रंथ लिखे। उसने अपने "अभिधर्म कोष" में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का श्रेष्ठ प्रतिपादन किया। वसुबंधु बौद्धों के विज्ञानवाद का बड़ा प्रवक्ता था। उसने बौद्धों के पृथक तर्क शास्त्र का सूत्रपात किया। बौद्ध धर्म का अय महान दार्शनिक दिग्राग था। वह गुप्तयुग के सर्वोत्कृष्ट बौद्ध लेखकों और दार्शनिकों में से है। “प्रमाण समुच्च" और "न्यायमुख उसके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। महायान मत के माध्यमिक संप्रदाय के विद्वान आर्यदेव ने "चतुःशतक' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा।
महायान मत के दो प्रसिद्ध ग्रंथ 'वज्रच्छेदिका' प्रज्ञापारमिता और प्रज्ञा पारमिता हृदय सूत्र तीसरी सदी में रचे गये। गुप्तयुग में हीनयान मत के अनेक धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों की रचना हुई। बुद्ध घोष ने बौद्ध धर्म के त्रिपिटकों पर अनेक भाष्य लिखे। एक अंय बौद्ध विद्वान बुद्ध दत्त ने भी हीनयान मत पर ग्रंथ लिखे।
गुप्त काल में अनेक जैन ग्रंथों को लिपिबद्ध किया गया और नवीन धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ लिखे गये। जैन न्याय दर्शन पर “न्यायवतार सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। प्रसिद्ध जैन आचार्य सिद्धसेन ने न्याय दर्शन पर ग्रंथ लिखे। सिद्धसेन का "तत्वानुसारिणी टीका एक मौलिक ग्रंथ है।
(7) ब्राह्मण धर्मशास्त्रों का संसोधन और परिवर्द्धन
ब्राह्मण धर्म या पौराणिक धर्म के साहित्य को नवीन रूप देने और उसे अधिक लोकप्रिय बनाने हेतु धर्माचार्यों ने इस युग में अनेक धार्मिक ग्रंथों को संशोधित करके उनकी पुनः रचना की। नवीन दृष्टिकोण से धार्मिक साहित्य को परिवर्द्धित और परिष्कृत किया गया। इसके परिणामस्वरूप अनेक स्मृतियों और सूत्रों पर भाष्य लिखे गये। अनेक पुराणों और रामायण तथा महाभारत महाकाव्यों का अंतिम संपादन गुप्तयुग में किया गया।
पुराण मूलतः अधिकतर गुप्तकाल में ही संपादित किये गये। संस्कृत में अनेक अंय धार्मिक ग्रंथों की रचना इसी काल में हुई। इस प्रकार साहित्य की अनेक शाखाओं के विकास और प्रगति के कारण ही गुप्तकाल को भारत का अगस्टन युग कहा जाता है।
(8) दक्षिण भारत में साहित्यिक प्रगति
गुप्तकाल में दक्षिण भारत में भी साहित्यिक प्रगति हुई। उस समय वहाँ प्रमुखतः तामिल भाषा प्रचलित थी। दक्षिण में इस युग में भक्तिवाद का बाहुल्य था और नायनमारों (शैव संतों) तथा आलवारों (वैष्णव संतों) ने श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत अपने पदों में सर्वशक्तिमान ईश्वर की स्तुति और आराधना की। ये ही पद और भजन तामिल भाषा में भक्ति साहित्य बन गया।
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